पटवारी हड़ताल से मोहन सरकार की मुश्किलें बढ़ीं: 50 लाख रजिस्ट्री का लक्ष्य अटका, इंदौर-उज्जैन में 32 पटवारी पर कार्रवाई

Arohi Raj | Oct 14, 2026, 17:28 IST
एमपी में पटवारियों की हड़ताल से रजिस्ट्री लक्ष्य पर असर पड़ेगा।
मध्यप्रदेश में स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री फिर अटक गई है। इसे लेकर पटवारी हड़ताल का गतिरोध फिर गहरा गया है। बता दें 9 अक्टूबर को मुख्यमंत्री से बैठक के बाद हड़ताल खत्म होने का ऐलान हुआ था। लेकिन 12 अक्टूबर तक बहाली के आदेश नहीं आए। इसके बाद पटवारी संघ ने योजना के काम से फिर दूरी बना ली।
Registrations under the 'Swamitva Yojana' in Madhya Pradesh have stalled once again. The deadlock surrounding the Patwari strike has deepened as a result.

वहीं, लोकायुक्त कार्रवाई पटवारी रिश्वत के आंकड़े भी चर्चा में हैं। सवाल दोनों तरफ से उठ रहे हैं। क्या पटवारियों का कानूनी डर जायज है? या लोकायुक्त कार्रवाई के आंकड़े अलग कहानी कहते हैं?



एमपी पटवारी हड़ताल पर क्यों हैं

स्वामित्व योजना में गांव की आबादी जमीन का अधिकार अभिलेख बनता है। मोहन सरकार ने 17 सितंबर से रजिस्ट्री अभियान शुरू किया। 17 अक्टूबर तक करीब 50 लाख संपत्तियों की रजिस्ट्री का लक्ष्य है। स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क का खर्च राज्य सरकार उठा रही है।



विवाद की जड़ रजिस्ट्री में पटवारी की भूमिका है। प्रक्रिया में पटवारी को निष्पादक यानी विक्रेता की जगह रखा गया। पटवारियों का तर्क है कि जमीन पर उनका मालिकाना हक नहीं होता। भविष्य में सीमा या हिस्सेदारी पर विवाद हुआ, तो जिम्मेदारी उन पर आ सकती है।



गुना में संघ ने इसका उदाहरण भी दिया। वहां कब्जा एक भाई का है, पट्टे में तीन भाइयों के नाम हैं।



पटवारियों की यह चिंता अकेली नहीं है

तहसीलदार संघ ने भी रजिस्ट्री अधिकारी बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। पटवारी संघ के अध्यक्ष उपेंद्र सिंह बघेल के मुताबिक, अभियान के पहले पांच दिन प्रदेश में एक भी रजिस्ट्री नहीं हुई।



पुरानी मांगें भी अब तक अटकी

अगस्त 2026 में करीब 25 हजार पटवारी कलमबंद हड़ताल पर गए थे। मांगों में कैडर रिव्यू, सुरक्षा कानून और लंबित भुगतान शामिल थे। नायब तहसीलदार की विभागीय परीक्षा की मांग भी इसी सूची में है। संघ के मुताबिक राजस्व निरीक्षक के करीब एक हजार 150 पद खाली हैं।



सख्ती, समझौता और फिर गतिरोध

रजिस्ट्री शुरू होने के बाद कई जिलों में कलेक्टरों ने सख्ती दिखाई। सागर कलेक्टर प्रतिभा पाल ने 12 पटवारी निलंबित किए और 137 को नोटिस दिए। रतलाम में परिवीक्षाधीन पटवारियों की सेवा समाप्त की गई। संघ का दावा है कि 4 हजार से ज्यादा पटवारी निलंबित या बर्खास्त हुए।



9 अक्टूबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से संघ की बैठक हुई। 17 सितंबर के बाद की कार्रवाइयां शून्य करने पर सहमति बनी। संघ के मुताबिक, राजस्व विभाग ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 218 के तहत आदेश जारी किया है। इससे रजिस्ट्री विवाद में पटवारियों को मुकदमे से संरक्षण मिलेगा। लेकिन जिलों से पटवारी बहाली के आदेश अब तक जारी नहीं हुए।



लोकायुक्त कार्रवाई के आंकड़े क्या कहते हैं

हड़ताल के बीच पटवारी रिश्वत का मुद्दा भी गर्म है। मीडिया रिपोर्ट्स में लोकायुक्त संगठन के हवाले से एक आंकड़ा सामने आया है। इंदौर-उज्जैन संभाग के 16 जिलों में दो साल में 32 पटवारी पकड़े गए। सभी मामले जमीन से जुड़े कामों के थे। नामांतरण, सीमांकन और ऋण पुस्तिका के बदले दो हजार से एक लाख रुपए मांगे गए।



