MP में बस किराये का अजब खेल! एक ही रूट, एक ही तारीख, फिर भी कहीं 600 तो कहीं 10 हजार का टिकट
द सूत्र की पड़ताल में बस किराये से लेकर टूरिस्ट परमिट, ट्रैवल एजेंटों के नियम और परिवहन विभाग की निगरानी तक कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
आखिर निजी बसों के किराये पर किसका नियंत्रण?
मध्य प्रदेश में रोजाना हजारों लोग निजी बसों से एक शहर से दूसरे शहर तक सफर करते हैं। किसी को नौकरी के लिए जाना है, किसी को पढ़ाई के लिए तो किसी को परिवार के साथ यात्रा करनी होती है। ऐसे में बस का किराया आम आदमी के बजट का अहम हिस्सा होता है।
ऑनलाइन टिकट बुकिंग के दौरान एक ही रूट पर अलग-अलग बसों के किराये में बड़ा अंतर दिखाई देता है। बस की श्रेणी, एसी या नॉन एसी सुविधा, स्लीपर सीट, यात्रा का समय और सीटों की मांग के हिसाब से कीमतें अलग हो सकती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या किराये में पारदर्शिता है? क्या यात्रियों को यह बताया जाता है कि उनसे किस आधार पर इतनी रकम ली जा रही है?
MP में बस किराये का अजब खेल: एक ही रूट पर हजारों का अंतर!
भोपाल से विभिन्न शहरों के लिए बस किराये की तुलना नीचे दी गई है। इसमें सामान्य दिनों और त्योहारों के दौरान लगने वाले अनुमानित किराये की जानकारी दी गई है।
| बस रूट | सामान्य दिनों में किराया | त्योहारों में किराया | अधिकतम बढ़ोतरी |
| भोपाल – ग्वालियर | ₹600 – ₹1,800 | ₹2,000 – ₹10,000 | ₹8,200 तक |
| भोपाल – जबलपुर | ₹500 – ₹1,300 | ₹2,000 – ₹5,000 | ₹3,700 तक |
| भोपाल – दिल्ली | ₹2,000 – ₹3,000 | ₹4,000 – ₹9,000 | ₹6,000 तक |
| भोपाल – रीवा | ₹500 – ₹1,200 | ₹1,500 – ₹5,000 | ₹3,800 तक |
अगस्त में सरकार ने बढ़ाया था किराया
मध्य प्रदेश सरकार ने 5 अगस्त 2026 को बस किराये की नई दरें निर्धारित की थीं। इसके तहत सामान्य बस का अधिकतम किराया 1.25 रुपये प्रति यात्री प्रति किलोमीटर से बढ़ाकर 2 रुपये किया गया। न्यूनतम किराया 10 रुपये निर्धारित किया गया।
बसों की श्रेणी के अनुसार सामान्य दर से 25 प्रतिशत तक डीलक्स नॉन एसी, 40 प्रतिशत तक स्लीपर, 50 प्रतिशत तक डीलक्स एसी और 75 प्रतिशत तक सुपर लग्जरी एसी बसों के लिए अधिक किराया निर्धारित किया गया। रात्रिकालीन सामान्य बसों के लिए 10 प्रतिशत अतिरिक्त दर का प्रावधान है।
हालांकि इन श्रेणियों में अलग से नाइट चार्ज नहीं लिया जा सकता और एक्सप्रेस सेवा पर अतिरिक्त शुल्क की अनुमति नहीं है।
ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट (AITP) और स्टेज कैरिज परमिट में क्या है अंतर?
अक्सर लोग बस में सफर करते हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि हर बस को सड़क पर चलाने के लिए एक जैसा परमिट नहीं मिलता। बस किस तरह यात्रियों को बैठा सकती है, कहां से कहां तक जा सकती है और किस तरीके से यात्रियों से किराया ले सकती है, यह काफी हद तक उसके परमिट पर निर्भर करता है।
स्टेज कैरिज परमिट क्या होता है?
इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझिए। जैसे कोई बस भोपाल से ग्वालियर के लिए नियमित रूप से चलती है। रास्ते में अलग-अलग जगहों से यात्री बस में बैठते हैं और अपने गंतव्य के हिसाब से टिकट खरीदते हैं।
यानी कोई भोपाल से ग्वालियर का टिकट लेगा, कोई बीच के किसी स्टॉप तक जाएगा और कोई रास्ते में बस से उतरेगा।
इस तरह अलग-अलग यात्रियों से अलग-अलग किराया लेकर बस चलाने की व्यवस्था को स्टेज कैरिज कहा जाता है।
मोटर व्हीकल एक्ट 1988 की धारा 2(40) में स्टेज कैरिज की यही परिभाषा दी गई है।
ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट क्या होता है?
