MP के 61 फीसदी जज वकील कोटे से, 42 में से 18 कर चुके सरकार की पैरवी

Amresh Kushwaha | Jan 31, 2026, 14:53 IST
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के आंकड़ों ने नई बहस छेड़ दी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 42 में से 26 जज वकील कोटे से हैं। इनमें से 18 ने पहले सरकार की पैरवी की थी।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। मीडिया रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्तमान में यहां पदस्थ कुल 42 न्यायाधीशों में से 26 वकील कोटे से नियुक्त हुए हैं। इसका मतलब है कि हर दूसरे जज का चयन वकील कोटे से हुआ है। इनमें से 3 अन्य हाईकोर्ट से ट्रांसफर होकर MP हाईकोर्ट पहुंचे हैं।



18 जज कर चुके सरकार की पैरवी

सर्वेक्षण के अनुसार, हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले 23 वकील जज के पद पर नियुक्त हुए हैं। इनमें से 18 ने जज बनने से पहले मध्यप्रदेश या केंद्र सरकार की पैरवी की थी। कई जज तो ऐसे भी हैं जिन्होंने जब सरकार की ओर से पैरवी की, उसी समय उनका नाम जज बनने के लिए कॉलेजियम में आया था।



इस आंकड़े के मुताबिक, हाईकोर्ट के 43% जजों ने सरकार के पक्ष में अदालत में पक्ष रखा था। हालांकि, इसे सिर्फ संयोग मानना या एक स्थापित ट्रेंड के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।



42 में से 16 जज सर्विस कोटे के

बता दें कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में कुल 42 जज हैं। इनमें से 16 जज सर्विस कोटे के हैं। इन 16 जजों में 4 जज एडिशनल हैं।



जस्टिस पुरुषेंद्र कौरव जब मप्र हाईकोर्ट के जज बने, तब वे महाधिवक्ता थे। वे 8 अक्टूबर 2021 को जज नियुक्त हुए थे। इसके बाद, जून 2022 में उनका दिल्ली हाईकोर्ट ट्रांसफर हो गया था।



हाईकोर्ट की नियुक्तियों में बढ़ता बार का प्रभाव

हालिया नियुक्तियों में वकील कोटे के जजों का प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ा है। 2023 से 2025 के बीच 11 वकील जज बने हैं। नई बेंच अब बार-ड्रिवन (वकील द्वारा संचालित) बनती जा रही है। हाल में नियुक्त हर दूसरा जज वकील कोटे से है।



2016 में 9 वकील एमपी हाईकोर्ट के जज बने थे। इनमें से अधिकांश अभी भी हाईकोर्ट में ही हैं। कुछ का ट्रांसफर हो गया, जबकि कुछ रिटायर हो गए हैं।



बार से बने जज का कार्यकाल लंबा

बार से जज बनने वाले ज्यादातर जजों का कार्यकाल लंबा होगा। इन जजों की रिटायरमेंट 2037 से 2041 के बीच हो सकती है। वहीं, सर्विस कोटे से आने वाले जजों का कार्यकाल 2026 से 2029 के बीच है। इसका मतलब है कि अगले 10 से 15 साल तक बेंच पर बार का प्रभाव रहेगा।



बार और ज्यूडिशियल कोटे के जजों में फर्क

रिटायर्ड जस्टिस केके लाहोटी ने बताया कि मैं ग्वालियर बेंच में एडिशनल एडवोकेट जनरल था। फिर हाई कोर्ट जज बना, कॉलेजियम का सदस्य और एक्टिंग चीफ जस्टिस भी रहा। सरकार की मंशा होती है कि कोर्ट में उनका पक्ष मजबूत तरीके से रखा जाए।



जज के चयन का काम कॉलेजियम का है। सभी से परामर्श, कानूनी ज्ञान और तर्क क्षमता के आधार पर नाम तय किए जाते हैं। हाई कोर्ट में वकील कोटे से बने अधिकांश जज कभी शासन के वकील रहे हैं, ये बस एक संयोग है।



Indian Judicial Services से हो जजों का चयन

कुछ रिटायर जजों का मानना है कि जजों का चयन भारतीय न्यायिक सेवा (Indian Judicial Services) से होना चाहिए, जैसा कि आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) के लिए होता है। उनका मानना है कि यह तरीका अधिक पारदर्शी और बेहतर होगा।



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