सुप्रीम कोर्ट की फटकार,कहा- यूपी पुलिस को खत्म कर दें, जानें क्या है एफआईआर मामला

Manya Jain | Sootr Creatives | Sept 30, 2026, 15:00 IST
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सुप्रीम कोर्ट की फटकार से पुलिस पर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट की फटकार से पुलिस पर उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट की फटकार से UP Police कठघरे में है। एक FIR में आरोपी का नाम पहले खाली छोड़ा गया। नाम सामने आने के बाद भी उसे तुरंत नहीं जोड़ा गया। अदालत ने पूछा कि लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे। कोर्ट ने सीबीआई जांच का जिक्र किया और यूपी पुलिस को खत्म कर दें जैसी बात भी कही। अखिलेश यादव ने पीडीए के साथ भेदभाव का आरोप लगाया।

    समझें क्या है पूरा मामला

    • सुप्रीम कोर्ट में एक सामान्य क्रिमिनल केस की सुनवाई हो रही थी।
    • पुलिस ने शुरू में अज्ञात के खिलाफ एफआईआर (First Information Report) दर्ज की थी।
    • जांच में मुख्य आरोपी का नाम सामने आ गया।
    • इसके बाद भी पुलिस ने नियम के मुताबिक उसका नाम तुरंत नहीं जोड़ा।
    • इसी चूक पर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस को आड़े हाथों लिया।

    सुप्रीम कोर्ट की फटकार में क्या कहा?

    सुनवाई के दौरान अदालत ने नाराजगी जाहिर की। उसने पूछा कि मामले ऐसे संभाले गए, तो लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे? यह सवाल सीधे पुलिस की साख से जुड़ा था।

    फिर कोर्ट ने और सख्त बात कही। उसके शब्द थे: "इससे तो अच्छा है कि हम यूपी पुलिस की सभी जांचों में सीबीआई (CBI) को शामिल करने के लिए कहें, या फिर हम यूपी पुलिस को ही खत्म कर दें।" कोर्ट ने कहा कि यह मनमानी और लापरवाही रुकनी चाहिए।

    सीबीआई जांच का जिक्र क्यों आया?

    कोर्ट ने सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) का नाम उसी समय लिया। तब वह पुलिस की जांच पर भरोसे का सवाल उठा रहा था। खबर में सीबीआई जांच के किसी औपचारिक आदेश का जिक्र नहीं है। यानी यह सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी है।

    यूपी पुलिस को खत्म कर दें: मतलब क्या?

    कोर्ट का यह वाक्य आदेश के रूप में सामने नहीं आया है। यह भी सुनवाई की टिप्पणी है। फिर भी तल्खी बताती है कि अदालत मामले को हल्के में नहीं ले रही।

    कोर्ट की चेतावनी क्या रही?

    सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस के आला अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि कोई पुलिस अधिकारी कानून और संविधान से ऊपर नहीं है।

    पुलिस ने मनमानी कार्यशैली तुरंत नहीं सुधारी, तो कोर्ट सख्त कदम उठाएगा। कोर्ट के मुताबिक इसकी पूरी जिम्मेदारी सीधे उत्तर प्रदेश शासन की होगी।

    सवाल अब सिर्फ एक एफआईआर का नहीं, भरोसे का है।

    तमिलनाडु देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय की फिर उठी पुरानी मांग, आईआईटी बॉम्बे सुसाइड केस में दर्ज SC-ST एक्ट का किया विरोध
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    तमिलनाडु का देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय का अनुसूचित जाति (SC)सूची से बाहर रखने की मांग कर रहा है। यह समुदाय राज्य की आबादी का करीब 9% है। नेता अनाथन अय्यासामी ने आईआईटी बॉम्बे सुसाइड केस में दर्ज SC-ST एक्ट का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि समुदाय आईआईटी बॉम्बे केस का समर्थन नहीं करता है।
    तमिलनाडु का देवेंद्रकुला वेल्लालर समुदाय का अनुसूचित जाति (SC)सूची से बाहर रखने की मांग कर रहा है। यह समुदाय राज्य की आबादी का करीब 9% है। नेता अनाथन अय्यासामी ने आईआईटी बॉम्बे सुसाइड केस में दर्ज SC-ST एक्ट का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि समुदाय आईआईटी बॉम्बे केस का समर्थन नहीं करता है।

    एफआईआर में नाम खाली रहना कितना गंभीर?