ग्वालियर लोकायुक्त ने 19 महीनों में 37 सरकारी कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े। इनमें 19 राजस्व विभाग के थे। यानी राजस्व विभाग भ्रष्टाचार के मामलों में आगे दिखता है।



लेकिन तस्वीर सिर्फ पटवारियों तक सीमित नहीं है। लोकायुक्त संगठन ने 1982 से मई 2026 तक के आंकड़े जारी किए हैं। इस दौरान भ्रष्टाचार के 7,717 मामले दर्ज हुए। इनमें 1,954 यानी करीब 25 फीसदी आरोपी राजपत्रित अधिकारी हैं।



हाल के कुछ ट्रैप मामले

लोकायुक्त के मुताबिक, बदनावर में पटवारी सुनील बेनल 20 हजार रुपए लेते पकड़े गए। यह कार्रवाई 19 जनवरी 2026 को हुई। रीवा में 16 मई 2026 को पटवारी मनोज पांडे 5 हजार लेते पकड़े गए। उन पर सीमांकन के लिए 15 हजार मांगने का आरोप है।



इंदौर में पटवारी अनुशील जोसफ पर बटांकन के बदले 2 लाख मांगने का आरोप लगा। शुरुआती जांच में शिकायत सही मिलने पर उन्हें निलंबित किया गया।



आंकड़ों का दूसरा पहलू भी

प्रदेश में करीब 25 हजार पटवारी हैं। दो संभागों के 32 मामले पूरे कैडर का छोटा हिस्सा हैं। लोकायुक्त एमपी के आंकड़े यह भी बताते हैं कि मामला सजा तक धीरे पहुंचता है। लोकायुक्त के 295 मामलों में सरकार की अभियोजन स्वीकृति लंबित है। इनमें 6 मामले राजस्व विभाग के हैं।



निजी दफ्तर और खाली कक्ष के आरोप

इंदौर से जुड़ी रिपोर्ट्स में पटवारियों के निजी दफ्तरों की बात सामने आई है। आरोप है कि वहां निजी लोग भी काम संभालते हैं। प्रशासनिक संकुल में तय कक्ष अक्सर खाली रहने की शिकायतें भी हैं। इन आरोपों पर पटवारी संघ का पक्ष अभी सामने नहीं आया है।



बीच में फंसा आम किसान

एमपी पटवारी स्ट्राइक का सीधा असर गांवों पर पड़ रहा है। स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री और नामांतरण जैसे काम धीमे हैं। मुख्यमंत्री ने 27 अक्टूबर के महासम्मेलन में आर्थिक मांगों पर घोषणा का आश्वासन दिया है। क्या तब तक बीच का रास्ता निकलेगा?



यह खबर क्यों जरूरी है

जमीन का रिकॉर्ड गांव के हर परिवार की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है। स्वामित्व योजना से लाखों परिवारों को अपने घर का कानूनी हक मिलना है। ऐसे में रजिस्ट्री अटकना सीधे आम लोगों को प्रभावित करता है। साथ ही, सरकारी कर्मचारियों की कानूनी सुरक्षा भी एक जायज सवाल है। यह खबर दोनों पक्ष रखती है, ताकि पाठक तय कर सके कि जवाबदेही कहां बनती है। रिश्वत के आंकड़े और अभियोजन में देरी, दोनों पर ध्यान जरूरी है।



FAQs



  1. पटवारी हड़ताल क्यों कर रहे हैं?
    पटवारी हड़ताल स्वामित्व योजना के तहत गांव की जमीन की रजिस्ट्री में उनकी भूमिका के कारण हो रही है। पटवारियों का कहना है कि उनकी जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं, लेकिन सुरक्षा कानून, कैडर रिव्यू और लंबित भुगतान जैसी पुरानी मांगों का ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
  2. लोकायुक्त द्वारा पटवारियों पर रिश्वत लेने के क्या आरोप हैं?
    लोकायुक्त के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में इंदौर-उज्जैन संभाग में 32 पटवारी रिश्वत लेते पकड़े गए हैं। आरोपों में नामांतरण, सीमांकन और ऋण पुस्तिका के लिए 2,000 से 1 लाख रुपए की मांग शामिल है।
  3. स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री थी, लेकिन अब रुक गई है। इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
    स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री रुकने से गांवों में भूमि के नामांतरण के काम प्रभावित हो रहे हैं, जो ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा से सीधे जुड़े हैं। रजिस्ट्री के धीमे होने से लोगों को कानूनी हक मिलने में देरी हो रही है।
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