सीएम मोहन यादव का बड़ा ऐलान: मत्स्य पालन को मिलेगा उद्योग का दर्जा, एमएसएमई से जुड़ेगा सेक्टर
मोहन यादव का ऐलान, उद्योग का दर्जा
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने मत्स्य पालन को राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनाने की बात कही। अब तक इसे पारंपरिक व्यवसाय माना जाता था। जलाशयों और तालाबों से जुड़ा मत्स्य पालन अब उद्योग की श्रेणी में आएगा।
मुख्यमंत्री बोले, यह स्वर्णिम समय है
मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का जिक्र किया। उनके मुताबिक, सभी मंत्री 'नवरत्न' की तरह काम कर रहे हैं।
मछली उत्पादन में देश की छलांग
अब बात मछली उत्पादन के आंकड़ों की। सम्मेलन में दो केंद्रीय मंत्री भी मौजूद थे। दोनों ने देश में मत्स्य उत्पादन की प्रगति के आंकड़े बताए।
ललन सिंह बोले, भारत दूसरे स्थान पर
सिंह ने देश में बढ़ते मछली उत्पादन के आंकड़े बताए। देश में उत्पादन 95 लाख टन से बढ़कर 198 लाख टन हो गया है। यानी उत्पादन दोगुने से भी ज्यादा हो गया है। मत्स्य निर्यात 30,213 करोड़ रुपए से बढ़कर 62,408 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। यह रिकॉर्ड स्तर है। इस सेक्टर पर करीब 6 करोड़ लोगों की आजीविका निर्भर है। सिंह ने मध्य प्रदेश जैसे इनलैंड (गैर-तटीय) राज्यों का मुद्दा भी उठाया। उनके मुताबिक, इन राज्यों में निर्यात की संभावनाएं बढ़ाने की सख्त जरूरत है।
बघेल बोले, दुग्ध उत्पादन में भारत नंबर-1
बघेल ने बताया कि 2019 में कृषि से अलग नया मंत्रालय बनाया गया। इसके बाद से मत्स्य पालन क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। उन्होंने ललन सिंह के विभाग की तारीफ भी की। उनके मुताबिक, यह विभाग का 'गोल्डन पीरियड' है। क्या बिना समुद्र वाले राज्य भी मछली निर्यात में आगे बढ़ सकते हैं? बघेल के मुताबिक, इसका जवाब हां है।
देश के मत्स्य उत्पादन में इनलैंड फिशरीज का योगदान 75 प्रतिशत है। इनलैंड फिशरीज का मतलब गैर-तटीय क्षेत्रों में मछली पालन है। मरीन यानी समुद्री फिशरीज का हिस्सा सिर्फ 25 प्रतिशत है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में आगे बढ़ने की संभावनाएं हैं।
इंदिरा सागर जलाशय बनेगा मॉडल
मत्स्य पालन की इस योजना में जलाशयों की बड़ी भूमिका होगी। प्रदेश के चार जलाशयों में 7,430 करोड़ रुपए का निवेश होगा। इनमें इंदिरा सागर, बरगी, बाणसागर और बारना जलाशय शामिल हैं। इन जलाशयों में आधुनिक केज कल्चर विकसित किया जाएगा। केज कल्चर में जाल के पिंजरों के भीतर मछली पालन किया जाता है।
परियोजना के तहत करीब 4 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त मछली उत्पादन का लक्ष्य है। एक्वापोनिक्स तकनीक से भी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इसमें मछली पालन के साथ सब्जियां उगाई जाती हैं। मध्य प्रदेश मत्स्य उद्योग (Madhya Pradesh fisheries) को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार का सहयोग भी मिला है। केंद्र ने प्रदेश को रिजर्वायर फिशरीज क्लस्टर में शामिल किया है। यह जलाशय आधारित मत्स्य पालन की योजना है।
इसके तहत खंडवा का इंदिरा सागर जलाशय मॉडल बनेगा। रायसेन का हलाली जलाशय भी मॉडल बनेगा। हलाली जलाशय को सम्राट अशोक सागर के नाम से भी जाना जाता है।
यहां मत्स्य बीज और चारे से लेकर मार्केटिंग तक की व्यवस्था होगी। हलाली जलाशय में 2024-25 के दौरान उत्पादकता 361 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष दर्ज हुई। वर्ष 2025-26 में यह उत्पादकता 319 किलोग्राम रही। विभागीय जानकारी के मुताबिक, मध्यम श्रेणी के जलाशयों में यह सर्वाधिक उत्पादकता है।
मध्य प्रदेश मत्स्य उद्योग का लक्ष्य
मध्य प्रदेश मत्स्य उद्योग के लिए करीब 4.50 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र उपलब्ध है। प्रदेश में 2025-26 के दौरान 4.95 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा मछली उत्पादन हुआ। इसे अब तक का सर्वाधिक उत्पादन बताया गया है। एकीकृत मत्स्योद्योग नीति-2026 के तहत एक लाख केज लगाने का लक्ष्य है। अगले तीन वर्षों में मछली उत्पादन दोगुना करने की योजना है।
क्या सरकार यह लक्ष्य पूरा कर पाएगी? इसका जवाब आने वाले वर्षों में मिलेगा। नीति के तहत करीब 40 हजार करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। इनसे मत्स्य बीज, चारा, प्रसंस्करण और शीत भंडारण की व्यवस्थाएं विकसित होंगी। परिवहन और निर्यात की सुविधाओं का भी विस्तार होगा।
इन निवेश प्रस्तावों से करीब 3.5 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने का अनुमान है। जलाशयों के पास मछली उतारने के केंद्र बनाए जाएंगे। रोग निदान प्रयोगशालाएं और प्रसंस्करण इकाइयां भी स्थापित होंगी। एकीकृत मत्स्य पालन में बतख और कुक्कुट पालन भी शामिल हैं। इसके अलावा मोती और मखाना उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जाएगा। इससे ग्रामीण युवाओं और महिला स्व-सहायता समूहों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।