मध्य प्रदेश में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण केस पर फैसला कब, इसी से आजाद होंगे 13 फीसदी होल्ड पद
मध्य प्रदेश में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने के मामले में जबलपुर हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई पूरी हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई इस सुनवाई को 5 अगस्त को पूरा किया गया और कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
यह सुनवाई लगातार 15 दिन तक चली। इस दौरान करीब 30 घंटे तक ओबीसी पक्ष, अनारक्षित वर्ग, मध्य प्रदेश सरकार और अन्य पक्षकारों ने अपनी दलीलें रखीं। सभी पक्षों ने कोर्ट के सामने अपने-अपने तर्क विस्तार से पेश किए।
सुनवाई के बाद जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने कहा कि यह 15 दिन और 30 घंटे की लंबी सुनवाई रही। कोर्ट ने इसे बेंच और वकीलों दोनों के लिए सीखने वाला अनुभव बताया। अब सभी को हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार है।
अब नजरें आदेश पर, यह कब होगा
फैसला सुरक्षित हुए अब 9 दिन बीत चुके हैं। ऐसे में सभी की नजरें हाईकोर्ट के आदेश पर टिकी हुई हैं। क्योंकि इसी आदेश से 13 फीसदी होल्ड चल रहे पदों को भी आजादी मिलेगी।
इस मामले का असर सिर्फ भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीति में भी हलचल बढ़ सकती है। फैसला किसी भी पक्ष में आए, दूसरे पक्ष की नाराजगी सामने आना तय माना जा रहा है। चाहे मामला ओबीसी वर्ग के पक्ष में जाए या सामान्य वर्ग के, दोनों ही तरफ से प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।
धार की भोजशाला पर चली थी लंबी सुनवाई, आदेश 4 दिन में
हाल के समय में सबसे लंबे फैसलों में धार भोजशाला केस भी शामिल रहा है। यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पहले जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचा और बाद में इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। इसमें 6 अप्रैल से 12 मई तक हर कार्यदिवस पर लगातार सुनवाई चली।
सुनवाई खत्म होने के सिर्फ चार दिन बाद 15 मई को कोर्ट ने फैसला सुना दिया। यह आदेश 242 पन्नों का था। इसकी वजह यह रही कि बेंच ने हर दिन की सुनवाई के बाद ही पूरी कार्यवाही को रिकॉर्ड करवा लिया था। इसके बाद सभी पक्षों पर विचार कर कोर्ट ने जल्द ही फैसला जारी कर दिया।
वहीं हाल ही में ठेकेदार ब्लैकलिस्ट मामले में इंदौर में गठित पांच जजों की बड़ी संवैधानिक बेंच ने 263 पन्नों का फैसला सुनाया था।
क्या हाईकोर्ट के लिए फैसला देने की सीमा तय है
कानून के जानकारों के मुताबिक हाईकोर्ट में किसी मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुनाने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं होती। कई मामलों में फैसला आने में 40-50 दिन या उससे ज्यादा समय भी लग सकता है। यह पूरी तरह मामले की गंभीरता और कानूनी जटिलताओं पर निर्भर करता है।
अगर किसी केस में संवैधानिक सवाल जुड़े हैं, सुप्रीम कोर्ट के कई अलग-अलग फैसलों का असर है या मौजूदा कानूनी स्थिति को समझना जरूरी है, तो कोर्ट को हर पहलू पर विस्तार से विचार करना पड़ता है।
बेंच को अपने आदेश में सभी सवालों के जवाब देने होते हैं, तभी फैसला मजबूत माना जाता है। एक पक्ष की दलीलों को दूसरे पक्ष के तर्कों की कसौटी पर परखना और हर कानूनी बिंदु का जवाब देना जरूरी होता है। इसी वजह से कई बार फैसला लिखने में समय लग जाता है।
ओबीसी आरक्षण में मूल प्रश्न यह है
इस मामले में कुल 92 याचिकाएं जुड़ी हुई हैं। पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आरक्षण की 50 फीसदी सीमा को पार किया जा सकता है? साथ ही यह भी तय होना है कि क्या ओबीसी को उनकी आबादी के अनुपात में 27 फीसदी आरक्षण दिया जा सकता है।
जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को हाईकोर्ट भेजा था, तब उसने कहा था कि किसी राज्य की भौगोलिक स्थिति और जनसंख्या से जुड़े हालात का आकलन वहीं किया जा सकता है। इसलिए इस मामले की सुनवाई (MP में ओबीसी के 27 फीसदी आरक्षण) हाईकोर्ट में होना उचित है।
अब सबसे अहम बात यह होगी कि सरकार और ओबीसी पक्ष क्या ऐसे आंकड़े पेश कर पाए हैं, जिनके आधार पर 27 फीसदी आरक्षण को सही ठहराया जा सके और 50 फीसदी की सीमा को पार करने का आधार मिल सके। हालांकि ईडब्ल्यूएस के 10 फीसदी आरक्षण के कारण आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ऊपर गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है।
फिर फैसला कब तक
कानून के जानकारों से बातचीत में सामने आया है कि इस मामले का फैसला करीब 300 पन्नों का हो सकता है। आमतौर पर लंबी सुनवाई वाले मामलों के फैसले 250 पन्नों के आसपास होते हैं।
फैसला कब आएगा, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि बेंच के दोनों जजों पर कितना काम का दबाव है और वे आदेश लिखने के लिए कितना समय निकाल पा रहे हैं। इसलिए किसी तय तारीख पर फैसला आने की बात कहना मुश्किल है।
