MP में हर 100 में 14 लोग मानसिक बीमारी के शिकार, CAG रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
समझें क्या है पूरा मामला
- CAG ने MP मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर रिपोर्ट जारी की।
- राज्य में 100 में करीब 14 लोग प्रभावित हैं।
- मानसिक बीमारी का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।
- अस्पतालों में दवाओं और उपकरणों की कमी मिली।
- मानसिक स्वास्थ्य विभाग में 67% पद खाली हैं।
राष्ट्रीय औसत से ज्यादा मरीज
कैग के अखिल भारतीय परफॉर्मेंस ऑडिट के मुताबिक मध्य प्रदेश की कुल आबादी का 13.9% हिस्सा मानसिक बीमारी से जूझ रहा है। देश का राष्ट्रीय औसत 10.7% है। इसका मतलब है कि राज्य में हर 100 में से लगभग 14 लोग मानसिक समस्याओं से ग्रस्त हैं।
यह आंकड़ा एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है। इतनी बड़ी संख्या के बावजूद इलाज का ढांचा बेहद कमजोर पाया गया।
दवाओं और उपकरणों की भारी कमी
सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में एक से 36 महीने तक दवाएं गायब रहीं। पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 47% से 100% तक उपकरणों की भारी कमी पाई गई। मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 (Mental Healthcare Act, 2017) के तहत मुफ्त दवाएं देने का प्रावधान है।
राज्य की ड्रग पॉलिसी में बफर स्टॉक रखना भी अनिवार्य है। इसके बावजूद मरीजों को दर-दर भटकना पड़ रहा है। नियम कागजों पर हैं, लेकिन जमीन पर हालात बेहद खराब हैं।
स्टाफ की कमी, रेडियोलॉजिस्ट तक नहीं
विभिन्न संस्थानों में 13% से 67% तक पद रिक्त पाए गए। 2021 से 2024 के बीच राज्य के दोनों सरकारी मानसिक अस्पतालों में एक भी रेडियोलॉजिस्ट तैनात नहीं था। इस वजह से मनोचिकित्सकों को खुद ही एक्स-रे और अन्य जांच रिपोर्ट देखनी पड़ीं। यह स्थिति मरीजों के सही इलाज पर सीधा असर डालती है। विशेषज्ञों की कमी से पूरा सिस्टम दबाव में काम कर रहा है।
बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव
अस्पतालों में पीने के साफ पानी, अलग वार्ड और पर्याप्त बिस्तरों की भी कमी पाई गई। साफ-सुथरे शौचालयों जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नदारद हैं। स्थिति इतनी खराब है कि निरीक्षण किए गए किसी भी केंद्र में नाबालिगों के लिए अलग व्यवस्था नहीं थी। यह लापरवाही मानसिक स्वास्थ्य कानून के प्रावधानों के सीधे खिलाफ है। मरीजों की गरिमा और सुरक्षा दोनों पर सवाल खड़े होते हैं।
निगरानी तंत्र की भी नाकामी
कैग रिपोर्ट में स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी के कामकाज पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। इस अथॉरिटी के गठन में ढाई साल से ज्यादा की देरी हुई। विशेषज्ञों की कमी के चलते यह जुलाई 2025 तक केवल आंशिक रूप से ही काम कर पाई। राज्य के 163 मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में से सिर्फ 82 ही रजिस्टर्ड हैं। बाकी 81 संस्थान बिना किसी रजिस्ट्रेशन के चलाए जा रहे हैं। यह नियमों की खुलेआम अनदेखी दिखाता है।
भोजन के बजट पर भी सवाल
इंदौर और ग्वालियर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों के खाने पर रोजाना मात्र 48 और 65 रुपए ही खर्च किए जा रहे हैं। यह राशि मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों से काफी कम है। यह आंकड़ा मरीजों की बुनियादी देखभाल पर सीधा सवाल खड़ा करता है। कैग की यह पूरी रिपोर्ट मध्य प्रदेश की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की तत्काल जरूरत की ओर इशारा करती है।
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