मप्र में वकीलों की फौज पर हर माह 2 करोड़ खर्च के बीच हाईकोर्ट की टिप्पणी- सार्वजनिक धन से मुकदमेबाजी करते हैं अधिकारी
अधिवक्ताओं पर हर महीने औसतन दो करोड़
मध्यप्रदेश में शासन हर साल नए सिरे से सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति करता है। इनमें महाधिवक्ता (एजी), अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) और उप महाधिवक्ता (डिप्टी एजी) शामिल हैं। इनके अलावा शासकीय अधिवक्ता (जीए) और उप शासकीय अधिवक्ता (डिप्टी जीए) भी नियुक्त होते हैं। अधिवक्ताओं की इस पूरी फौज पर सरकार हर महीने औसतन दो करोड़ रुपए खर्च करती है। हालांकि, कई मामले अधिकारियों के अनावश्यक आदेशों के कारण अदालतों तक पहुंच जाते हैं। इस पर इंदौर हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की
इंदौर नगर निगम के अधिकारियों ने बाफना अस्पताल को टैक्स डिमांड जारी की थी। यह डिमांड लैप्स हो चुके नियम के आधार पर जारी की गई थी। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो निगम अधिकारियों ने नोटिस वापस लेने की बात कही। इस पर हाईकोर्ट के जस्टिस संदीप एन. भट्ट ने अधिकारियों को फटकार लगाई। उन्होंने ऐसे अज्ञानी अधिकारियों के कारण अदालतों में मुकदमे बढ़ने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में याचिकाकर्ताओं को भी परेशान होना पड़ता है। साथ ही अधिकारी सार्वजनिक धन से मुकदमेबाजी करते हैं।
कोर्ट ने कहा कि गलत आदेशों की मुकदमेबाजी का खर्च जनता पर डालना ठीक नहीं है। इसलिए अधिकारियों को अपनी जेब से एक लाख रुपए की कॉस्ट जमा करने को कहा। साथ ही भविष्य में सतर्क रहने की हिदायत भी दी।
अब वकीलों की फौज देखिए
मध्यप्रदेश में महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के साथ 160 से ज्यादा सरकारी वकीलों की फौज मौजूद है। जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर हाईकोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट के लिए भी अधिवक्ता नियुक्त हैं।
जबलपुर में: यहां 8 एएजी, 5 डिप्टी एजी और 57 जीए नियुक्त हैं। इनके अलावा 5 डिप्टी जीए सहित कुल 75 अधिवक्ता हैं।
इंदौर में: यहां 2 एएजी, 2 डिप्टी एजी और 29 जीए नियुक्त हैं। इसके अलावा 6 डिप्टी जीए सहित कुल 39 अधिवक्ता हैं।
ग्वालियर में: यहां 3 एएजी, 2 डिप्टी एजी और 28 जीए नियुक्त हैं। इनके अलावा 4 डिप्टी जीए सहित कुल 37 अधिवक्ता हैं।
नई दिल्ली में: यहां 5 एएजी, 4 डिप्टी एजी और एक जीए नियुक्त हैं। इस तरह कुल 10 अधिवक्ता हैं।
निगम, आईडीए और पीएससी के भी अपने वकील
सरकारी अधिवक्ताओं के अलावा लगभग हर सरकारी संस्था ने अलग से वकील नियुक्त किए हैं। कई संस्थाओं ने अधिवक्ताओं के अलग पैनल भी बना रखे हैं। इंदौर नगर निगम की बात करें तो इसके पैनल में 30 से ज्यादा वकील हैं। वहीं, इंदौर विकास प्राधिकरण के पैनल में भी 250 से ज्यादा वकील शामिल हैं। इसके अलावा पीएससी और देवी अहिल्या विश्वविद्यालय ने भी अपने अलग अधिवक्ता नियुक्त किए हैं। इन अधिवक्ताओं को संबंधित संस्थाओं द्वारा ही भुगतान किया जाता है।
जिला कोर्ट में अलग वकील
सरकारी अधिवक्ताओं की नियुक्ति केवल हाईकोर्ट तक सीमित नहीं है। जिला अदालतों में भी शासन और उसके विभागों का पक्ष रखने के लिए अधिकारी नियुक्त हैं। इनमें जिला अभियोजन अधिकारी और सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी शामिल हैं। इन्हें भी हर महीने लाखों रुपए का भुगतान किया जाता है।
ओबीसी केस में फिर भी खामियां
इतने अधिवक्ता होने के बावजूद अदालतों में दायर मामलों में कई खामियां सामने आ रही हैं। हाल ही में चर्चित ओबीसी आरक्षण मामले में भी ऐसी स्थिति सामने आई है। इस मामले में सरकार हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई है। लेकिन अधिवक्ताओं की फौज होने के बावजूद याचिका में दस खामियां सामने आई हैं। इन खामियों को सुप्रीम कोर्ट ने चिह्नित किया है। इसके चलते यह मामला अभी तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो रहा है।
सरकार बड़े मामलों में केंद्र के सॉलिसिटर जनरल की भी मदद लेती है। इसके अलावा अनुबंध पर निजी अधिवक्ताओं की सेवाएं भी ली जाती हैं। इन निजी अधिवक्ताओं को करोड़ों रुपए का भुगतान किया जाता है। ओबीसी आरक्षण मामले में भी ऐसे निजी अधिवक्ताओं की सेवाएं ली गई थीं। इसके बावजूद अदालत में सरकार का पक्ष रखने में कमजोरियां रह जाती हैं।