राज्यपाल की केंद्र को भेजी रिपोर्ट भी देख सकेंगे RTI कार्यकर्ता, हाई कोर्ट ने राजभवन में दस्तावेजों के निरीक्षण की दी अनुमति
चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने सुनाया फैसला
जबलपुर में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने यह आदेश पारित किया। अदालत ने अजय दुबे की रिट अपील क्रमांक 3441/2026 पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश चंद ने पैरवी की।
सुनवाई के दौरान एकल पीठ के पुराने आदेश और सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी पर विचार किया गया। डिवीजन बेंच ने एकल पीठ के आदेश में संशोधन करते हुए प्रथम अपीलीय अधिकारी के पुराने आदेश को प्रभावी रूप से लागू करने के निर्देश दिए।
वर्ष 2011 से राज्यपाल की रिपोर्टों से जुड़ा है मामला
इस मामले की शुरुआत वर्ष 2011 में हुई थी। सामाजिक और वन्य प्राणी संरक्षण कार्यकर्ता अजय दुबे ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी। उन्होंने राज्यपाल द्वारा केंद्र सरकार को भेजी गई रिपोर्टों से संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की मांग की थी।
इन रिपोर्टों में मध्य प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति से जुड़े महत्वपूर्ण विवरण शामिल होने की बात सामने आई है। हालांकि, आवेदन करने के बावजूद अजय दुबे को मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही थी। इसके बाद उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध अपीलीय प्रक्रिया का सहारा लिया।
प्रथम अपीलीय अधिकारी ने 2012 में दिया था आदेश
अजय दुबे की अपील पर प्रथम अपीलीय अधिकारी ने 23 फरवरी 2012 को आदेश पारित किया था। लेकिन इस आदेश के बावजूद संबंधित जानकारी हासिल करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। दस्तावेजों तक पहुंच को लेकर विवाद बना रहा और मामला आगे हाई कोर्ट पहुंच गया।
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने अब उसी आदेश को प्रभावी रूप से लागू करने के निर्देश दिए हैं। इससे लंबे समय से लंबित सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।
पहले रिकॉर्ड देख सकेंगे, फिर मांगेंगे प्रमाणित प्रतियां
हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार, अजय दुबे को राजभवन में उपलब्ध संबंधित अभिलेखों के निरीक्षण का अवसर मिलेगा। वे राजभवन जाकर दस्तावेज देख सकेंगे और उपलब्ध जानकारी का परीक्षण कर सकेंगे।
निरीक्षण के बाद वे तय कर सकेंगे कि किन दस्तावेजों की प्रतियां प्राप्त करना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया अपनानी होगी। संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां भी इसी प्रक्रिया के तहत मांगी जा सकेंगी।
इसका मतलब यह है कि निरीक्षण की अनुमति मिलने से सभी दस्तावेजों की प्रतियां अपने आप उपलब्ध नहीं होंगी। इसके लिए आवश्यक आवेदन और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
एकल पीठ के आदेश में क्यों किया गया संशोधन?
डिवीजन बेंच ने मामले के रिकॉर्ड और पहले पारित आदेशों पर विचार किया। अदालत ने पाया कि प्रथम अपीलीय अधिकारी ने 23 फरवरी 2012 को संबंधित जानकारी के संबंध में आदेश दिया था।
इसी आदेश को प्रभावी बनाने के लिए एकल पीठ के पूर्व आदेश में संशोधन किया गया। इससे याचिकाकर्ता को संबंधित रिकॉर्ड का निरीक्षण करने और आवश्यक दस्तावेजों की प्रतियां मांगने की प्रक्रिया अपनाने का अवसर मिलेगा।
सरकारी दस्तावेजों तक पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण फैसला
हाई कोर्ट का यह आदेश सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार से जुड़ा है। खासतौर पर राज्यपाल द्वारा केंद्र सरकार को भेजी गई रिपोर्टों जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक अभिलेखों के निरीक्षण की अनुमति मिलने से इसकी अहमियत बढ़ जाती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकारियों के पास उपलब्ध सूचनाएं मांगने का कानूनी अधिकार देता है। इसका उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाना और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
हालांकि, इस अधिकार के तहत जानकारी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया कानून में निर्धारित प्रावधानों और लागू अपवादों के अधीन रहती है। ऐसे में दस्तावेजों के निरीक्षण और उनकी प्रतियां हासिल करने के बीच कानूनी अंतर भी महत्वपूर्ण है।
अब राजभवन में होगा संबंधित रिकॉर्ड का निरीक्षण
अजय दुबे की लंबे समय से जारी कानूनी लड़ाई का अगला चरण संबंधित अभिलेखों का निरीक्षण होगा। वे राजभवन में उपलब्ध रिकॉर्ड देखने के बाद जरूरी दस्तावेजों की पहचान कर सकेंगे।
इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत उन दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करने के लिए आवेदन किया जा सकेगा। इस आदेश से वर्ष 2011 से लंबित सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया है।