MP में बढ़ा शुगर और मोटापे का ग्राफ, हर 10 में से 4 बच्चे कुपोषित
समझें क्या है पूरा मामला
- देश में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की नई रिपोर्ट जारी हो गई है।
- मध्य प्रदेश में मोटापा और शुगर के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
- राज्य में पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।
- निजी अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में बड़ा उछाल आया है।
- राहत की बात यह है कि मध्य प्रदेश में घरेलू हिंसा के मामले घटे हैं।
मध्य प्रदेश के लोगों की सेहत को लेकर एक बड़ी रिपोर्ट आई है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे यानी NFHS-6 के आंकड़े जारी हो चुके हैं। इस रिपोर्ट ने राज्य सरकार और आम जनता दोनों की चिंता बढ़ा दी है। आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश के लोग अब कई गंभीर बीमारियों की गिरफ्त में आ रहे हैं। इनमें मोटापा, हाई ब्लड शुगर और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं सबसे आगे हैं।
दूसरी तरफ बच्चों में कुपोषण का ग्राफ भी तेजी से ऊपर की तरफ गया है। इससे पता चलता है कि राज्य में पोषण को लेकर बड़ी कमी चल रही है। एक तरफ लोग मोटापे से परेशान हैं और दूसरी तरफ बच्चे कमजोर हो रहे हैं। यह स्थिति राज्य के लिए स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक बड़ा अलार्म है।
MP में तेजी से बढ़े शुगर और मोटापे के मरीज
एमपी में खान-पान की गलत आदतें भारी पड़ रही हैं। सर्वे के अनुसार राज्य में डायबिटीज के मरीजों की तादाद बहुत बढ़ी है। महिलाओं में शुगर पीड़ित मरीजों का आंकड़ा अब 14.5 प्रतिशत तक पहुंच गया है। वहीं पुरुषों में यह आंकड़ा बढ़कर 18.3 प्रतिशत पर आ गया है। पिछले पांच सालों में इसमें बहुत बड़ा उछाल देखने को मिला है।
इसके साथ ही महिलाओं में मोटापे की समस्या भी काफी बढ़ गई है। राज्य की करीब 22.2 प्रतिशत महिलाएं अब मोटापे का शिकार हो चुकी हैं। पुरुषों में भी ओवरवेट होने की समस्या 17.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है। डॉक्टर इसका बड़ा कारण जंक फूड और शारीरिक मेहनत न करने को मान रहे हैं।
बच्चों में कुपोषण और पोषण का दोहरा संकट
मध्य प्रदेश में बच्चों की सेहत के आंकड़े सबसे ज्यादा डराने वाले हैं। राज्य में पांच साल से कम उम्र के 39.7 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। पांच साल पहले यह आंकड़ा केवल 33 प्रतिशत दर्ज किया गया था। इसका मतलब है कि अब हर 10 में से 4 बच्चे कम वजन के हैं।
कुपोषण के मामले में मध्य प्रदेश पूरे देश में तीसरे नंबर पर है। वहीं दुबलेपन के मामले में राज्य देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा दिखाता है कि बच्चों को सही पोषण नहीं मिल पा रहा है। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या शहरों के मुकाबले कहीं ज्यादा गंभीर बनी हुई है।
हेल्थ बीमा और मोबाइल के इस्तेमाल में भारी उछाल
इस रिपोर्ट में कुछ राहत देने वाली बातें भी सामने आई हैं। मध्य प्रदेश में अब ज्यादा से ज्यादा परिवार स्वास्थ्य बीमा से जुड़ रहे हैं। राज्य के करीब 73.6 प्रतिशत परिवारों के पास अब हेल्थ इंश्योरेंस मौजूद है। पहले यह आंकड़ा सिर्फ 38.1 प्रतिशत परिवारों के पास ही था।
इसके अलावा महिलाओं के पास मोबाइल फोन होने का ग्राफ भी बढ़ा है। राज्य की 48.5 प्रतिशत महिलाओं के पास अब अपना खुद का मोबाइल है। डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन पढ़ाई के कारण महिलाओं में मोबाइल का चलन बढ़ा है। यह बदलाव महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रहा है।
