विकास पर 1 लाख करोड़ खर्च करेगी मोहन सरकार, समझिए 87 हजार करोड़ ऋण सीमा का पूरा गणित
सरकार का दावा है कि यह पैसा सड़क, बांध, बिजली और केन-बेतवा परियोजना जैसे कामों पर खर्च हो रहा है।
जनसंपर्क संचालनालय ने 4 अक्टूबर 2026 को भोपाल से यह जानकारी जारी की। सरकार का कहना है कि यह पैसा सड़क, बांध, बिजली और मेडिकल कॉलेज पर लग रहा है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, मध्यप्रदेश सरकार आरबीआई के जरिए बाजार से कर्ज लेती है। वित्त वर्ष 2026-27 में कर्ज सीमा करीब 87 हजार करोड़ रुपए है। सितंबर 2026 तक सरकार 37 हजार 400 करोड़ रुपए ले चुकी है। सरकार का कहना है कि यह कर्ज विकास कार्यों पर खर्च होता है। इस साल पूंजीगत खर्च का लक्ष्य एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है।
अब तक 37 हजार 400 करोड़ कर्ज
मध्य प्रदेश सरकार सितंबर 2026 तक 37 हजार 400 करोड़ रुपए कर्ज (MP government debt) ले चुकी है। यह 87 हजार करोड़ रुपए की तय कर्ज सीमा का करीब 43 प्रतिशत है।
इस हिसाब से मार्च 2027 तक करीब 49 हजार 600 करोड़ रुपए की गुंजाइश बाकी है। सरकार का कहना है कि जरूरत पड़ने पर आगे भी कर्ज लिया जाएगा। यह पूरा कर्ज केंद्र सरकार की तय सीमा के भीतर ही लिया जाएगा।
एमपी की कर्ज सीमा कौन तय करता है?
मध्य प्रदेश सरकार अपनी मर्जी से कितना भी कर्ज नहीं ले सकती। संविधान के अनुच्छेद 293(3) के तहत कई मामलों में केंद्र की सहमति जरूरी होती है। आम तौर पर राज्यों की सालाना कर्ज सीमा जीएसडीपी के करीब 3 प्रतिशत के आसपास तय की जाती है।
जीएसडीपी का मतलब है एक साल में राज्य की कुल आर्थिक पैदावार। 2026-27 के लिए मध्य प्रदेश की कर्ज सीमा करीब 87 हजार करोड़ रुपए तय की गई है। राज्य सरकार को कर्ज लेते समय एफआरबीएम कानून के नियमों का भी पालन करना होता है।
आरबीआई से कर्ज कैसे मिलता है
आरबीआई के ई-कुबेर प्लेटफॉर्म (RBI e-Kuber) के जरिए राज्य सरकार बाजार से कर्ज जुटाती है। इसी प्लेटफॉर्म पर स्टेट डेवलपमेंट लोन यानी एसडीएल की बोलियां लगती हैं। कोशिश रहती है कि सरकार को कम ब्याज पर पैसा मिल सके।
आरबीआई मंगलवार को ऐसी नीलामी करता है। अलग-अलग राज्यों के लिए तय शेड्यूल के मुताबिक नीलामी होती है। मध्य प्रदेश भी इसी प्रक्रिया से बाजार से कर्ज लेता है। आम तौर पर महीने में दो बार ऐसी नीलामी के जरिए कर्ज जुटाया जाता है।
लेकिन असली सवाल यह है कि यह पैसा जा कहां रहा है?
एमपी विकास परियोजनाएं कौन-सी हैं
सरकार का कहना है कि कर्ज का पैसा बड़े विकास कामों में लगाया जाता है। इसमें सड़कें, एक्सप्रेस-वे, सिंचाई परियोजनाएं, बांध, नहर और बिजली के काम शामिल हैं। स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, मेडिकल कॉलेज और पुलिस से जुड़े निर्माण भी इसी खर्च में आते हैं।
केन-बेतवा और पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना भी इसी सूची में
राज्य की बड़ी परियोजनाओं में नदी जोड़ो योजनाएं भी शामिल हैं। केन-बेतवा परियोजना और पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना पर काम चल रहा है।
सरकार इस साल पूंजीगत कामों पर एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करना चाहती है। यह पैसा अपनी आय, निगमों और आरबीआई (Reserve Bank of India) के जरिए लिए गए कर्ज से जुटाया जाएगा। यह रकम साल की करीब 87 हजार करोड़ रुपए कर्ज सीमा से लगभग 13 हजार करोड़ रुपए ज्यादा है।
क्या जनता पर बढ़ेगा टैक्स?
क्या सरकार कर्ज का बोझ आम लोगों पर डालेगी? सरकार का कहना है कि फिलहाल ऐसा नहीं है। उसके मुताबिक किसी टैक्स में असामान्य बढ़ोतरी नहीं की गई है। खर्च का इंतजाम तय कर्ज सीमा और राज्य के अपने संसाधनों से किया जा रहा है।
वेतन और लाड़ली बहना के लिए अलग कर्ज नहीं
वेतन और लाड़ली बहना जैसी योजनाएं सरकार के रोजमर्रा के खर्च में आती हैं। सरकार का कहना है कि इनके लिए अलग से कर्ज नहीं लिया जाता। पुराने कर्ज की किस्त और ब्याज का भुगतान भी समय पर किया जा रहा है। सरकार के मुताबिक राज्य ने अब तक भुगतान में चूक नहीं की है।
कर्ज-जीएसडीपी अनुपात कितना है
मध्य प्रदेश पर कितना कर्ज है, इसे जीएसडीपी से भी समझा जाता है। सरकार के मुताबिक राज्य का कर्ज-जीएसडीपी अनुपात (Debt to GSDP ratio) 32.53 प्रतिशत है। आसान भाषा में कहें तो अर्थव्यवस्था के हर 100 रुपए पर करीब 32.5 रुपए कर्ज है। सरकार का कहना है कि यह स्तर तय मानकों के भीतर है।
एक और पैमाना ब्याज भुगतान और राजस्व आय का है। सरकार के मुताबिक यह अनुपात 10 से 11 प्रतिशत है। यानी सरकार की हर 100 रुपए की कमाई में करीब 10 से 11 रुपए ब्याज चुकाने में जाते हैं। सरकार इसे सुरक्षित स्तर बताती है।
जीएसडीपी बढ़ी तो बढ़ी कर्ज क्षमता
अब जरा पूरे गणित को समझते हैं। कर्ज की सीमा जीएसडीपी के 3 प्रतिशत से जुड़ी होती है। जीएसडीपी (Gross State Domestic Product) बढ़ने पर कर्ज लेने की पात्रता भी बढ़ जाती है। सरकार का तर्क है कि सड़क, बांध और बिजली से जीएसडीपी बढ़ती है।
ऐसे में आने वाले महीनों में कर्ज लेने का सिलसिला जारी रहेगा। सरकार के मुताबिक, मार्च 2027 तक यह सब तय सीमा के भीतर ही होगा।
यह खबर क्यों जरूरी है?
सरकार जो कर्ज लेती है, उसे आखिरकार जनता के टैक्स से ही चुकाया जाता है। इसलिए हर नागरिक को जानने का हक है कि पैसा कितना आया और कहां लगा। संविधान का अनुच्छेद 293 राज्यों के कर्ज पर सीमा तय करता है। यह जवाबदेही का संवैधानिक इंतजाम है। सड़क, बांध और अस्पताल पर खर्च का असर सीधे आम जिंदगी पर पड़ता है। ऐसे आंकड़ों पर नजर रखना जागरूक नागरिक की पहचान है।