    अज्ञात के खिलाफ एफआईआर का मतलब है, आरोपी की पहचान तब पता नहीं थी। ऐसे मामलों में जांच आगे बढ़ती है और पहचान सामने आती है। इस केस में जांच के दौरान मुख्य आरोपी का नाम सामने आ चुका था।

    सोचिए एक बार। नाम पता चल गया। फिर भी पुलिस ने उसे नियम से दर्ज नहीं किया। अदालत ने इसी प्रक्रिया की खामी पर ध्यान दिया। उसने इसे गंभीर लापरवाही माना।

    अखिलेश यादव ने क्या आरोप लगाए?

    कोर्ट की टिप्पणी के बाद अखिलेश यादव ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष हैं। उन्होंने राज्य की भाजपा सरकार को घेरा।

    पीडीए के साथ भेदभाव का आरोप

    बीजेपी सरकार ने पहले दिन से ही भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया हुआ है। देश की अदालतों ने भी कई बार इस बात को नोट किया है और सरकार को फटकार लगाई है। उत्तर प्रदेश में इस समय सबसे ज्यादा भेदभाव पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज के लोगों के साथ किया जा रहा है। पुलिस प्रशासन का इस्तेमाल करके जानबूझकर एक खास वर्ग को निशाना बनाया जा रहा है।
    By: अखिलेश यादव, अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी
    ये आरोप अखिलेश यादव के हैं। सरकार की ओर से इन पर प्रतिक्रिया इस खबर में शामिल नहीं है। पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) को लेकर उनका निशाना सीधे पुलिस प्रशासन पर रहा।

    अब आगे क्या देखना होगा?

    सबसे पहले नजर रहेगी कि यूपी सरकार और आला अधिकारी क्या करते हैं। कोर्ट ने सुधार की चेतावनी दी है। अब देखना है, पुलिस प्रक्रिया में क्या सुधार करती है।

    खबर में अगली सुनवाई की तारीख या किसी नए आदेश का जिक्र नहीं है। इसलिए सीबीआई जांच जैसी बात फिलहाल कोर्ट की मौखिक टिप्पणी ही है।

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    चुनाव आयोग (Election Commission) ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पूरा कर चुके राज्यों में ऑनलाइन फॉर्म-6 से अतिरिक्त घोषणा पत्र हटा दिया है। फॉर्म-6 में आवेदक से पूछा जा रहा था कि क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम 2003 की वोटर लिस्ट में दर्ज था। अब नए मतदाता बनने के लिए आवेदन करने वालों से एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी नहीं मांगी जाएगी।

    यह खबर क्यों जरूरी है

    सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पुलिस के काम करने के तरीके पर सीधा सवाल है। एफआईआर किसी भी आपराधिक मामले की पहली सीढ़ी होती है। वहां चूक हो, तो आगे की जांच और न्याय पर असर पड़ सकता है।

    अदालत ने साफ कहा कि कोई पुलिस अधिकारी कानून और संविधान से ऊपर नहीं है। आम नागरिक के लिए यह भरोसे की बात है कि अदालत जवाबदेही मांग रही है। कानून का राज तभी मजबूत होता है, जब हर संस्था नियम से चले।


    FAQ

    1. सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस पर क्या टिप्पणी की?
      कोर्ट ने कहा कि इससे अच्छा है कि यूपी पुलिस की सभी जांचों में सीबीआई को शामिल करने के लिए कहें, या यूपी पुलिस को ही खत्म कर दें। यह टिप्पणी एक एफआईआर में आरोपी का नाम खाली छोड़ने और बाद में जोड़ने पर आई। यह सुनवाई के दौरान की टिप्पणी है।
    2. यह मामला किस बारे में था?
      मामला एक सामान्य क्रिमिनल केस का था। पुलिस ने शुरू में अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। आरोपी का नाम सामने आने के बाद भी उसे तुरंत नहीं जोड़ा गया।
    3. अखिलेश यादव ने क्या कहा?
      अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर पहले दिन से भेदभावपूर्ण रवैये का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा भेदभाव पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज के साथ हो रहा है। ये उनके आरोप हैं।
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