OBC आरक्षण सुनवाई : 27% को चुनौती, हाई कोर्ट में 50% सीमा पर बहस
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई बुधवार 15 जुलाई को जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच में हुई। सुनवाई दोपहर 2:30 बजे शुरू हुई और करीब दो घंटे तक चली। इस दौरान अदालत में सबसे पहले ओबीसी आरक्षण का विरोध कर रहे सामान्य वर्ग की ओर से विस्तृत दलीलें रखी गईं। सुनवाई का पूरा केंद्र 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की वैधता, 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा और सरकार के संशोधन की कानूनी स्थिति पर रहा। चुनाव के पहले आए इस बिल के संशोधन पर सवाल उठाते हुए से राजनीति से प्रेरित बताया गया। अदालत ने भी कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे और दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान से सुना।
सरकार और सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने रखा पक्ष
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम. नटराजन वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से अदालत में उपस्थित हुए। वहीं सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने अपना पक्ष रखा। सामान्य वर्ग ने सरकार के संशोधन, आरक्षण की सीमा और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अदालत के सामने विस्तृत कानूनी तर्क रखे। पूरे समय अदालत में संवैधानिक प्रावधानों और न्यायालय के पूर्व निर्णयों के आधार पर बहस होती रही। दोनों पक्षों के तर्कों के बीच अदालत ने भी कई बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा।
27% ओबीसी आरक्षण को बताया कानून के खिलाफ
सामान्य वर्ग की ओर से अदालत में कहा गया कि ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत करने के लिए लाया गया संशोधन कानून के अनुरूप नहीं है। दलील दी गई कि सरकार ने जिस आधार पर संशोधन किया, वह संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता। यह भी कहा गया कि संशोधन ऐसे समय लाया गया था जब चुनाव होने वाले थे। इसलिए इस संशोधन के पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। सामान्य वर्ग ने अदालत से इस पूरे संशोधन की वैधता पर विचार करने का आग्रह किया।
50% आरक्षण सीमा बनी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा
सुनवाई के दौरान सबसे अधिक बहस 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा पर हुई। सामान्य वर्ग की ओर से इंदिरा साहनी समेत सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया गया। अदालत को बताया गया कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की गई है। यदि इससे अधिक आरक्षण दिया जाता है तो सामान्य वर्ग के अधिकार प्रभावित होते हैं। दलील में यह भी कहा गया कि इससे समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होता है। इसी आधार पर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को चुनौती दी गई।
जयश्री पाटिल मामले पर भी अदालत में हुई चर्चा
बहस के दौरान जयश्री पाटिल मामले का भी उल्लेख किया गया। अदालत के सामने यह बात रखी गई कि सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि विशेष परिस्थितियों में 50 प्रतिशत की सीमा से आगे भी आरक्षण दिया जा सकता है। हालांकि सामान्य वर्ग ने दलील दी कि वर्तमान मामला ऐसी किसी विशेष परिस्थिति में नहीं आता। अदालत ने भी इस बिंदु पर सवाल पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने कहीं स्पष्ट किया है कि ऐसी विशेष परिस्थितियां कौन सी होंगी। इस पर बताया गया कि इसकी स्पष्ट व्याख्या किसी फैसले में नहीं की गई है।
सामान्य वर्ग ने कहा, यह मामला विशेष परिस्थितियों का नहीं
सामान्य वर्ग की ओर से अदालत में कहा गया कि राज्य सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि मध्य प्रदेश में ऐसी असाधारण स्थिति है, जहां 50 प्रतिशत की सीमा से आगे जाकर आरक्षण देना जरूरी हो। अधिवक्ता ने कहा कि केवल संशोधन कर देने से विशेष परिस्थितियां साबित नहीं हो जातीं। जब तक ठोस आधार और कानूनी कारण सामने नहीं आते, तब तक सीमा बढ़ाना उचित नहीं माना जा सकता। इसी वजह से 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को चुनौती दी जा रही है।
क्वांटिफिएबल डाटा पर फिर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान क्वांटिफिएबल डाटा का मुद्दा भी प्रमुख रहा। सामान्य वर्ग ने अदालत को बताया कि ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधित्व का सही आकलन किए बिना आरक्षण बढ़ाया गया। उनका कहना था कि पर्याप्त डाटा संकलित किए बिना 27 प्रतिशत आरक्षण देना सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों के अनुरूप नहीं है। अदालत के सामने यह भी दलील दी गई कि प्रतिनिधित्व का वैज्ञानिक आकलन किए बिना आरक्षण बढ़ाने का फैसला कानूनी रूप से कमजोर माना जाएगा।
सरकार के संशोधन की धाराओं पर भी हुई विस्तृत बहस
सामान्य वर्ग की ओर से सरकार के संशोधन की विभिन्न धाराओं का भी उल्लेख किया गया। अदालत को बताया गया कि संशोधन में बैकलॉग पदों को नई रिक्तियों में शामिल नहीं किया गया। साथ ही संशोधन की धारा 4-3(C) में 50 प्रतिशत सीमा का उल्लेख किया गया है। दूसरी ओर धारा 4-2 में बदलाव कर ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत करने की व्यवस्था बनाई गई। सामान्य वर्ग ने कहा कि यही विरोधाभास पूरे संशोधन पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
अदालत ने दोनों पक्षों के तर्कों पर मांगा स्पष्टीकरण
सुनवाई के दौरान अदालत केवल दलीलें सुनने तक सीमित नहीं रही। न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी पूछे। अदालत ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने कहीं स्पष्ट रूप से बताया है कि किन परिस्थितियों में 50 प्रतिशत की सीमा पार की जा सकती है। इस प्रश्न पर दोनों पक्षों ने अपने-अपने कानूनी तर्क रखे। अदालत ने सभी दलीलों को रिकॉर्ड पर लिया और आगे की सुनवाई के लिए मामला जारी रखा।
गुरुवार को फिर होगी सुनवाई, पहले विरोध फिर समर्थन की दलीलें
करीब दो घंटे चली सुनवाई के बाद सामान्य वर्ग ने अपनी बहस पूरी करने के लिए लगभग आधे घंटे का अतिरिक्त समय मांगा। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले की सुनवाई अब प्रतिदिन दोपहर 2:30 बजे होगी। पहले ओबीसी आरक्षण का विरोध करने वाले पक्ष अपनी दलील पूरी करेंगे। इसके बाद सरकार और आरक्षण के समर्थन में मौजूद पक्ष अपना पक्ष रखेंगे। अंत में वे अधिवक्ता भी अपनी दलील देंगे, जो आरक्षण के समर्थन में हैं और आरक्षण का दायरा और बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। गुरुवार की सुनवाई को लेकर अब सभी पक्षों की नजरें हाई कोर्ट पर टिकी रहेंगी।
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