यूनियन कार्बाइड मामला: हाईकोर्ट ने पूछा, 900 मीट्रिक टन राख के निष्पादन पर क्यों नहीं लगी रोक

Sanjay Sharma | Apr 23, 2026, 16:37 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) की 900 मीट्रिक टन जहरीली राख (Toxic Ash) पर हाईकोर्ट ने सख्ती से सरकार से जवाब मांगा है। पीथमपुर में निपटान पर विवाद में अब अगली सुनवाई 22 जून को है।

News in short

  • हाईकोर्ट ने सरकार से जहरीली राख पर जवाब मांगा।
  • 900 मीट्रिक टन राख में पारा और भारी धातुएं मिलीं।
  • जस्टिस श्रीधरन ने पीथमपुर में निपटान से रोका था।
  • दिसंबर 2025 में दूसरी बेंच ने पीथमपुर में अनुमति दी।
  • यूसीआईएल परिसर के 21 गड्ढों में अब भी कचरा दबा।

News in Detail

भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) का जहर अब भी खत्म नहीं हुआ। यूनियन कार्बाइड (Union Carbide) के 900 मीट्रिक टन जहरीली राख (Toxic Ash) का मामला फिर हाईकोर्ट पहुंचा है। जस्टिस सिंह और जस्टिस निरंकारी की बेंच ने राज्य सरकार से जवाब मांगा।



यह राख पीथमपुर की रैमकी रिसस्टेनेबिलिटी वेस्ट मैनेजमेंट फैसिलिटी में दफन है। याचिका में कहा गया कि राख में पारा और भारी धातुएं हैं। इससे पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को खतरा है। सरकार ने अब तक सफाई की समयसीमा नहीं बताई। अगली सुनवाई 22 जून को होगी।



हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

यूनियन कार्बाइड का कचरा और राख के निपटारे के विवाद पर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की है। जिसके बाद राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है। यह सुनवाई बीजीपीएसएसएस के आवेदन पर हो रही है।



संस्था ने पीथमपुर में दफनाई गई 900 मीट्रिक टन कचरे की राख पर याचिका लगाई है। जिसके जरिए कार्बाइड कारखाने के कचरे की राख की विषाक्तता पर सवाल उठाए गए हैं। संस्था ने 16 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जहां से उन्हें हाईकोर्ट जाने कहा गया था।



विशेषज्ञों ने भी जताई है चिंता

जुलाई 2025 में बीजीआईए ने याचिका दाखिल की थी। जिसमें कार्बाइड कारखाने के कचरे और राख में बड़ी मात्रा में पारा होने का अंदेशा जताया था। आईआईटी प्रोफेसर डॉ. आसिफ कुरैशी ने भी राख में जहरीले पदार्थ होने के संबंध में शपथ पत्र दिया है। उनके द्वारा इसे लैंडफिल में दफनाने से पर्यावरण और भूमिगत जल में मिलने से खतरा होने की आशंका जताई है।



पीथमपुर में निष्पादन पर विवाद

जस्टिस श्रीधरन की बेंच ने पहला आदेश जुलाई में दिया था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में फिर निर्देश जारी किए गए। कोर्ट ने सरकार से वैकल्पिक जगह तलाशने को कहा था। वहीं मानव आबादी का हवाला देकर कोर्ट ने पीथमपुर में निपटारे रोका है। जिसके खिलाफ सरकार ने नई अपील पेश की है। अब सरकार ने जस्टिस श्रीधरन के आदेश को वापस लेने की अपील की है। दिसंबर 2025 में बेंच ने सरकार की अर्जी मंजूर की थी।



डाउ कैमिकल्स उठाएगा खर्च!

याचिकाकर्ता ने "पॉल्यूटर पेज" सिद्धांत का उल्लेख किया है। जिसके तहत यूनियन कार्बाइड ही इसके लिए जिम्मेदार है। उन्होंने निष्पादन का खर्च डाउ केमिकल द्वारा उठाने पर भी जोर दिया है। कंपनी को न केवल सफाई का खर्च देना होगा बल्कि उपचार लागत भी उठानी होगी।



हाईकोर्ट के नोटिस पर सरकार ने अब तक शपथ पत्र नहीं दिया। वहीं कोर्ट को सफाई की योजना और समय सीमा भी नहीं बताई गई है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 जून को होगी।



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