जज की बेटी को मिलता रहेगा OBC का लाभ, पिता के वेतन से तय नहीं होगी क्रीमी लेयर- HC का आदेश
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की ग्वालियर पीठ ने अहम आदेश दिया है। मामला OBC क्रीमी लेयर (OBC Creamy Layer) से जुड़े प्रमाण पत्र का है। याचिकाकर्ता रागिनी राठौर ने OBC प्रमाण पत्र मांगा था। उनके पिता न्यायिक सेवा में जिला जज हैं। इसी वजह से उनका मामला क्रीमी लेयर नियमों से जुड़ गया। अधिकारियों ने पिता की आय देखकर उनका आवेदन खारिज किया था।
पिता की 16.99 लाख रुपए आय बनी विवाद की वजह
बता दें कि रागिनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सांघी पेश हुए। उनके साथ अधिवक्ता वेदिका और प्रतिभा भी उपस्थित रहीं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि रागिनी ने वर्ष 2020 में ऑनलाइन OBC प्रमाण पत्र मांगा था।
अधिकारियों ने उनके पिता की आय 16 लाख 99 हजार 282 रुपए बताई। इसी आधार पर आवेदन खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने इस फैसले के खिलाफ अपील की। अपर कलेक्टर ने भी उनका दावा स्वीकार नहीं किया। दोनों आदेशों को रागिनी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
पहले भी मिल चुका था नॉन क्रीमी लेयर प्रमाण पत्र
अधिवक्ता आदित्य सांघी ने कोर्ट को बताया कि रागिनी को पहले नॉन क्रीमी लेयर प्रमाण पत्र मिल चुका था। यह प्रमाण पत्र 19 मार्च 2014 को जारी किया गया था। उसमें उन्हें नॉन क्रीमी लेयर माना गया था। बाद में ऑनलाइन प्रमाण पत्र के लिए उन्होंने फिर आवेदन किया। इस बार पिता की वेतन आय को आधार बनाया गया। इसी बदलाव के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।
पिता की नौकरी का इतिहास भी बना अहम आधार
बता दें कि रागिनी के पिता पहले सिविल जज वर्ग-II के पद पर नियुक्त हुए थे। उन्हें 16 जून 2008 को सिविल जज वर्ग-I बनाया गया। याचिका में कहा गया कि यह पदोन्नति 40 साल बाद हुई थी। रागिनी ने इसी तथ्य को क्रीमी लेयर नियम से जोड़ा। उनका कहना था कि केवल पद और वेतन नहीं देखा जा सकता।
हाई कोर्ट ने केवल वेतन को आधार मानने पर सवाल उठाया
इस मामले की सुनवाई जस्टिस मिलिंद रमेश फडके ने की। कोर्ट ने कहा कि विवाद केवल वेतन की रकम से तय नहीं होगा। पिता की नौकरी की स्थिति भी देखना जरूरी है। उनकी पदोन्नति की तारीख भी जांचनी होगी। आय किस स्रोत से मिली, यह भी देखा जाना जरूरी है। इन पहलुओं की जांच पुराने आदेशों में नहीं हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले का भी असर
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया। यह फैसला यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन मामले में आया था। फैसला 11 मार्च 2026 को सुनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर नियमों पर अहम बातें स्पष्ट की थीं। केवल आय के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता।
वेतन और दूसरी आय में अंतर क्यों अहम
हाई कोर्ट ने कहा कि आय के स्रोत को भी देखना होगा। वेतन और कृषि आय का अलग नियमों में अलग असर हो सकता है। दूसरी आय को भी नियमों के अनुसार जांचना जरूरी है। इसलिए केवल सकल वेतन को अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता। माता-पिता का पद और सेवा श्रेणी भी महत्वपूर्ण है।
बेटी की अपनी आय को लेकर भी स्थिति साफ हुई
रागिनी ने खुद को बेरोजगार बताया था। उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की है। बार काउंसिल से सनद भी हासिल की है। लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के कारण वकालत नहीं कर रही हैं। याचिका के अनुसार उनकी अपनी कोई आय नहीं है। वह अपने माता-पिता पर निर्भर हैं।
हाई कोर्ट ने पुराने दोनों आदेश रद्द कर दिए
कोर्ट ने 23 अक्टूबर 2020 का आदेश रद्द कर दिया। यह आदेश एसडीओ राजस्व ने पारित किया था। इसके बाद 29 नवंबर 2022 का अपीलीय आदेश भी रद्द हुआ। यह आदेश अपर कलेक्टर अशोकनगर ने दिया था। दोनों आदेशों में पिता की आय को प्रमुख आधार बनाया गया था।
अब सक्षम अधिकारी को फिर से फैसला करना होगा
हाई कोर्ट ने मामला सक्षम अधिकारी को वापस भेज दिया है। अधिकारी को सभी संबंधित दस्तावेज फिर से देखने होंगे। पिता की सेवा स्थिति और पदोन्नति की तारीख भी देखनी होगी। उनकी आय के स्रोत की भी जांच करनी होगी। लागू सरकारी निर्देशों और अदालत के फैसले भी देखने होंगे।
छह सप्ताह में देना होगा नया और स्पष्ट आदेश
कोर्ट ने रागिनी को सुनवाई का मौका देने को कहा है। इसके बाद अधिकारी को नया फैसला देना होगा। आदेश प्रमाणित प्रति मिलने के छह सप्ताह में फैसला अपेक्षित है। नया आदेश कारणों के साथ और स्पष्ट होना चाहिए। यानी अधिकारी को केवल आय की रकम देखकर फैसला नहीं करना होगा।
हाई कोर्ट ने OBC लाभ पर अंतिम फैसला नहीं दिया
इस आदेश की सबसे अहम बात यही है। हाई कोर्ट ने रागिनी को OBC लाभ का अंतिम हक नहीं दिया। कोर्ट ने उनकी पात्रता पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अब सक्षम अधिकारी नियमों के अनुसार फैसला करेगा। इसलिए यह आदेश OBC प्रमाण पत्र मिलने की सीधी मंजूरी नहीं है।
इस फैसले का बड़ा मतलब क्या है
इस मामले से क्रीमी लेयर जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठता है। खासकर सरकारी नौकरी वाले माता-पिता के मामलों में नियम अहम हैं। केवल वेतन की रकम देखकर फैसला नहीं किया जा सकता। पद, सेवा श्रेणी और आय का स्रोत भी देखना होगा। अंतिम फैसला संबंधित नियमों और दस्तावेजों के आधार पर होगा।
मामले में किसकी ओर से कौन पेश हुआ
बता दें कि राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता मोनिका मिश्रा ने पक्ष रखा। सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित किया गया था। हाई कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया।
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