एमपी ओबीसी आरक्षण केस: अंबेडकर यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट पर हाईकोर्ट में सवाल
Neel Tiwari | Jul 20, 2026, 17:36 IST
एमपी ओबीसी आरक्षण केस
मध्य प्रदेश में 27% OBC आरक्षण मामले की हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सामान्य वर्ग ने अंबेडकर यूनिवर्सिटी रिपोर्ट, AISHE और जनगणना आंकड़ों के आधार पर सवाल उठाए है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण को चुनौती मिली।
- मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
- सामान्य वर्ग ने पर्याप्त ठोस डेटा नहीं होने का दावा किया।
- अंबेडकर यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
- AISHE और जनगणना आंकड़ों पर आगे भी बहस होगी।
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण सुनवाई
इस मामले की सुनवाई के ठीक बाद ही जस्टिस विनय सराफ की दूसरी डिवीजन बेंच होने के कारण सुनवाई शाम चार बजे तक ही चल सकी। सोमवार की बहस में पिछड़ा वर्ग आयोग पर चर्चा हुई। अंबेडकर विश्वविद्यालय की सर्वे रिपोर्ट भी बहस में रही। उच्च शिक्षा विभाग के आंकड़ों पर भी दलीलें दी गईं।
सामान्य वर्ग की रही पूरी बहस
पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन पर उठाए सवाल
नियमों के अनुसार आयोग में अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, लेकिन आयोग के तीनों सदस्य विधायक थे। सामान्य वर्ग की ओर से तर्क दिया गया कि ऐसे आयोग को स्वतंत्र नहीं माना जा सकता और इसकी कार्यप्रणाली राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं थी।
महाजन आयोग के बाद नया डेटा नहीं जुटाने का आरोप
बहस में कहा गया कि न राष्ट्रीय आयोग और न ही मंडल आयोग के बाद ऐसा कोई व्यापक अध्ययन हुआ, जिसके आधार पर आरक्षण बढ़ाने का फैसला लिया जा सके।
इसके बावजूद सरकार ने लगभग 40 वर्ष पुरानी महाजन आयोग रिपोर्ट का सहारा लेकर वर्ष 2019 में संशोधन किया। अधिवक्ता ने कहा कि केवल जनसंख्या के आधार पर आरक्षण बढ़ाना सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी सहित कई फैसलों की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
रिपोर्ट को लेकर क्या कहा गया
रिपोर्ट में उच्च शिक्षा नामांकन 33.87 प्रतिशत बताया गया। 23.91 प्रतिशत लोग स्नातक या अधिक शिक्षित मिले। सामान्य वर्ग ने तुलनात्मक अध्ययन नहीं होने की बात कही। पक्ष ने रिपोर्ट को पूरे समाज के लिए अपर्याप्त बताया।
AISHE के राष्ट्रीय सर्वे से अदालत में की गई तुलना
सामान्य वर्ग की ओर से कहा गया कि वर्ष 2020-21 तक उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़कर लगभग 77 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
इन आंकड़ों के आधार पर तर्क दिया गया कि यदि उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ रहा है, तो केवल जनसंख्या का आधार लेकर आरक्षण प्रतिशत बढ़ाना उचित नहीं कहा जा सकता।
सामान्य वर्ग ने अदालत से कहा कि सरकार को व्यापक राष्ट्रीय आंकड़ों और वास्तविक प्रतिनिधित्व दोनों का संतुलित अध्ययन करना चाहिए था।
जनगणना के आंकड़ों का भी दिया गया हवाला
बहस में विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के आंकड़ों पर सवाल उठे। राष्ट्रीय स्तर पर स्नातकों का प्रतिशत कम बताया गया। सर्वे में 23.91 प्रतिशत ओबीसी स्नातक या अधिक शिक्षित मिले। सामान्य वर्ग ने इसे बेहतर शैक्षणिक प्रतिनिधित्व का संकेत बताया। पक्ष ने पिछड़ेपन के निष्कर्ष को उचित नहीं माना।
कोर्ट ने भी उठाया महत्वपूर्ण सवाल
लेबर फोर्स के आंकड़ों पर भी हुई बहस
इसी आधार पर रिपोर्ट में आरक्षण जारी रखने की अनुशंसा की गई। लेकिन उसी रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि अनुसूचित जाति वर्ग के 41 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के 29.9 प्रतिशत लोग भी लेबर फोर्स में शामिल हैं। सामान्य वर्ग ने तर्क दिया कि केवल इस आधार पर ओबीसी वर्ग को अतिरिक्त आरक्षण की जरूरत साबित नहीं होती।
अगली सुनवाई पर रहेगी नजर
अब इस मामले की अगली सुनवाई कल मंगलवार को दोपहर 2:30 बजे होगी। यह मामला मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की वैधता से जुड़ा है। इसलिए हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई और उसमें होने वाली बहस पर सभी पक्षों की नजर बनी हुई है।
अंबेडकर यूनिवर्सिटी 2022 की रिपोर्ट (सिर्फ ओबीसी वर्ग के 10000 लोगों में किया गया सर्वे)
15.65% ग्रेजुएट
18.5% पोस्ट ग्रेजुएट
0.11% प्रतिशत प्रोफेशनल कोर्स
AISHE 20-21 की रिपोर्ट
जनगणना 2001 के अनुसार मध्य प्रदेश की जनसंख्या 7.26 करोड़ जिसमें 32 लाख ग्रेजुएट और उससे अधिक पढ़े हुए। ग्रेजुएशन का परसेंट 4 से 6% बढ़ा है।
AISHE क्या है?
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