हाईकोर्ट की निगरानी में खुला नर्सिंग कॉलेज घोटाला, 800 में से 200 ही निकले पात्र
समझें क्या है पूरा मामला...
- 800 में से 600 नर्सिंग कॉलेज निकले फर्जी।
- हाईकोर्ट की सख्ती से खुली बड़ी फर्जीवाड़े की परत।
- जांच में फंसे सीबीआई के अपने ही इंस्पेक्टर।
- गैराज और एटीएम में चल रहे थे नर्सिंग कॉलेज।
- मान्यता प्राप्त कॉलेज घटकर रह गए सिर्फ 200।
मध्यप्रदेश में नर्सिंग कॉलेजों को लेकर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। हाईकोर्ट की सक्रियता से यह पूरा मामला उजागर हुआ। जांच में करीब 800 कॉलेजों में से 600 अपात्र पाए गए। गैराज, एटीएम और स्कूल भवनों तक में कॉलेज चलते मिले। रजिस्ट्रार से लेकर इंस्पेक्टर तक इस घोटाले में शामिल पाए गए।
नर्सिंग कॉलेज घोटाला केस 2021 में एक शिकायत से शुरू हुआ था। इसके बाद यह लगातार बड़ा होता चला गया। अब यह मामला राज्य में न्यायिक सक्रियता का एक बड़ा उदाहरण बन चुका है।
शिकायत से याचिका तक
सितंबर 2021 में लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विशाल बघेल ने सरकार को शिकायत दी थी। शिकायत में कार्रवाई नहीं होने पर जनवरी 2022 में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। याचिका में आरोप था कि आदिवासी क्षेत्रों के 55 कॉलेजों को जरूरी सुविधाओं के बिना ही मान्यता दे दी गई थी।
इनमें भवन, लैब और अस्पताल जैसी अनिवार्य सुविधाएं शामिल नहीं थीं। कोर्ट के आदेश पर जब रिकॉर्ड पेश हुआ, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।
फाइलों में मिलीं बड़ी खामियां
कोर्ट के आदेश पर एक महीने तक रिकॉर्ड का अवलोकन हुआ। इसमें सामने आया कि करीब 37,759 पृष्ठ फाइलों में संलग्न ही नहीं थे। 90 प्रतिशत फाइलों में भवन का स्वीकृत लेआउट तक गायब था। दर्जनों कॉलेजों में एक ही फैकल्टी को दस-दस जगह दिखाकर मान्यता ली गई थी।
इसके बाद कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए। जांच में करीब 800 कॉलेजों में से लगभग 600 कॉलेज अपात्र या कमियों से भरे पाए गए। कई कॉलेज गैराज, एटीएम और स्कूल भवनों में चल रहे थे।
रजिस्ट्रार पद पर भी गड़बड़ी
जांच में यह भी सामने आया कि नर्सिंग काउंसिल के रजिस्ट्रार खुद इसी फर्जीवाड़े की उपज थे। अंगूरी सिंह, जस्सी फिलिप, जयंती चौरसिया से लेकर चंद्रकला दिवगैया तक कई नाम इसमें शामिल रहे।
आरोप है कि हर बार राज्य शासन ने नियम विरुद्ध किसी अयोग्य नर्स को अस्थायी रूप से रजिस्ट्रार बना दिया। जबकि यह अधिकार अधिनियम के तहत काउंसिल का था, सरकार का नहीं।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन डॉ. एनएम श्रीवास्तव से जुड़ा रहा। आरोप है कि नर्सिंग काउंसिल के पदेन अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने ही 2014 में भोपाल में मात्र 3000 वर्गफीट के मकान में सविता नर्सिंग कॉलेज नाम से अपना निजी कॉलेज खोल लिया था। यह कॉलेज लगातार 7 साल तक मान्यता प्राप्त कर डिग्रियां बांटता रहा।
जांच में ही मिली रिश्वतखोरी
जांच प्रक्रिया के दौरान ही एक और घोटाला उजागर हुआ। सीबीआई के अपने दो इंस्पेक्टर सहित कुल 13 लोग रिश्वत लेते गिरफ्तार हुए। आरोप है कि यह रिश्वत प्रति कॉलेज 2 से 10 लाख रुपये तक ली जा रही थी।
हाईकोर्ट ने इसके बाद भी लगातार निगरानी बनाए रखी। जांच के बीच ही जब 49 नए कॉलेज मान्यता पा गए, तो रजिस्ट्रार सुनीता सिजू को तुरंत निलंबित कर दिया गया।
