एमपी के नर्सिंग होम में बड़ा फर्जीवाड़ा: डॉक्टर बने सुपरमैन, एक ही वक्त में 7 अस्पतालों में दे रहे सेवाएं!
मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य महकमे से एक ऐसी चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जो सूबे की चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। प्रदेश के निजी अस्पतालों में नियमों को ताक पर रखकर कागजी डॉक्टरों का ऐसा मायाजाल बुना गया है, जिसे देखकर सुपरमैन भी शरमा जाए। नियम कहते हैं कि एक डॉक्टर एक वक्त में एक ही अस्पताल में अपनी सेवाएं दे सकता है, लेकिन यहां तो हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
कागजों पर सुपरमैन बने डॉक्टर
नियमों के मुताबिक, किसी भी अस्पताल के पंजीकरण (Registration) के लिए एक फुल-टाइम मेडिकल प्रैक्टिशनर का होना अनिवार्य है। वहीं, प्रदेश में एक ऐसा खेल चल रहा है जहां एक ही डॉक्टर का नाम और रजिस्ट्रेशन नंबर एक साथ कई शहरों के अस्पतालों में दर्ज है।
ताज्जुब की बात यह है कि एक अस्पताल भोपाल में है, तो दूसरा सैकड़ों किलोमीटर दूर बैतूल या सीधी में। क्या कोई डॉक्टर एक ही समय में इन सभी जगहों पर मौजूद रहकर मरीजों का इलाज कर सकता है? यह सवाल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरा निशान छोड़ता है।
इन चार डॉक्टरों के नामों ने उड़ाए होश
जांच और शिकायतों के दौरान कुछ ऐसे नाम सामने आए हैं जो रिकॉर्ड में एक साथ कई जगह ड्यूटी कर रहे हैं:
- डॉ. राजन जॉन: इनका नाम रिकॉर्ड में सबसे ऊपर है। ये एक साथ सात अस्पतालों (अर्पण नेत्र, महेश्वरी, आयुष, केयर एंड क्योर, तृप्ति, अनंतश्री और चरक हॉस्पिटल) में पंजीकृत हैं।
- डॉ. अरुण मैती: ये डॉक्टर साहब तो और भी आगे निकले। तीन अस्पतालों के साथ-साथ इनका नाम 17 पैथोलॉजी लैब में दर्ज है। इनका प्रभाव भोपाल से लेकर शाजापुर, रीवा, सतना, राजगढ़, सीहोर, उज्जैन, बैतूल और सीधी तक फैला है।
- डॉ. कृष्ण भारंग: इनका नाम भोपाल, राजगढ़ और रायसेन के पांच अलग-अलग अस्पतालों में एक साथ दर्ज मिला है।
- डॉ. नीरज गुप्ता: ये भी भोपाल के पांच प्रमुख अस्पतालों में एक साथ अपनी सेवाएं (कागजों पर) दे रहे हैं।
हमें पता ही नहीं: डॉक्टरों ने दी सफाई
जब इस फर्जीवाड़े की परतें खुलीं, तो संबंधित डॉक्टरों के जवाब और भी हैरान करने वाले थे। डॉ. कृष्ण कुमार भारंग का कहना है कि उन्होंने किसी को कंसर्न फॉर्म यानी सहमति पत्र दिया ही नहीं है। वहीं डॉ. अरुण मैती ने एक सॉफ्टवेयर डेवलपर पर शक जताया है।
सवाल यह उठता है कि यदि डॉक्टरों ने सहमति नहीं दी, तो निजी अस्पतालों के पास उनके दस्तावेज पहुंचे कैसे? क्या यह डॉक्टरों की जानकारी के बिना हो रहा है या इसके पीछे कोई बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है?
मरीजों की जान से हो रहा खिलवाड़!
यह सिर्फ कागजी हेराफेरी नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर मरीजों की सेहत से समझौता है। जब अस्पताल में डॉक्टर भौतिक रूप से मौजूद ही नहीं होगा, तो आपातकालीन स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी?
सूत्रों के अनुसार, कई निजी अस्पताल सिर्फ लाइसेंस हासिल करने के लिए इन डॉक्टरों के नाम का इस्तेमाल करते हैं। इससे जहां एक तरफ सरकार की आंखों में धूल झोंकी जा रही है। वहीं दूसरी तरफ इलाज के नाम पर जनता से वसूली की जा रही है।
रियल-टाइम डिजिटल प्लेटफॉर्म की दरकार
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फर्जीवाड़े को रोकने का एकमात्र तरीका रियल-टाइम डिजिटल वेरिफिकेशन (Real-time Digital Verification) है। एक ऐसा पोर्टल होना चाहिए जहां हर डॉक्टर की एक यूनिक आईडी (Unique ID) हो।
जैसे ही किसी दूसरे संस्थान में उस डॉक्टर का नाम जोड़ने की कोशिश की जाए, सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर दे। फिलहाल, भोपाल के सीएमएचओ (CMHO) डॉ. मनीष शर्मा ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। साथ ही सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया है।
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