एमपी मंत्रियों की संपत्ति पर 13 साल से परदा, चुनाव में दिखाई जायदाद, मंत्री बनते ही भूल गए
पीएम मोदी हर साल अपनी पूरी संपत्ति का हिसाब सार्वजनिक कर देते हैं। उनके कई मंत्री भी यही करते हैं। वहीं, मध्य प्रदेश के मंत्रियों ने पिछले 13 साल में एक बार भी यह नहीं किया।
है न गजब!
न कोई सवाल! न कोई जुर्माना! न कोई कार्रवाई!
pm modi और उनके मंत्रियों की संपत्ति की घोषणा देखने के लिए क्लिक करें
यह मामला आपसे कैसे जुड़ा है?
जिस समय आप एक नागरिक के रूप में किसी नेता को वोट देते हैं तो दोनों के बीच एक अलिखित समझौता होता है। समझौता पारदर्शिता और ईमानदारी का… लेकिन क्या आप जानते हैं कि वह नेता पांच साल में कितना अमीर हुआ? उसकी जमीनें बढ़ीं या घटीं? उसके बैंक खाते में क्या आया-गया? यह जानना आपका हक है। और यही हक 13 साल से दबाया जा रहा है।
मंत्रियों की संपत्ति घोषणा क्यों है जरूरी?
साल 2009 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) बनाई थी। इसके तहत हर मंत्री को पद संभालते ही दो महीने के भीतर अपनी और परिवार की पूरी संपत्ति और देनदारियों का ब्योरा सार्वजनिक करना था।
यह राज्य सरकारों पर भी लागू था। हर साल 31 अगस्त तक यह घोषणा होनी थी। साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने भी इसे सख्ती से लागू किया। खुद भी किया, अपने मंत्रियों से भी करवाया। केंद्र के स्तर पर तो यह परंपरा आज भी जारी है, लेकिन राज्यों में यह परंपरा कब की मर चुकी है।
मध्यप्रदेश के ऐसे हैं हाल
आदर्श आचार संहिता 2009 के तहत मंत्रियों को हर साल संपत्ति घोषित करनी होती है। मध्य प्रदेश में यह आखिरी बार 2013 में हुआ, जब शिवराज सिंह चौहान और 16 मंत्रियों ने ब्योरा दिया था।
2014 के बाद से तीन बार सरकारें आईं, लेकिन एक बार भी घोषणा नहीं हुई। MP विधानसभा की वेबसाइट पर वह सेक्शन (section) आज भी खाली पड़ा है। इसके पीछे कोई कानून नहीं है, इसलिए न जुर्माना है, न कोई कार्रवाई।
जब तक बताते थे, क्या बताते थे?
साल 2013 वह आखिरी साल था, जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल ने विधानसभा को अपनी संपत्ति का पूरा ब्योरा दिया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उस साल बताया था कि भोपाल के रिवेरा टाउन में उनका एक मकान है जिसकी कीमत 31 लाख रुपए थी। विदिशा में कृषि भूमि थी। बैंक में जमा और नकदी मिलाकर 17 लाख रुपए थे। पत्नी साधना सिंह के नाम पर 470 ग्राम सोना, दो प्लॉट और कई अचल संपत्तियां थीं।
शिवराज के मंत्रियों ने भी उस साल खुलकर बताया था। बाबूलाल गौर के पास भोपाल में 2257 वर्ग फीट का भवन था और बैंक में 33 लाख रुपए से ज्यादा जमा थे। कैलाश विजयवर्गीय ने इंदौर के नंदानगर में 25 लाख का भवन, 22 लाख की कृषि भूमि और परिवार के नाम पर कई संपत्तियां घोषित की थीं।
जयंत मलैया की घोषणा सबसे विस्तृत थी। दमोह में हॉस्टल भवन, सागर में भूखंड, इंदौर में फ्लैट, भोपाल में भवन। पत्नी के पास 1170 ग्राम सोना जिसकी अनुमानित कीमत 41 लाख रुपए थी। यह सब कागज पर था, सार्वजनिक था, विधानसभा की वेबसाइट पर था। 2014 के बाद यह सब बंद हो गया।
तीन सरकारें, एक जैसी चुप्पी
14वीं विधानसभा में शिवराज सिंह चौहान दोबारा मुख्यमंत्री बने। उनके मंत्रिमंडल में ज्यादातर वही चेहरे थे, जिन्होंने 2013 में घोषणा की थी। फिर भी 2014 से 2018 तक एक बार भी यह नहीं हुआ।
15वीं विधानसभा में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी। कांग्रेस ने भाजपा पर पारदर्शिता के सवाल उठाए थे। इसके बावजूद, उनकी सरकार ने भी यही किया।
अब 16वीं विधानसभा में मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार है। डेढ़ साल से ज्यादा हो चुके हैं। एक भी घोषणा नहीं। तीन मुख्यमंत्री, दो अलग-अलग दल, 13 साल। लेकिन एक मामले में सब एकमत हैं।
कानून होता तो क्या होता?
इसे एक सीधे उदाहरण से समझिए। इनकम टैक्स (Income Tax) भरना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसीलिए लोग भरते हैं। अगर कानून न होता, तो कितने लोग स्वेच्छा से भरते?