सिजेरियन डिलीवरी के नए रिकॉर्ड
गर्भवती महिलाओं के प्रसव को लेकर भी चौंकाने वाले आंकड़े आए हैं। मध्य प्रदेश के निजी अस्पतालों में सिजेरियन ऑपरेशन बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं। प्राइवेट डॉक्टरों द्वारा किए जाने वाले सिजेरियन ऑपरेशन का रेट 61.7% हो गया है। पिछले सर्वे में यह आंकड़ा 52.3% के आसपास था।
इसके उलट सरकारी अस्पतालों में सामान्य प्रसव को बढ़ावा मिल रहा है। वहां सिजेरियन ऑपरेशन का आंकड़ा घटकर अब 31.4% पर आ गया है। डॉक्टरों का कहना है कि निजी अस्पतालों में सिजेरियन बढ़ने के पीछे कई कारोबारी कारण भी हो सकते हैं। इस पर रोक लगाना बेहद जरूरी है।
एमपी में घरेलू हिंसा के मामलों में आई कमी
महिलाओं की सुरक्षा के मोर्चे पर एक अच्छी खबर आई है। मध्य प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा कम हुई है। विवाहित महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा अब 28% से घटकर 21.4% रह गई है। सरकार के जागरूकता अभियानों का असर अब जमीन पर दिख रहा है।
हालांकि ग्रामीण इलाकों में अब भी यह समस्या शहरों से ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में 22.6% महिलाओं ने घरेलू हिंसा की बात स्वीकार की है। वहीं शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा केवल 17.7% ही दर्ज किया गया है। गांवों में अभी और काम करने की जरूरत है।
महिलाओं को मिला मालिकाना हक
राज्य में महिलाओं के नाम पर संपत्ति खरीदने का चलन बढ़ा है। अब 18.8% परिवारों में महिलाओं के पास जमीन या मकान का हक है। पिछले पांच सालों में इस आंकड़े में 6.2% की बढ़ोतरी देखी गई है। गांवों में यह स्थिति शहरों के मुकाबले थोड़ी बेहतर पाई गई है।
दूसरी तरफ परिवार नियोजन के आधुनिक तौर-तरीके अपनाने में कमी आई है। राज्य में सिर्फ 52.9% महिलाएं ही परिवार नियोजन के नए साधन अपना रही हैं। गांवों में प्रति महिला बच्चों का औसत अभी भी 2 बना हुआ है। शहरों में लोग छोटे परिवार को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश स्वास्थ्य सर्वे के प्रमुख आंकड़े
| स्वास्थ्य संकेतक | वर्ष 2019-21 | वर्ष 2023-24 | कुल बदलाव |
| कम वजन की महिलाएं | 23.0% | 26.5% | +3.5% |
| मोटापे से पीड़ित महिलाएं | 16.6% | 22.2% | +5.6% |
| हाई ब्लड शुगर (महिलाएं) | 9.8% | 14.5% | +4.7% |
| बच्चों में कुल कुपोषण | 33.0% | 39.7% | +6.7% |
FAQ
- NFHS-6 की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में कुपोषण की क्या स्थिति है?
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-6) के अनुसार मध्य प्रदेश में बच्चों में कुपोषण की स्थिति बहुत चिंताजनक हो गई है। राज्य में 5 साल से कम उम्र के 39.7% बच्चे कुपोषित यानी कम वजन के हैं। पिछले पांच सालों में इसमें करीब 7% की बढ़ोतरी हुई है। कुपोषण के मामले में मध्य प्रदेश आज पूरे देश में तीसरे स्थान पर है और बच्चों के दुबलेपन के मामले में देश में दूसरे स्थान पर आता है। - मध्य प्रदेश में शुगर और मोटापे के मरीजों में कितनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है?
ताजा सर्वे के अनुसार मध्य प्रदेश के लोगों में लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। राज्य में मोटापे से पीड़ित महिलाओं की संख्या 16.6% से बढ़कर 22.2% हो गई है। इसी तरह महिलाओं में हाई ब्लड शुगर का ग्राफ 9.8% से बढ़कर 14.5% पर पहुंच गया है, जबकि पुरुषों में शुगर का स्तर 18.3% दर्ज किया गया है। इसका मुख्य कारण खराब खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता है।
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