27% ओबीसी आरक्षण के मामले में पूरी हुई अंतिम सुनवाई, फैसला सुरक्षित
Neel Tiwari | Aug 05, 2026, 17:22 IST
Photograph: (THESOOTR)
JABALPUR. ओबीसी 27% आरक्षण मामले में अंतिम सुनवाई पूरी हो गई है। हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा है। अब सभी पक्षों की नजरें फैसले पर टिकी हैं।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण मामले की अंतिम सुनवाई पूरी हो गई। सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी और गोपाल शंकरा नारायणन ने 50 प्रतिशत सीमा, इंदिरा साहनी फैसले और राज्य सरकार के जवाब पर सवाल उठाए।
वहीं ओबीसी पक्ष ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा संविधान का हिस्सा नहीं है। लंबी बहस के बाद जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष डिवीजन बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े बहुचर्चित मामले की अंतिम सुनवाई बुधवार को पूरी हो गई। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष डिवीजन बेंच के समक्ष सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग की ओर से विस्तृत बहस हुई।
सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब पूरे प्रदेश की नजर इस फैसले पर टिकी है, क्योंकि इसका असर प्रदेश की आरक्षण व्यवस्था और कई भर्ती प्रक्रियाओं पर पड़ेगा है।
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सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने अपनी दलीलों में कहा कि राज्य सरकार का जवाब याचिकाकर्ताओं के तर्कों को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि कई महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दों पर सरकार ने कोई स्पष्ट जवाब ही नहीं दिया।
अमन का तर्क था कि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा, संविधान के अनुच्छेद 16 से जुड़े सिद्धांत, आनुपातिकता, प्रशासनिक दक्षता और इंदिरा साहनी फैसले की व्याख्या जैसे मुद्दों पर राज्य का पक्ष अधूरा रहा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार जिन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा कर रही है, वे वास्तव में याचिकाकर्ताओं के पक्ष को ही समर्थन देते हैं।
सामान्य वर्ग की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता अमन लेखी ने एसवी जोशी, जर्नैल सिंह, राजेश कुमार श्रीवास्तव और बीके पवित्रा सहित कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इन निर्णयों का वर्तमान विवाद से अलग संदर्भ है।
अमन लेखी का कहना था कि इंदिरा साहनी मामले में तय 50 प्रतिशत सीमा आज भी प्रभावी संवैधानिक सिद्धांत है और सामान्य कानून बनाकर उसे पार नहीं किया जा सकता।
अमन ने यह भी कहा कि राज्य सरकार के पास ऐसा कोई समकालीन आंकड़ा या अध्ययन नहीं है, जिससे 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का औचित्य साबित हो सके।
सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरा नारायणन ने कहा कि कानून बनाने से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग से आवश्यक परामर्श नहीं लिया गया। उनके अनुसार यही कमी इस कानून को असंवैधानिक बनाने के लिए पर्याप्त है।
नारायणन ने एनएम थॉमस, बालाजी, वसंत कुमार और इंदिरा साहनी सहित कई संवैधानिक फैसलों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 50 प्रतिशत सीमा के प्रश्न पर स्पष्ट विचार किया था और यही वर्तमान विवाद का मुख्य मुद्दा है।
ओबीसी वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने सामान्य वर्ग की सभी दलीलों का विरोध किया। उन्होंने अदालत से कहा कि इंदिरा साहनी फैसले में निर्धारित 50 प्रतिशत सीमा संविधान के शब्दों का हिस्सा नहीं है।
विनायक प्रसाद का कहना था कि किसी भी अदालत को विधायिका द्वारा बनाए गए कानून में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान कानून बनाने का अधिकार संसद और विधानसभाओं को देता है, इसलिए न्यायालय द्वारा तय सीमा को संविधान का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
विनायक ने क्वांटिफिएबल डाटा की अनिवार्यता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, केवल आर्थिक स्थिति नहीं।
ओबीसी वर्ग की ओर से अधिवक्ता शशांक रत्नू ने भी अपनी दलीलें रखते हुए कहा कि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा पार होने का पूरा दायित्व केवल ओबीसी आरक्षण पर नहीं डाला जा सकता।
