एमपी में बिना तैयारी कोर्ट पहुंचे सरकारी वकील पर हाईकोर्ट सख्त: मुख्य सचिव को भेजी रिपोर्ट

Ramanand Tiwari | Mar 12, 2026, 22:15 IST
Photograph: (the sootr)
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील की तैयारी पर सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने सरकारी वकील की क्षमता की समीक्षा के आदेश दिए हैं।

BHOPAL. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान राज्य के शासकीय अधिवक्ता की तैयारी पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने पाया कि सरकारी वकील केस की फाइल तक पढ़कर नहीं आए थे और न्यायालय की कोई मदद नहीं कर सके। इसे गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश की प्रति भेजने के निर्देश दिए हैं और कहा है कि शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति योग्यता और क्षमता के आधार पर होनी चाहिए।



हाईकोर्ट ने राज्य के सरकरी वकीलों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि आपराधिक अपील की सुनवाई में राज्य की ओर से उपस्थित सरकारी वकील केस की तैयारी करके नहीं आए थे और न्यायालय के सवालों का संतोषजनक जवाब भी नहीं दे सके।



हाईकोर्ट ने इसे गंभीर स्थिति मानते हुए आदेश की प्रति मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि शासकीय अधिवक्ताओं की सूची की समीक्षा कर उनकी योग्यता और दक्षता का परीक्षण किया जा सके।



यह टिप्पणी हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में लंबित आपराधिक अपील (लंका प्रसाद बसोर एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश राज्य) की सुनवाई के दौरान सामने आई। इस मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की खंडपीठ ने की।



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क्या है मामला

यह मामला सिंगरौली जिले के वैढ़न स्थित सत्र न्यायालय के 21 नवंबर 2017 के फैसले से जुड़ा है। सत्र न्यायालय ने दो आरोपियों को हत्या और मारपीट के आरोप में दोषी ठहराया था।



निचली अदालत ने आरोपियों को तीन आरोपों में एक-एक वर्ष का कठोर कारावास और दो आरोपों में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही आरोपियों पर 500 और 1000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। जुर्माना न भरने पर अतिरिक्त जेल की सजा का प्रावधान भी रखा गया था।



हाईकोर्ट में किन आवेदनों पर सुनवाई

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दो अलग-अलग आवेदनों पर विचार किया गया। पहला आवेदन आरोपी शोभन बसोर की सजा निलंबित कर जमानत देने से संबंधित था। दूसरा आवेदन आरोपी बच्चेलाल बसोर की सजा निलंबन और जमानत की मांग से जुड़ा था।



एफआईआर में नाम नहीं, इसलिए शोभन बसोर को राहत-

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि 21 अप्रैल 2009 को थाना सरई, जिला सिंगरौली में दर्ज एफआईआर में शोभन बसोर का नाम ही नहीं है। एफआईआर में केवल पांच लोगों के नाम दर्ज थे। इनमे रामू बसोर, लंका बसोर, संतोष बसोर, जियालाल बसोर, और बच्चेलाल बसोर।



न्यायालय में दलील दी गई कि शोभन बसोर का नाम बाद में बिना स्पष्ट भूमिका बताए शामिल किया गया। रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद अदालत ने माना कि अपील के अंतिम निर्णय में समय लगेगा, इसलिए फिलहाल शोभन बसोर की शेष सजा निलंबित कर उसे जमानत दी।



लाठी पर मिला खून, बच्चेलाल को राहत नहीं

दूसरे आरोपी बच्चेलाल बसोर के मामले में अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने पाया कि एफएसएल रिपोर्ट में बच्चेलाल बसोर से बरामद लाठी पर खून के निशान पाए गए थे। इसके अलावा मामले में चश्मदीद गवाह भी मौजूद हैं। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने कहा कि इस स्तर पर सजा निलंबित करने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए बच्चेलाल बसोर की जमानत और सजा निलंबन की याचिका खारिज कर दी गई।



सरकारी वकील की तैयारी पर हाईकोर्ट की नाराजगी

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के शासकीय अधिवक्ता कमल सिंह बघेल की तैयारी पर भी कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि सरकारी वकील केस की फाइल पढ़कर नहीं आए थे और न्यायालय की कोई सहायता नहीं कर सके। अदालत ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा कि राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शासकीय अधिवक्ताओं की नियुक्ति केवल योग्यता और क्षमता के आधार पर हो।



हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि इस पूरे मामले की जानकारी मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को भेजी जाए, ताकि शासकीय अधिवक्ताओं की सूची की समीक्षा कर उनकी क्षमता और दक्षता का परीक्षण किया जा सके।



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