इंदौर के ब्लैकलिस्ट ठेकेदार मामले में हाईकोर्ट मप्र की लार्जर बैंच का अहम आदेश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की लार्जर बेंच ने ठेकेदारों और कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करने से जुड़े मामलों में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने 4-1 के बहुमत से स्पष्ट किया कि ब्लैकलिस्टिंग केवल ठेके का विवाद नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक कार्रवाई है।
इसलिए इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। आज लार्जर बैंच ( larger bench) ने इंदौर हाईकोर्ट में इसका आदेश सुनाया। इस बैंच ने सुनवाई भी इंदौर में ही की थी, क्योंकि केस इंदौर का था।
2020 में नगर निगम ने किया था ठेका रद्द
इंदौर नगर निगम ने सांवेर विधानसभा क्षेत्र के वार्ड-21 स्थित अमरापुरी में सीसी रोड बनाने का ठेका नितिन इंटरप्राइजेस को दिया था। यह ठेका करीब 60 लाख रुपए का था।
नवंबर 2020 में नगर निगम ने ठेका रद्द कर दिया। निगम का कहना था कि सांवेर विधानसभा उपचुनाव के दौरान आचार संहिता लागू थी। इसके बावजूद ठेकेदार ने निर्माण कार्य किया और अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन किया।
इसके बाद नगर निगम ने तीन कार्रवाई कीं...
- ठेका रद्द कर दिया।
- कंपनी को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट किया।
- करीब ढाई लाख रुपए की बैंक गारंटी जब्त कर ली।
नितिन लोदवाल ने अधिवक्ता अमित मिश्रा के माध्यम से इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
लार्जर बेंच बनाने की जरूरत क्यों पड़ी
ठेकेदारों की ब्लैकलिस्टिंग से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट के पहले के दो फैसलों में अलग-अलग राय सामने आई थी। वीवा हाईवेज मामले में कहा गया था कि ठेकेदार (CONTRACTOR) ब्लैकलिस्टिंग के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सकता है।
वहीं गौरी गणेश मामले में कहा गया था कि इस तरह के विवाद को मध्य प्रदेश मध्यस्थता अधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत ट्रिब्यूनल में ले जाना चाहिए। इन दोनों फैसलों के बीच कानूनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए सितंबर 2024 में पांच न्यायाधीशों की लार्जर बेंच बनाई गई थी।
हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया
पांच न्यायाधीशों की बेंच ने 4-1 के बहुमत से फैसला दिया। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया, जस्टिस सुबोध अभ्यंकर, जस्टिस विनय सराफ और जस्टिस आलोक अवस्थी फैसले के पक्ष में रहे।
जस्टिस विवेक अग्रवाल ने बहुमत की राय से असहमति जताई। अदालत ने स्पष्ट किया कि ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
ब्लैकलिस्टिंग केवल पैसे का विवाद नहीं
अधिवक्ता अमित मिश्रा के मुताबिक हाईकोर्ट ने माना कि किसी कंपनी या ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने के परिणाम बेहद गंभीर होते हैं। इससे उसे भविष्य में सरकारी ठेके मिलने बंद हो सकते हैं। उसकी बाजार में साख खराब होती है और व्यावसायिक अवसर भी छिन जाते हैं।
यह नुकसान केवल पैसों में नहीं मापा जा सकता। ब्लैकलिस्टिंग किसी कंपनी की प्रतिष्ठा पर कलंक की तरह होती है और कई बार उसके कारोबार के लिए घातक साबित हो सकती है।
ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार किसे है
हाईकोर्ट के अनुसार किसी कंपनी या ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश केवल मुख्य अभियंता या उसके बराबर रैंक का अधिकारी ही जारी कर सकता है। निचले स्तर का अधिकारी ऐसा फैसला नहीं ले सकता।
हाईकोर्ट कब करेगा सुनवाई
अदालत ने यह नहीं कहा कि ब्लैकलिस्टिंग का हर मामला सीधे हाईकोर्ट में ही सुना जाएगा। प्रत्येक याचिका पर उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर विचार होगा।
हाईकोर्ट मुख्य रूप से तब हस्तक्षेप कर सकता है, जब...
- ठेकेदार को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिला हो।
- कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हुई हो।
- किसी नागरिक या कंपनी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो।
- आदेश ऐसे अधिकारी ने दिया हो, जिसे इसका अधिकार नहीं था।
- ब्लैकलिस्टिंग मनमाने या अनुचित आधार पर की गई हो।
ट्रिब्यूनल की भूमिका क्या रहेगी
ठेके की रकम, भुगतान, नुकसान या दूसरे वित्तीय दावों से जुड़े विवाद मध्यस्थता अधिकरण में जा सकते हैं। अधिनियम की धारा 17-एबी के तहत अधिकरण उचित मामलों में अंतरिम राहत भी दे सकता है।
लेकिन ब्लैकलिस्टिंग प्रशासनिक कार्रवाई होने के कारण अधिकरण का अधिकार सीमित रहेगा। इसलिए ब्लैकलिस्टिंग की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती देने का रास्ता खुला रहेगा।
ठेकेदारों को कैसे मिलेगा फायदा
इस फैसले से मध्य प्रदेश की उन कंपनियों और ठेकेदारों को राहत मिल सकती है, जिन्हें किसी सरकारी विभाग, नगर निगम या अन्य सरकारी संस्था ने ब्लैकलिस्ट किया है।
अब वे प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, अधिकारी के अधिकार क्षेत्र या मनमानी कार्रवाई जैसे आधारों पर हाईकोर्ट जा सकेंगे। हालांकि ठेके की राशि और वित्तीय क्लेम के लिए उन्हें संबंधित ट्रिब्यूनल का रास्ता अपनाना पड़ सकता है।
नितिन इंटरप्राइजेस की मूल याचिका पर अब हाईकोर्ट में अलग से सुनवाई होगी। उसमें यह तय किया जाएगा कि इंदौर नगर निगम द्वारा ठेका रद्द करने, कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने और बैंक गारंटी जब्त करने की कार्रवाई कानूनी रूप से सही थी या नहीं।
इन सभी ने की पैरवी
इस लार्जर बैंच के सामने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अमित मिश्रा के साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता एके सेठी, वरिष्ठ अधिवक्ता पियूष माथुर, वरिष्ठ अधिवक्ता अमित अग्रवाल, वरिष्ठ अधिवक्ता वीर कुमार जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस छाबरा, वरिष्ठ अधिवकता नमन नागरथ, वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर शर्मा, अधिवक्ता अंशुमन सिंह, अधिवक्ता पियूष श्रीवास्तव, अधिवक्ता सुयश मोहन गुरु, अधिवक्ता अमित कुमार सिंह, एजी प्रशांत सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज मुंशी, अधिवक्ता सिद्दार्थ शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्तका सुमित नेमा, अधिवक्ता अनिकेत अभय नाइयक, अधिवक्ता अजय मिश्रा, अधिवक्ता नवनीश जोहरी, अधिवक्ता एचवाय मेहता अधिवक्ता रोहित मंगल, अधिवक्ता पार्थ शर्मा और अधिवक्ता विवेक रंजन पाण्डेय ने भी पक्ष रखे।
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