OBC आरक्षण के लिए सीएम मोहन यादव हुए सक्रिय, दिल्ली में सॉलिसिटर जनरल से मुलाकात
जबलपुर हाईकोर्ट के ओबीसी आरक्षण पर आए फैसले के बाद प्रदेश में राजनीतिक हलचल मच गई है। कांग्रेस बीजेपी को घेर रही है और उधर बीजेपी कह रही है कि कमलनाथ सरकार के समय आए एक्ट में ही कई गलतियां थी। लेकिन इस फैसले के बाद अनारक्षित पक्ष की मांग उठ रही है कि हाईकोर्ट आदेश के बाद जल्द से जल्द 13 फीसदी पद अनहोल्ड कर भर्ती दी जाए। वहीं ओबीसी वर्ग 27 फीसदी आरक्षण की मांग दोहरा रहा है। इसी बीच सीएम डॉ. मोहन यादव ने दिल्ली में रणनीतिक चर्चा की।
सीएम मोहन यादव ने दी जानकारी
सीएम डॉ. मोहन यादव सोमवार दोपहर में दिल्ली गए थे। उन्होंने मंगलवार सुबह नई दिल्ली में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता औऱ प्रदेश के एजी प्रशांत सिंह के साथ मुलाकात की।
सीएम ने खुद इसकी जानकारी साझा करते हुए कहा कि दोनोें के साथ ओबीसी आरक्षण (OBC Reservation) को लेकर हाईकोर्ट के आधेस से जुड़े विधिक पहलुओं और आगामी कानूनी कार्रवाई की रणनीति पर विस्तृत चर्चा की गई।
माना जा रहा है कि सरकार जल्द इस पर फैसला लेगी। संभव है कि एक बार फिर सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए और सभी को साथ लेकर आगे बढ़ा जाए।
क्या है सरकार के पास विकल्प
जानकारों के अनुसार सरकार के पास कानूनी तौर पर यह विकल्प मौजूद है। सरकार हाईकोर्ट जबलपुर में डबल बैंच के फैसले को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करे। इसमें फैसले पर रिव्यू करने की याचिका लग सकती है।
सरकार सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करे या ओबीसी आरक्षण पर नया कानून बनाए।
हाईकोर्ट ने यह दिए हैं आदेश
हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर को दिए गए फैसले में तीन अहम बातें कहीं है। कमलनाथ सरकार के समय का ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण एक्ट गैर संवैधानिक है, इसे रद्द किया जाता है।
मार्च 2019 से 29 सितंबर 22 के दौरान अतिरिक्त ओबीसी आरक्षण पर हुई नियुक्त वैध रहेंगी इन्हें सरकार आगे की नियुक्ति में पद समायोजित करेंगी। होल्ड किए गए 13 फीसदी पद को तीन माह में अनहोल्ड कर अनारक्षित कैटेगरी को दिए जाएं।
उम्मीदवार रिजल्ट के लिए अटक गए
हाईकोर्ट के ही आदेश में बिंदु 221 में पीएससी, ईएसबी व अन्य चयन एजेंसी को अहम आदेश दिया गया है। इसके तहत इस आदेश के साथ ही अब 27 फीसदी आरक्षण एक्ट रद्द हो गया है और ओबीसी को 14 फीसदी आरक्षण मान्य है। ऐसे में जो भी रिजल्ट जारी होंगे वह इसी के तहत होंगे।
यानी अब 87-13 फीसदी का असित्तव नहीं रह गया है। चयन एजेंसी को 9 अक्टूबर के बाद 100 फीसदी रिजल्ट, 14 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर देना होगा। इसके चलते पीएससी और ईएसबी एजेंसी अब सरकार से मार्गदर्शन का इंतजार कर रहे हैं। कारण है कि जीएडी ने ही 29 सितंबर 22 को आदेश जारी कर 87-13 फीसदी फार्मूला जारी कर इसी के तहत रिजल्ट का कहा था।
अब सरकार के आदेश के बाद ही एजेंसी आगे रिजल्ट की प्रक्रिया कर सकती है।
आगे भर्ती विज्ञापन पर भी असमंजस
वहीं जहां सीएम डॉ. मोहन यादव की मंशा है कि एक लाख सरकारी पदों पर भर्ती की जाए, वहीं इस आदेश से वह भी रूक गई है। कारण है कि भर्ती विज्ञापन में ही आरक्षण का प्रतिशत और पदों का आरक्षण बताया जाता है कि कितने पद किस कैटेगरी मे हैं।
लेकिन जब तक सरकार इस संबंध में आदेश जारी नहीं कर देती है तब तक भर्ती विज्ञापन निकलना मुश्किल है। सरकार 14 फीसदी ओबीसी पर विज्ञापन निकाले तो राजनीतिक रूप से घिरेगी और 27 फीसदी पर निकालना गैर संवैधानिक होगा।
क्या रास्ता निकल सकता है-
कानूनी जानकारों के मुताबिक, सरकार समीक्षा याचिका या स्टे मांगकर पुराने नियमों से रिजल्ट जारी करवा सकती है। यानी की 87-13 के तहत ही इन्हें जारी करने दिए जाएं, क्योंकि यह विज्ञापन 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के हिसाब से जारी हुए थे। इन सभी में 87 और 13 फीसदी के दो रिजल्ट बनाए गए है।
सरकार ने फौरी राहत नहीं ली तो भर्ती प्रक्रिया और आगामी रिजल्ट प्रभावित होंगे। ऐसे में लाखों युवाओं का आक्रोश बढ़ेगा। वहीं सरकार को जल्द तय करना होगा कि वह भर्ती विज्ञापन में आरक्षण की क्या शर्त रखकर विज्ञापन देना चाहती है। नहीं तो विज्ञापन अटक जाएंगे। उधर उम्मदीवार अब अनारक्षित को 13 फीसदी होल्ड पद देने की भी मांग कर रहे हैं।
FAQs:
- जबलपुर हाईकोर्ट के हालिया आदेश का क्या प्रभाव है?
जबलपुर हाईकोर्ट ने 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण एक्ट को गैर संवैधानिक माना है, जिससे अब 14 फीसदी ओबीसी आरक्षण मान्य है और 13 फीसदी अनारक्षित पदों को अनहोल्ड कर भर्ती प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा। - सरकार ने ओबीसी आरक्षण पर कोई कदम उठाने का निर्णय लिया है?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिल्ली में बैठकें की हैं और सरकार हाईकोर्ट के आदेशों के तहत कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है, जिसमें रिव्यू पिटीशन दायर करना शामिल है। - उम्मीदवारों के लिए भर्ती प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा?
हाईकोर्ट के फैसले के बाद भर्ती प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं, और सरकार को आदेश जारी करने में देरी होने पर लाखों युवाओं में आक्रोश बढ़ सकता है।