एमपी के संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को मिलेगा न्यूनतम वेतन, 10 साल की सेवा को मिली मान्यता
News In Short
- मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने संविदा-आउटसोर्स कर्मियों के लिए बड़ा फैसला लिया है।
- 10 साल से ज्यादा काम कर रहे कर्मियों को स्थायी श्रेणी का लाभ नहीं मिल रहा था।
- प्रदेश में ऐसे कर्मचारियों की संख्या 5 लाख से अधिक है।
- आउटसोर्स कर्मियों को अभी नियमित वेतन से आधा वेतन ही मिल रहा है।
- कर्मचारियों ने 7 अक्टूबर 2016 को याचिका दाखिल कर न्यूनतम वेतन की मांग की थी।
News In Detail
MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने प्रदेश के सरकारी विभागों में काम कर रहे संविदा, आउटसोर्स और अंशकालिक कर्मचारियों के हक में एक बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि 10 साल से ज्यादा समय से काम कर रहे ऐसे कर्मचारियों को स्थायी श्रेणी के लाभ से वंचित रखना सही नहीं है। इन कर्मचारियों को अब न्यूनतम वेतन दिया जाना जरूरी होगा।
प्रदेश में इस समय करीब 2.5 लाख संविदा कर्मचारी हैं। बिजली कंपनियों में लगभग 1.50 लाख और सरकारी विभागों में करीब एक लाख आउटसोर्स कर्मचारी काम कर रहे हैं। इसके अलावा करीब 12 हजार अंशकालिक कर्मचारी भी हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या पांच लाख से ज्यादा है।
16 साल की सेवा, फिर भी न्याय नहीं
कोर्ट ने 16 साल से ज्यादा समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के मामले पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कर्मचारियों को वर्गीकरण और उससे जुड़े लाभ मिलने चाहिए। उन्हें अन्य कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन देना कतई उचित नहीं है।
आउटसोर्स को मिलता है आधा वेतन
संविदा कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन तो तय किया गया है, लेकिन उनकी सेवाओं की निरंतरता हर साल की वैल्यूएशन पर निर्भर रहती है। वहीं आउटसोर्स कर्मचारियों को 8 से 10 हजार रुपए तक वेतन दिया जा रहा है, जबकि उन्हीं पदों पर नियमित कर्मचारी इससे दोगुना पाते हैं। यह स्थिति आर्थिक रूप से बेहद अन्यायपूर्ण है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि लंबे समय से काम कर रहे इन कर्मचारियों को आजीविका के पर्याप्त साधन, आर्थिक न्याय और सम्मानजनक जीवन स्तर से वंचित नहीं किया जा सकता।
सरकार क्यों नहीं दे रही हक?
कोर्ट ने माना कि सरकार लगातार इन कर्मचारियों को संविदा आधार पर नियुक्त करती रही है। हर साल वैल्यूएशन कर इनकी सेवाएं जारी रखी जाती हैं। वहीं, उन्हें स्थायी श्रेणी का दर्जा नहीं दिया जाता। यह स्पष्ट है कि सरकार को इनकी सेवाओं की जरूरत है। इसके बाद भी नीतिगत रूप से वर्गीकरण और न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने से बचा जा रहा था।
कर्मचारियों ने 07 अक्टूबर 2016 की नीति के तहत वर्गीकरण और न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी।
कोर्ट ने दिए ये अहम निर्देश
इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने सभी श्रेणी के कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि लंबे समय से काम कर रहे इन कर्मचारियों को आजीविका के पर्याप्त साधन, आर्थिक न्याय और सम्मानजनक जीवन स्तर से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट का यह आदेश न केवल इन कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है, बल्कि यह पूरे प्रदेश के संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य को एक नई दिशा देता है।
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