जस्टिस राजेश गुप्ता के विवादित आदेशों पर अब इन-हाउस जांच, सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला वापस

Neel Tiwari | Apr 24, 2026, 13:17 IST
mp highcourt judges
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जजों की विवादित टिप्पणियों के मामले में बड़ा फैसला लेते हुए सुप्रीम कोर्ट जाने का अपना पुराना आदेश वापस ले लिया है। अब इस पूरे मामले की जांच अदालत के अंदर ही प्रशासनिक समिति के जरिए होगी।

News in short

  • हाईकोर्ट ने 22 सितंबर 2025 का सुप्रीम कोर्ट जाने का आदेश वापस लिया।
  • जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता के दो आदेशों पर विवाद शुरू हुआ।
  • पहले विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने के निर्देश दिए गए थे।
  • अब मामला प्रशासनिक समिति के पास विचाराधीन है।

News in detail

जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जजों की टिप्पणियों से जुड़े एक अहम मामले में अपना रुख बदलते हुए फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने 22 सितंबर 2025 को जस्टिस अतुल श्रीधरन के दिए गए उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें रजिस्ट्रार जनरल को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने के निर्देश दिए गए थे।





रिकॉर्ड तलब और विजिलेंस जांच के बाद बदली दिशा

मामले में आगे बढ़ते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित रिकॉर्ड तलब किए और प्रिंसिपल रजिस्ट्रार (विजिलेंस) से रिपोर्ट भी मांगी। इसके बाद पूरे प्रकरण को प्रशासनिक समिति के पास भेज दिया गया। जहां इस पर आंतरिक स्तर पर विचार शुरू हुआ।



सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पड़ा सीधा असर

सुनवाई के दौरान 9 अप्रैल 2026 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले Shuvendu Saha vs State of West Bengal का हवाला दिया गया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि अगर किसी न्यायिक आदेश में कमी दिखे तो पहले उसे इन-हाउस मैकेनिज्म के जरिए ही जांचा जाना चाहिए, न कि सीधे बाहरी मंच पर ले जाया जाए।



अब प्रशासनिक समिति करेगी पूरी जांच

हाईकोर्ट ने साफ किया कि मध्य प्रदेश में पहले से ऐसी व्यवस्था लागू है, जिसमें जजों की टिप्पणियों या सिफारिशों को प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जाता है। अब यही समिति इस पूरे मामले पर निर्णय लेगी और आगे की कार्रवाई उसी के आधार पर होगी।



सुओ मोटू कार्यवाही समाप्त, इन-हाउस सिस्टम को बढ़ावा

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि चूंकि मामला प्रशासनिक समिति के पास लंबित है, इसलिए स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) कार्यवाही को समाप्त किया जाता है। इस फैसले को न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही और अनुशासन को मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है, जो यह संकेत देता है कि हर विवाद का समाधान अदालत के भीतर भी संभव है।



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