पति- पत्नी के बीच सेक्स को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, धाराओं से नहीं मापे जा सकते निजी पल
News In Short
- मप्र हाई कोर्ट ने तय किया कि पति-पत्नी के बीच सहमति या असहमति वाले संबंधों पर धारा 377 लागू नहीं होगी।
- कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बालिग पत्नी के साथ पति का यौन संबंध बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता।
- मामला एक महिला द्वारा लगाए गए दहेज प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ा था।
- हाई कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज धारा 377 के आरोपों को रद्द कर दिया है।
- हालांकि, दहेज और क्रूरता (धारा 498A) से जुड़े अन्य आरोपों पर मुकदमा जारी रहेगा।
News In Detail
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों (Marital Relations) और कानूनी धाराओं को लेकर एक जरूरी और दूरगामी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि पति-पत्नी के बीच होने वाले शारीरिक संबंधों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 के तहत अप्राकृतिक अपराध (Unnatural Offence) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की एकल पीठ ने यह आदेश बुधवार 25 मार्च को एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया।
क्या है पूरा मामला
यह मामला एक महिला द्वारा अपने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ। महिला का आरोप था कि शादी के समय उसके परिवार ने चार लाख रुपए और सोने के जेवर दिए थे। लेकिन शादी के बाद पति, ससुर, सास और ननद ने और अधिक दहेज (Dowry) की मांग शुरू कर दी।
महिला ने आरोप लगाया कि उससे 6 लाख रुपए और एक मोटरसाइकिल की मांग की गई और मांग पूरी न होने पर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
पत्नी ने लगाए यौन शोषण के गंभीर आरोप
पीड़ित महिला ने अपनी शिकायत में पति पर यौन कृत्य (Sexual Acts) के लिए मजबूर करने के गंभीर आरोप भी लगाए। पुलिस ने इन आरोपों के आधार पर आईपीसी की धारा 498A (क्रूरता), धारा 354 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना), डाउरी केस और धारा 377 (Unnatural Offence) के तहत मामला दर्ज किया था। पति ने इन आरोपों और एफआईआर को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
वैवाहिक दायरे से बाहर है धारा 377-हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कानूनी बारीकियों पर गौर करते हुए कहा कि वर्तमान कानूनी ढांचे के अनुसार, वैवाहिक संबंधों के भीतर होने वाले शारीरिक कृत्यों पर धारा 377 लागू नहीं होती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा 375 (बलात्कार) में मुख-मैथुन (Oral Sex) और गुदा-मैथुन जैसे कृत्यों का उल्लेख है। लेकिन इसी धारा में यह एक्सेप्शन भी है कि यदि पत्नी नाबालिग नहीं है, तो पति द्वारा बनाया गया यौन संबंध बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। इसी आधार पर कोर्ट ने पति के खिलाफ धारा 377 के आरोपों को रद्द कर दिया।
पति के वकील ने दलील दी थी कि महिला ने आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है और उसके बयानों में विरोधाभास है। इस प्रकार कोर्ट ने धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) को तो हटा दिया, लेकिन पति, सास और ससुर के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और क्रूरता के अन्य आरोपों को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। यानी अब इन अन्य धाराओं के तहत निचली अदालत में मुकदमा चलता रहेगा।
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