मंत्रियों की संपत्ति घोषणा की स्थिति ठीक यही है। आचार संहिता है, नैतिक दायित्व है, लेकिन कानून नहीं है। इसलिए न FIR होती है, न जुर्माना लगता है, न बर्खास्तगी होती है।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल कहते हैं कि मंत्री और विधायक लोकसेवक हैं। जनता के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं। उन्हें अपनी संपत्ति का ब्योरा वार्षिक रूप से सार्वजनिक करना ही चाहिए। उनके मुताबिक अभी यह व्यवस्था केवल औपचारिकता भर है इसीलिए मंत्री इसे जरूरी नहीं समझते। इसे कानूनी दायित्व बनाना जरूरी है।
चुनाव में देते हैं संपत्ति की जानकारी फिर मंत्री बनने पर क्यों नहीं?
हर उम्मीदवार को चुनाव के समय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को संपत्ति का हलफनामा (Affidavit) देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। यह जानकारी आयोग की वेबसाइट पर सार्वजनिक होती है। कोई भी नागरिक इसे देख सकता है।
यानी उम्मीदवार के रूप में पारदर्शिता अनिवार्य है। लेकिन जैसे ही वह मंत्री बनता है, यह अनिवार्यता खत्म हो जाती है। पांच साल तक उसकी संपत्ति बढ़ती रहे, घटती रहे, कोई जानने का हकदार नहीं।
विधानसभा की वेबसाइट पर क्या है?
एमपी विधानसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर 2011, 2012 और 2013 की संपत्ति घोषणाएं अभी भी उपलब्ध हैं। वेबसाइट में वह सेक्शन (section) मौजूद है। लेकिन 2013 के बाद का कोई ब्योरा वहां नहीं है।
सरकार ने पुरानी घोषणाएं हटाई नहीं हैं। नई घोषणाएं अपलोड (upload) नहीं की हैं। वेबसाइट खुली है। सेक्शन (Section) खाली है। और 13 साल से कोई इसे भरने नहीं आया।
( चाहें तो आप भी वेबसाइट चेक कर सकते हैं- )
यहां देखें मंत्रियों द्वारा विधानसभा में 2013 में घोषित संपत्ति का ब्योरा
यहां देखें मंत्रियों द्वारा विधानसभा में 2012 में घोषित संपत्ति का ब्योरा
यहां देखें मंत्रियों द्वारा विधानसभा में 2011 में घोषित संपत्ति का ब्योरा
आगे क्या होना चाहिए?
अजय बोकिल जैसे जानकारों का मानना है कि इसके लिए तीन कदम जरूरी हैं।
- पहला यह कि संसद में एक कानून बने जो सभी राज्यों के मंत्रियों को सालाना संपत्ति घोषणा के लिए कानूनी रूप से बाध्य करे।
- दूसरा यह कि यह घोषणा विधानसभा की वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से अपलोड हो।
- तीसरा यह कि न करने पर कोई ठोस दंड हो। सिर्फ कागज पर नहीं, असल में।
जब तक यह नहीं होता, यह खेल चलता रहेगा। सरकारें बदलती रहेंगी। वेबसाइट का वह सेक्शन खाली रहेगा।
यह खबर क्यों जरूरी है?
भारत के संविधान में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही एक मूल सिद्धांत है। मध्य प्रदेश के मंत्री जनता के धन से चलते हैं और जनता की सेवा के लिए चुने जाते हैं। जब वे 13 साल तक अपनी संपत्ति का हिसाब नहीं देते, तो लोकतांत्रिक पारदर्शिता कमजोर होती है। यह सिर्फ एक आंकड़े की बात नहीं है। जब नागरिक अनजान रहते हैं, तो जवाबदेही की मांग कभी नहीं उठती और भ्रष्टाचार की जांच का पहला सूत्र भी नहीं मिलता।
FAQ
- मध्य प्रदेश में मंत्रियों की संपत्ति घोषणा आखिरी बार कब हुई थी?
2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके 16 मंत्रियों ने आखिरी बार विधानसभा को संपत्ति का पूरा ब्योरा दिया था। उसके बाद 14वीं, 15वीं और 16वीं विधानसभा में किसी भी मुख्यमंत्री या मंत्री ने यह घोषणा नहीं की। - मंत्री संपत्ति घोषणा न करें तो क्या कार्रवाई होती है?
अभी कोई कानूनी दंड नहीं है। यह सिर्फ आदर्श आचार संहिता का हिस्सा है, कोई कानून नहीं। इसलिए न कोई FIR होती है, न जुर्माना लगता है, न पद जाता है। नैतिक दबाव ही एकमात्र जरिया है जो व्यवहार में काम नहीं कर रहा। - क्या MP के मंत्रियों की संपत्ति की जानकारी कहीं मिल सकती है?
चुनाव के समय निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर हर उम्मीदवार का हलफनामा सार्वजनिक होता है। MP विधानसभा की वेबसाइट पर 2011, 2012 और 2013 की घोषणाएं उपलब्ध हैं। लेकिन 2013 के बाद का कोई ब्योरा वहां नहीं है।
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