हालांकि जानकारी के मुताबिक इस फैसले के 17 से 22 अगस्त के बीच आने की संभावना जताई जा रही है। बड़े और अहम मामलों में कई बार बेंच खुले कोर्ट में फैसले के मुख्य बिंदु भी पढ़ती है। जैसे भोजशाला मामले में 15 मई को बेंच ने करीब तीन मिनट तक फैसले के अहम हिस्से खुले कोर्ट में पढ़े थे और बाद में पूरा आदेश शाम को अपलोड किया गया था।
अगर इस मामले में भी ऐसा होता है तो बेंच पहले ही फैसला सुनाने की तारीख और समय की जानकारी देगी। हालांकि अभी तक इस मामले में ऐसी कोई सूचना सामने नहीं आई है।
इस तरह शुरू हुई पूरी लड़ाई
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण (27 फीसदी OBC आरक्षण) का विवाद कमलनाथ सरकार (कमलनाथ सरकार ओबीसी) के समय शुरू हुआ, जब ओबीसी आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया गया। इसके बाद इस फैसले को लेकर कोर्ट में याचिकाएं दायर होने लगीं।
इस मामले में पहली याचिका पीएससी की मेडिकल भर्ती से जुड़ी थी। 5901/2019 आशिता दुबे विरुद्ध मध्य प्रदेश राज्य नाम से यह याचिका 14 मार्च 2019 को दर्ज हुई थी। इसकी सुनवाई 19 मार्च 2019 को हुई, जिसके बाद ओबीसी को 14 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने पर रोक लगा दी गई।
इसके बाद इस मामले में लगातार कई याचिकाएं दायर होती गईं। भर्ती प्रक्रिया प्रभावित होने लगी तो सितंबर 2022 में मध्य प्रदेश सरकार ने इसका अस्थायी समाधान निकाला। सरकार ने 87-13 फीसदी का फॉर्मूला लागू किया।
इस व्यवस्था के तहत 87 फीसदी पदों पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, जबकि 13 फीसदी पदों को होल्ड कर दिया गया। इन रुके हुए पदों में सामान्य और ओबीसी दोनों वर्ग के उम्मीदवार शामिल हैं। तय किया गया कि हाईकोर्ट के अंतिम फैसले के बाद इन पदों का आवंटन किया जाएगा।
तब से अब तक हजारों पद इसी 13 फीसदी श्रेणी में अटके हुए हैं और उम्मीदवार फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट तक ऐसे चला पूरा मामला
- 23 जनवरी 2024 को Shivam Gautam Vs. State of Madhya Pradesh (W.P. No. 3668/2022) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रकरणों की सुनवाई पर हाईकोर्ट में रोक लगा दी थी। इसके बाद 2 जून 2024 को जस्टिस शील नागू की डिविजनल बेंच ने मामले की सुनवाई जुलाई 2024 तक के लिए टाल दी।
- इसके बाद 31 जुलाई 2024 को मामला तत्कालीन एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच के सामने आया, लेकिन सुनवाई फिर 4 हफ्तों के लिए टल गई।
- इसी बीच 20 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट के Transfer Petition (C) No. 1120/2023 में दिए गए आदेश के आधार पर सभी मामले सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर कर दिए गए। इसका आदेश तत्कालीन एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच ने 2 सितंबर 2024 को जारी किया।
- इसके बाद 19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के लिए विशेष बेंच बनाई और निर्देश दिया कि इन मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट में ही होगी। इसके बाद सभी प्रकरण वापस जबलपुर हाईकोर्ट भेज दिए गए।
- 26 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट में इस मामले के लिए स्पेशल बेंच गठित की गई। इसके बाद 23 मार्च 2026 को पहली सुनवाई हुई। तब तक संजीव सचदेवा एक्टिंग चीफ जस्टिस से चीफ जस्टिस बन चुके थे। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच ने सुनवाई शुरू की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से सभी मामलों के ट्रांसफर होकर नहीं आने के कारण सुनवाई आगे बढ़ा दी गई।
- 2 अप्रैल 2026 की सुनवाई में सभी याचिकाएं लिस्ट की गईं। इस दौरान कुछ याचिकाओं में संशोधन (अमेंडमेंट) की मांग भी सामने आई।
- 27 अप्रैल को दस्तावेज अपलोड करने और अन्य प्रक्रियात्मक कारणों से सुनवाई टल गई। इसके बाद कोर्ट ने तय किया कि 28 अप्रैल से लगातार तीन दिन मामले की सुनवाई की जाएगी।
- 28 अप्रैल को सुनवाई के दौरान जानकारी सामने आई कि तीन याचिकाएं अभी भी सुप्रीम कोर्ट से ट्रांसफर होकर हाईकोर्ट में लिस्ट नहीं हुई हैं।
- इसके बाद कई कारणों से मामला आगे बढ़ता रहा। आखिरकार 15 जुलाई 2026 से इस मामले में नियमित सुनवाई शुरू हुई, जो 5 अगस्त 2026 तक चली। इस दौरान कुल 15 कार्यदिवस में करीब 30 घंटे तक सुनवाई हुई।
सात साल लंबी लड़ाई
इस मामले में पहली याचिका 19 मार्च 2019 को दायर हुई थी। इसके बाद करीब 7 साल, 4 महीने और 17 दिन की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 5 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। यानी इस मामले को कुल 2697 दिन हो चुके हैं।
अब सभी की नजरें एमपी हाईकोर्ट के अंतिम आदेश पर टिकी हुई हैं। फैसले के बाद ही तय होगा कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण और लंबे समय से होल्ड चल रहे 13 फीसदी पदों का क्या होगा।
आदेश की कॉपी यहां देखें---
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