हर साल तबादला आदेश, फिर भी पसंदीदा पंचायत में काबिज सचिव
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- वर्षों से एक ही पंचायत में जमे सचिवों को हटाएगी नई तबादला नीति।
- अपने ही गांव और रिश्तेदारी वाली पंचायतों में भी नहीं रह पाएंगे सचिव।
- पूर्व के वर्षों में तबादला आदेशों को शिथिल कराने में कामयाब रहे सचिव।
- नई तबादला नीति के प्रावधानों पर अमल को लेकर ग्रामीणों में असमंजस।
- जीजा, साले, चाचा, ताऊ की पंचायतों से भी सचिवों की विदाई की तैयारी।
मध्य प्रदेश में तबादला सीजन में फिर ग्राम पंचायत सचिवों की बदली की तैयारी शुरू हो गई है। नई तबादला नीति के तहत अब सचिव अपनी खुद की या करीबी रिश्तेदारी वाली पंचायतों में पदस्थ नहीं रह पाएंगे।
वर्तमान में ऐसी पंचायतों में जमे सचिवों की सूची तैयार कर ली गई है। उन्हें दूसरी पंचायतों में पदस्थ किया जाना है। हांलाकि नई तबादला नीति का यह नियम नया नहीं है।
यही वजह है कि ट्रांसफर की चर्चाओं के बाद भी सचिव बेफिक्र हैं। सचिव तबादले से पहले ही अपने राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्कों को साधने में जुट गए हैं। क्योंकि इससे पहले भी सचिव तबादला आदेशों को रद्द कराने में कामयाब होते रहे हैं।
सरकारी नीति के कमजोर नियम
सरकारी कर्मचारियों की पदस्थापना में बदलाव के लिए ट्रांसफर की प्रक्रिया निर्धारित है। एक निश्चित समयावधि या अन्य कारणों से कर्मचारी- अधिकारी की पदस्थापना स्थल में बदलाव किया जाता है। दूसरे विभागों की तरह अब ग्राम पंचायत सचिवों की पदस्थापना में भी बदलाव किया जाने लगा है।
पंचायत सचिवों पर अपने ही गांव या करीबी रिश्तेदार की पंचायत में सालों तक कार्यरत रहने के आरोप लगते रहे हैं। इस वजह से उनकी कार्यशैली और बढ़ते प्रभाव का खामियाजा ग्रामीणों को उठाना पड़ता है। जिसकी शिकायतें भी सरकार तक पहुंचती हैं। इसी वजह से सचिवों के ट्रांसफर की शुरूआत की गई थी। सरकार ने इसके लिए कड़े नियम भी बनाए हैं, लेकिन सचिव इन पर भारी पड़ जाते हैं।
तबादला नीति पर भारी रसूख
प्रदेश की ज्यादातर पंचायतों में कई सचिवों सालों से पदस्थ हैं। लंबी पदस्थापना के कारण अधिकांश पंचायतों में सचिवों का रसूख कमजोर सरपंचों से भी ज्यादा होता है।
खासतौर से सचिव अपने ही गृह ग्राम, रिश्तेदारों के प्रभाववाली पंचायतों में सबसे मजबूत होते हैं। यही वजह है कि ऐसी पदस्थापना छोड़ना नहीं चाहते। कोई सचिव अपने जीजा की पंचायत में तो कोई साले के गांव में सालों से पदस्थ है।
वहीं कोई अपने चाचा, मौसा या फूफा की पंचायत में सचिव बना बैठा है। पिछले सालों में तबादला आदेश के बाद इनमें से ज्यादातर सचिव वापस उसी पंचायत में पोस्टिंग कराने में कामयाब रहे हैं।
पंचायतों में सालों से इनका कब्जा
गुना जिले की बम्होरी जनपद की टीली पंचायत में हरिलाल मेहता बीते 8 साल से सचिव हैं। टीली पंचायत सचिव हरिलाल मेहता का गृह ग्राम भी है। यही नहीं मायका होने के बावजूद सहायक सचिव अनीता पटेलिया यहां पदस्थ हैं।
छतरपुर की गौरीहार जनपद की बरहा पंचायत में सचिव अमर सिंह 5 साल से काम कर रहे हैं। ग्राम पंचायत चौफाल कोठार के सचिव जगदीश रजक हैं। यहां उनके मामा का घर है।
वहीं सहायक सचिव नीरज रजक 15 साल से पंचायत में तैनात हैं जो कि उनका अपना गांव है। सचिव और सहायक सचिव दोनों सगे रिश्तेदार हैं और इसी वजह से पंचायत के हर काम पर उनका प्रभाव है।
ये कहती है नई तबादला नीति...
- अगर पंचायत सचिव का कोई रिश्तेदार सरपंच या उप-सरपंच है
- एक ही ग्राम पंचायत में कार्यरत रहते हुए 10 साल या ज़्यादा समय हो गया है।
- भ्रष्टाचार, वित्तीय गड़बड़ी या गंभीर शिकायतों से संबंधित प्रकरण लंबित हैं।
- अनुशासनात्मक कार्रवाई या अन्य जांच के दायरे में हैं तो पदस्थापना में बदलाव होगा।
रिश्तेदारों की पंचायत छोड़ने से परहेज
पिछले सालों में भी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग सचिवों के तबादला आदेश जारी करता रहा है। हांलाकि सचिवों के रसूख और राजनीति में ऊंची पहुंच के चलते ज्यादातर मामलों में विभागीय आदेश परवान नहीं चढ़ पाए।
अधिकांश सचिव तबादला आदेश को चंद दिन बाद ही रद्द कराते हुए वापस उसी पंचायत में लौटने में कामयाब रहे हैं। दरअसल रिश्तेदारी वाली पंचायत में काम करने में आसानी और विरोध दब जाता है। इसके अलावा पंचायत के कामों में होने वाली गड़बड़ी पर भी उलझ खड़ी नहीं होतीं।
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