चुनाव से पहले जिले बने, लेकिन पंचायत व्यवस्था के लिए करना पड़ा लंबा इंतजार

Ramanand Tiwari | Jun 10, 2026, 23:36 IST
एमपी में चुनाव से पहले जिले बने
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव-2023 से पहले मऊगंज, मैहर और पांढुर्ना को नए जिले का दर्जा मिला। लेकिन पंचायत व्यवस्था तीन साल तक पुराने जिलों के अधीन रही। अब राज्य सरकार ने अलग जिला पंचायत गठन की मंजूरी दी है।

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव-2023 से पहले बड़े उत्साह के साथ मऊगंज, पांढुर्ना और मैहर को नए जिले का दर्जा दिया गया था। लोगों को उम्मीद थी कि अब विकास की रफ्तार बढ़ेगी और सरकारी कामकाज उनके जिले से ही होंगे। लेकिन हकीकत यह रही कि जिला बनने के बावजूद ग्रामीणों को पंचायत से जुड़े कामों के लिए पुराने जिलों के चक्कर लगाने पड़े। अब करीब तीन साल बाद इन जिलों में अलग जिला पंचायत गठन का रास्ता साफ हुआ है।



प्रशासनिक हकीकत तक का लंबा सफर

नए जिले (New Districts ) बनने के बाद लोगों को लगा था कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था तुरंत खड़ी हो जाएगी। लेकिन जिला पंचायत जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएं समय पर अस्तित्व में नहीं आ सकीं। नतीजा यह हुआ कि ग्रामीण विकास योजनाओं से जुड़े कई फैसले पुराने जिलों की जिला पंचायतों के भरोसे चलते रहे। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब जिला घोषित किया गया था, तब क्या पूरी तैयारी थी या फिर यह फैसला चुनावी माहौल को ध्यान में रखकर जल्दबाजी में लिया गया था।



पंचायत व्यवस्था रही पुराने जिलों के पास

मऊगंज को 15 अगस्त 2023 को रीवा से अलग कर नया जिला बनाया गया था। वहीं 5 अक्टूबर 2023 को मैहर और पांढुर्ना भी क्रमश: सतना और छिंदवाड़ा से अलग होकर नए जिले बने। इसके बावजूद पंचायत संबंधी कामकाज पुराने जिलों के अधीन ही चलता रहा। मऊगंज के पंचायत कार्य रीवा जिला पंचायत से संचालित होते रहे। मैहर के ग्रामीण मामलों का संचालन सतना जिला पंचायत करती रही। पांढुर्ना के पंचायत कार्य छिंदवाड़ा जिला पंचायत के माध्यम से चलते रहे। यानी जिले नए थे, लेकिन व्यवस्था पुरानी ही बनी रही।



अब जाकर मिली मंजूरी

राज्य सरकार ने अब इन तीनों जिलों में अलग जिला पंचायत गठन की अधिसूचना जारी कर दी है। इसके बाद अगले पंचायत चुनावों में पहली बार यहां जिला पंचायत और जनपद पंचायत के चुनाव कराए जाएंगे। चुनाव के बाद इन जिलों को अपने जिला पंचायत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी मिलेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।



आखिर इतनी देरी क्यों हुई?

सरकार ने पुनर्सीमांकन और आरक्षण में देरी का कारण बताया है। नए जिले बनने के बाद कई तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी करनी होती हैं। इसमें ग्राम पंचायतों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण शामिल है। जनपद पंचायत क्षेत्रों का पुनर्गठन भी किया जाता है। जिला पंचायत वार्डों का गठन किया जाता है। आरक्षण रोस्टर तैयार करना भी जरूरी होता है।



जिला बनने का फायदा कब मिलेगा?

नए जिले बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि योजनाओं की मंजूरी, पंचायत संबंधी फैसले और विकास कार्यों में तेजी आएगी। लेकिन लंबे समय तक पुरानी व्यवस्थाओं पर निर्भर रहने से कई क्षेत्रों में नाराजगी भी देखने को मिली।


ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जिला बनने के बाद भी मूलभूत प्रशासनिक ढांचा समय पर तैयार नहीं हो पाया, तो फिर नई व्यवस्था का वास्तविक लाभ आखिर कब तक जमीन पर दिखाई देगा।



जुलाई में आएगी मतदाता सूची

राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों की तैयारियों में जुटा हुआ है। आयोग 18 जुलाई को मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन करेगा। इसके बाद नए जिलों में पंचायत चुनावों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। आयोग एक जनवरी 2027 की अर्हता तिथि के आधार पर अंतिम मतदाता सूची तैयार करेगा, ताकि दिसंबर 2027 से पहले प्रस्तावित पंचायत चुनाव कराए जा सकें।



एक नजर में पूरी कहानी

विधानसभा चुनाव-2023 से पहले तीन नए जिले बने थे। मऊगंज, मैहर और पांढुर्ना अलग जिले बनाए गए। जिला बनने के बावजूद पंचायत व्यवस्था पुराने जिलों के भरोसे चली। ग्रामीण प्रशासनिक कामों के लिए पुरानी व्यवस्था पर निर्भर रहे। अब सरकार ने अलग जिला पंचायत गठन को मंजूरी दी है।



अगले पंचायत चुनावों में पहली बार जिला पंचायत चुनाव होंगे। देरी का कारण पुनर्सीमांकन और आरक्षण प्रक्रिया बताया गया है। सवाल यह है कि जिला बनने का लाभ लोगों तक इतनी देर से क्यों पहुंचा। क्या यह विकास की रफ्तार है या व्यवस्था की सुस्ती?



जिले बनाना सिर्फ नक्शे पर सीमाएं बदलना नहीं होता

नए जिले बनाना सिर्फ नक्शे पर सीमाएं बदलना नहीं होता। इसका उद्देश्य लोगों को स्थानीय स्तर पर बेहतर प्रशासन उपलब्ध कराना भी है। तीन साल बाद पंचायत ढांचे का तैयार होना सवाल खड़ा करता है कि घोषणाएं पहले हुईं और व्यवस्थाएं बाद में बनाई गईं। आने वाले पंचायत चुनाव सिर्फ प्रतिनिधियों के चयन तक सीमित नहीं रहेंगे। वे यह भी परखेंगे कि नए जिलों का सपना जमीन पर कितना उतरा।



क्या बोले कांग्रेस प्रवक्ता

कांग्रेस प्रवक्ता विनोद शर्मा ने आरोप लगाया कि चुनावी लाभ के लिए नए जिले तो बनाए गए। लेकिन मूलभूत सुविधाएं आज तक उपलब्ध नहीं कराई गईं। उन्होंने कहा कि सरकार तीन वर्षों में आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने में विफल रही है। जनता का ध्यान भटकाने के लिए केवल नाम बदलने की राजनीति हो रही है। नए कॉलेज खोलने के बजाय संस्थानों के नाम बदले जा रहे हैं। नए कॉलेज और स्कूलों की स्थापना के स्थान पर उन्हें 'पीएम श्री' और 'संदीपनी' जैसे नाम दिए जा रहे हैं। शर्मा ने दावा किया कि सरकार के खोखले वादों से जनता पूरी तरह उब चुकी है।



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