ओबीसी आरक्षण मामले में 1994 के बिल से लेकर 2019 के संशोधन तक खड़े हुए सवाल
Neel Tiwari | Jul 17, 2026, 18:13 IST
OBC आरक्षण पर बड़ा सवाल
मध्यप्रदेश OBC आरक्षण मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई जारी है। शुक्रवार को सामान्य वर्ग की ओर से दलीलें रखी गईं। अधिवक्ताओं ने 2019 संशोधन, सर्वे रिपोर्ट और 50% आरक्षण सीमा को लेकर सवाल उठाए।
समझें क्या है पूरा मामला
10 हजार लोगों के सर्वे पर सवाल उठाए गए।
1994 बिल को राष्ट्रपति मंजूरी नहीं मिलने की बात रखी गई।
27% आरक्षण के लिए एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी स्थिति पर बहस हुई।
सामान्य वर्ग की दलीलें सोमवार को भी जारी रहेंगी।
जबलपुर हाईकोर्ट में चल रही ओबीसी आरक्षण सुनवाई में आज कई महत्वपूर्ण तथ्य रखे गए। भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी के द्वारा कराए गए सर्वे पर भी सवाल खड़े हुए। हर 10 साल बाद आरक्षण का पुनरीक्षण ना कराये जाने से लेकर 1994 में ले गए बिल पर राष्ट्रपति की अनुमति न होने पर भी बहस हुई।
ओबीसी आरक्षण मामले फिर हुई सुनवाई
आरक्षण कम्युनल डिमांड पर नहीं
ओबीसी आरक्षण में संशोधन आधारहीन
साल 2003 में प्रस्ताव पारित हुआ। साल 2019 में पुरानी महाजन कमिशन रिपोर्ट के आधार पर बिल में संशोधन किया गया। इसके चार साल बाद डॉ. भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट पेश की गई। इसी रिपोर्ट के आधार पर एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी सिचुएशन का दावा किया गया।
यूनिवर्सिटी की सर्वे रिपोर्ट पर सवाल
कोर्ट में बताया गया कि 2010 की जनगणना के अनुसार प्रदेश की आबादी 7.5 करोड़ थी। इसके बावजूद यूनिवर्सिटी ने केवल 10 हजार लोगों का सर्वे किया। मध्यप्रदेश में 55 जिले हैं। ऐसे में हर जिले से करीब 150 से 200 लोगों का सर्वे किया गया। वकीलों ने इसे पूरे प्रदेश के पिछड़ेपन का सही आकलन नहीं माना।
इंदिरा साहनी फैसले में 50 प्रतिशत आरक्षण
कोर्ट ने क्या पूछा
इसके बाद 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण का प्रस्ताव राज्यपाल और राष्ट्रपति को भेजा गया था। राष्ट्रपति ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी थी। कोर्ट ने 1994 एक्ट को लेकर सवाल किया। इस पर अधिवक्ता ने कहा कि राष्ट्रपति ने 1994 एक्ट को मंजूरी नहीं दी थी।
ओबीसी आबादी 48 प्रतिशत होने का दावा
आरक्षण अधिनियम का हवाला
वकीलों ने कहा कि सरकार ने यह प्रक्रिया कभी नहीं अपनाई। उन्होंने आरोप लगाया कि 48 प्रतिशत आबादी का हवाला देकर राजनीतिक कारणों से 27 प्रतिशत आरक्षण को सही ठहराया गया।
इसका सबसे बड़ा नुकसान आरक्षित वर्ग के उन लोगों को हो रहा है जो इसके असली हकदार हैं। नेशनल सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया गया कि सबसे प्रभावशाली 20 जातियों में ओबीसी की चार जातियां भी शामिल है।
इसमें कुर्मी, अहीर, जाट और गुर्जर जातियों का नाम है। ऐसे में सबसे प्रभावशाली जातियों को भी ओबीसी आरक्षण का लाभ दिया जाना कैसे उचित माना जा सकता है। कोर्ट को बताया गया कि हर 10 साल में आरक्षण सूची का विश्लेषण होना चाहिए। पात्र लोगों को सूची में जोड़ा जाना चाहिए।
अपात्र लोग सूची से बाहर
करीब ढाई घंटे चली बहस के बाद भी सामान्य वर्ग का पक्ष पूरा नहीं हो सका। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती ने कोर्ट से दो घंटे और समय मांगा है। अब मामले की अगली सुनवाई सोमवार को दोपहर 2:30 बजे होगी। सोमवार को भी सामान्य वर्ग की ओर से ही दलीलें रखी जाएंगी।
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