बाद में पता चला कि निलंबन को कमजोर चार्जशीट और 24 घंटे के भीतर मंत्रालय-अटैचमेंट के जरिए बेअसर किया जा रहा था। कोर्ट की फटकार के बाद सरकार को तुरंत सुधार करना पड़ा।
फिर हुई नई नियुक्ति पर सवाल
इसके बाद अगली रजिस्ट्रार अनीता चांद को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ। आरोप है कि वह खुद एक अपात्र कॉलेज आरकेएस नर्सिंग कॉलेज को झूठी रिपोर्ट से मान्यता दिलाने की दोषी थीं। इसके बावजूद उन्हें रजिस्ट्रार बना दिया गया। दिसंबर 2024 में हाईकोर्ट ने उन्हें और चेयरमैन दोनों को तुरंत हटाने का सख्त आदेश दिया।
इसके ठीक बाद काउंसिल दफ्तर से जांच से जुड़ी सीसीटीवी फुटेज और हाई-लेवल कमेटी की मूल फाइलें गायब हो गईं। हाईकोर्ट ने पूरा मामला भोपाल पुलिस कमिश्नर और साइबर सेल को सौंप दिया। जुलाई 2025 में सुनवाई के दौरान खुद जजों ने काउंसिल की वेबसाइट से एक फर्जी मार्कशीट डाउनलोड कर अपनी आंखों से पुष्टि की।
नियमों में सेंधमारी पर भी लगी रोक
कोर्ट ने सुधार के सुझाव भी दिए और प्रशासनिक गड़बड़ियों को समय रहते पकड़ा। जब सरकार ने जांच में फंसे कॉलेजों को राहत देने के लिए भवन क्षेत्रफल की शर्त करीब 23,000 वर्गफीट से घटाकर 8-9 हजार वर्गफीट कर दी, तो हाईकोर्ट ने इस बदलाव पर तुरंत रोक लगा दी।
इसी तरह जांच में अपात्र पाए गए कॉलेजों के हजारों छात्रों को समय पर दूसरे संस्थानों में स्थानांतरित नहीं किया गया था। कोर्ट ने बार-बार निर्देश देकर आखिरकार हजारों छात्रों की शिफ्टिंग सुनिश्चित कराई। शिफ्ट हो चुके छात्रों के परीक्षा परिणाम भी दिलवाए गए।
अधिकारियों को नोटिस, पर कार्रवाई ठंडी
दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए सरकार ने 14 डिप्टी कलेक्टर, 14 तहसीलदार और 111 नर्सिंग इंस्पेक्टरों को नोटिस जारी किए थे। हालांकि बाद में यह कार्यवाही ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
800 से घटकर 200 रह गए कॉलेज
जून 2025 में हाईकोर्ट ने इस याचिका को सभी नर्सिंग मामलों का लीड केस घोषित कर दिया। इसके बाद दिन-प्रतिदिन सुनवाई शुरू हुई। इसका असर यह हुआ कि प्रदेश के मान्यता प्राप्त नर्सिंग कॉलेजों की संख्या करीब 700-800 से घटकर मात्र 200 के आसपास रह गई।
यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि हाईकोर्ट की सक्रियता के बिना यह फर्जीवाड़ा सामने नहीं आ पाता। लगातार निगरानी, दोषियों को पद से हटाने और नियमों में सेंधमारी रोकने से ही यह मामला उजागर हो सका।
FAQ
- मध्यप्रदेश नर्सिंग कॉलेज फर्जीवाड़ा मामला क्या है?
जांच में सामने आया कि प्रदेश के करीब 800 नर्सिंग कॉलेजों में से 600 जरूरी सुविधाओं के बिना ही मान्यता प्राप्त कर चुके थे। हाईकोर्ट की सक्रियता से यह घोटाला उजागर हुआ। - नर्सिंग कॉलेज फर्जीवाड़ा मामले की जांच कब शुरू हुई थी?
जनवरी 2022 में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल होने के बाद कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच शुरू हुई थी। शिकायत सितंबर 2021 में की गई थी। - जांच के बाद कितने कॉलेजों की मान्यता बची?
जून 2025 में इस मामले को लीड केस घोषित किए जाने के बाद प्रदेश के मान्यता प्राप्त कॉलेजों की संख्या 700-800 से घटकर करीब 200 रह गई।
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