ने कहा कि यदि किसी समय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में बदलाव होता तो भी यही प्रश्न उठता। इसलिए 50 प्रतिशत सीमा का परीक्षण केवल ओबीसी आरक्षण तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि सभी वर्टिकल आरक्षण को एक साथ देखकर किया जाना चाहिए।
लगातार कई दिनों तक चली सुनवाई के बाद आखिरकार हाई कोर्ट ने इस बहुचर्चित मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब यह तय होगा कि मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर अदालत क्या अंतिम निर्णय देती है।
इस फैसले का असर प्रदेश की लंबित भर्तियों, चयन प्रक्रियाओं और आरक्षण नीति पर होगा। इसलिए अभ्यर्थियों, कर्मचारियों और सरकार सहित सभी पक्षों की निगाहें अब हाई कोर्ट के सुरक्षित फैसले पर टिकी हैं।
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वहीं ओबीसी पक्ष ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि 50 प्रतिशत की सीमा संविधान का हिस्सा नहीं है। लंबी बहस के बाद जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष डिवीजन बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया।
अंतिम सुनवाई पूरी, हाई कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित
सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब पूरे प्रदेश की नजर इस फैसले पर टिकी है, क्योंकि इसका असर प्रदेश की आरक्षण व्यवस्था और कई भर्ती प्रक्रियाओं पर पड़ेगा है।
mp obc 27 percent reservation case
अमन लेखी ने सरकार के जवाब को बताया कमजोर
अमन का तर्क था कि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा, संविधान के अनुच्छेद 16 से जुड़े सिद्धांत, आनुपातिकता, प्रशासनिक दक्षता और इंदिरा साहनी फैसले की व्याख्या जैसे मुद्दों पर राज्य का पक्ष अधूरा रहा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार जिन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा कर रही है, वे वास्तव में याचिकाकर्ताओं के पक्ष को ही समर्थन देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का विस्तार से दिया हवाला
अमन लेखी का कहना था कि इंदिरा साहनी मामले में तय 50 प्रतिशत सीमा आज भी प्रभावी संवैधानिक सिद्धांत है और सामान्य कानून बनाकर उसे पार नहीं किया जा सकता।
अमन ने यह भी कहा कि राज्य सरकार के पास ऐसा कोई समकालीन आंकड़ा या अध्ययन नहीं है, जिससे 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का औचित्य साबित हो सके।
गोपाल शंकरा नारायणन ने आयोग से परामर्श का मुद्दा उठाया
नारायणन ने एनएम थॉमस, बालाजी, वसंत कुमार और इंदिरा साहनी सहित कई संवैधानिक फैसलों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 50 प्रतिशत सीमा के प्रश्न पर स्पष्ट विचार किया था और यही वर्तमान विवाद का मुख्य मुद्दा है।
ओबीसी पक्ष ने 50 प्रतिशत सीमा पर जताई असहमति
विनायक प्रसाद का कहना था कि किसी भी अदालत को विधायिका द्वारा बनाए गए कानून में संशोधन करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान कानून बनाने का अधिकार संसद और विधानसभाओं को देता है, इसलिए न्यायालय द्वारा तय सीमा को संविधान का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
विनायक ने क्वांटिफिएबल डाटा की अनिवार्यता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, केवल आर्थिक स्थिति नहीं।
केवल ओबीसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता
ने कहा कि यदि किसी समय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में बदलाव होता तो भी यही प्रश्न उठता। इसलिए 50 प्रतिशत सीमा का परीक्षण केवल ओबीसी आरक्षण तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि सभी वर्टिकल आरक्षण को एक साथ देखकर किया जाना चाहिए।
अब फैसले का इंतजार
इस फैसले का असर प्रदेश की लंबित भर्तियों, चयन प्रक्रियाओं और आरक्षण नीति पर होगा। इसलिए अभ्यर्थियों, कर्मचारियों और सरकार सहित सभी पक्षों की निगाहें अब हाई कोर्ट के सुरक्षित फैसले पर टिकी हैं।
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ओबीसी आरक्षण सुनवाई: 50% सीमा EWS से टूटी या OBC से? हाईकोर्ट में सरकार की दलीलों पर उठे सवाल
ओबीसी आरक्षण पर नई बहस: जब दूसरे वर्गों को आबादी के अनुसार आरक्षण, तो OBC से क्यों भेदभाव?
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