अब बात करते हैं ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट की। जैसा कि नाम से ही समझ आता है, यह परमिट पर्यटक वाहनों को पूरे देश में चलाने के लिए दिया जाता है। इसका उद्देश्य पर्यटकों को एक शहर से दूसरे शहर या अलग-अलग राज्यों में यात्रा कराने की सुविधा देना है।
उदाहरण के तौर पर किसी टूरिस्ट बस को भोपाल से जयपुर, दिल्ली या अन्य शहरों में पर्यटकों को लेकर जाना है, तो वह निर्धारित नियमों और शर्तों के तहत ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट पर चल सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस परमिट के नाम पर बस को सामान्य रूट की स्टेज कैरिज बस की तरह कहीं से भी यात्री बैठाने और रास्ते में उतारने की खुली छूट मिल जाती है।
इस परमिट के लिए बस को टूरिस्ट वाहन की निर्धारित शर्तें पूरी करनी होती हैं। साथ ही यात्रियों की सूची और यात्रा से जुड़ा रिकॉर्ड रखना भी जरूरी है।
दोनों परमिट में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
स्टेज कैरिज में बस नियमित रूट पर अलग-अलग यात्रियों को अलग-अलग किराये पर सफर कराती है।
वहीं ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट पर्यटक वाहन के संचालन के लिए होता है, जिसमें यात्रियों को निर्धारित पर्यटक वाहन और कॉन्ट्रैक्ट कैरिज के नियमों के अनुसार ले जाया जाता है।
यानी दोनों परमिट का उद्देश्य और संचालन का तरीका अलग-अलग है।
ट्रैवल एजेंटों के लिए नियम 119 से 126 तक क्या हैं? आसान भाषा में समझिए
| नियम | क्या कहता है नियम? | आम लोगों के लिए इसका मतलब |
| नियम 119 | ट्रैवल एजेंट के लाइसेंस और उसके कामकाज को नियंत्रित करता है। | बसों में सफर के टिकट बेचने या यात्रियों की बुकिंग कराने वाले एजेंट के पास वैध लाइसेंस होना जरूरी है। |
| नियम 120 | लाइसेंस लेने के लिए आवेदन की प्रक्रिया तय करता है। | एजेंट को लाइसेंस लेने के लिए तय फॉर्म में संबंधित अधिकारी के पास आवेदन करना होगा। |
| नियम 121 | लाइसेंस आवेदन की जांच का प्रावधान करता है। | अधिकारी एजेंट की आर्थिक स्थिति, अनुभव, कार्यालय और यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं की जांच करेंगे। |
| नियम 122 | लाइसेंस जारी करने और रिन्यू करने की प्रक्रिया बताता है। | लाइसेंस देना है या नहीं, इसका फैसला संबंधित लाइसेंसिंग अधिकारी करेगा। |
| नियम 123 | सिक्योरिटी राशि जमा करने का प्रावधान है। | लाइसेंस लेने के लिए एजेंट को सरकार के पास तय सिक्योरिटी राशि जमा करनी होगी। |
| नियम 124 | लाइसेंस का फॉर्म और उसकी वैधता तय करता है। | एजेंट को निर्धारित फॉर्म में लाइसेंस मिलेगा, जो तीन साल तक वैध रहेगा। |
| नियम 125 | लाइसेंस के नवीनीकरण की प्रक्रिया बताता है। | लाइसेंस की अवधि खत्म होने से पहले एजेंट को उसके नवीनीकरण के लिए आवेदन करना होगा। |
| नियम 126 | लाइसेंसधारी ट्रैवल एजेंट की जिम्मेदारियां तय करता है। | एजेंट को यात्रियों का रिकॉर्ड रखने से लेकर बसों के परमिट, समय और कार्यालय की व्यवस्था तक नियमों का पालन करना होगा। |
टूरिस्ट परमिट की बसें क्या नियमित सवारी ढो सकती हैं?
दरअसल, स्टेज कैरिज परमिट और ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट दोनों अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। इनके तहत वाहनों के संचालन के नियम भी अलग होते हैं।
आरोप उठ रहे हैं कि कुछ जगहों पर टूरिस्ट परमिट वाली बसों का इस्तेमाल नियमित यात्री परिवहन के लिए किया जा रहा है। क्योंकि टूरिस्ट परमिट लेकर वाहन चलाना और नियमित रूप से यात्रियों को एक तय रूट पर बस सेवा की तरह ढोना एक जैसी बात नहीं है।
टिकट बुकिंग करने वाले एजेंटों के लिए भी लाइसेंस अनिवार्य
मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 93 के तहत बस टिकट एजेंटों के लिए लाइसेंस अनिवार्य है। बिना वैध लाइसेंस एजेंट बस टिकट बुकिंग और यात्रियों को ग्राहक नहीं बना सकते। राज्य सरकार लाइसेंस की अवधि, फीस, सिक्योरिटी राशि और जारी करने की शर्तें तय कर सकती है।
बस टिकट एजेंटों से अधिकतम पांच हजार रुपये तक सिक्योरिटी राशि ली जा सकती है। नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित प्राधिकारी एजेंट का लाइसेंस निलंबित या रद्द कर सकता है। धारा 93(3) के तहत विज्ञापन में लाइसेंस नंबर और समाप्ति तारीख बताना अनिवार्य है।
विज्ञापन में लाइसेंस जारी करने वाले प्राधिकारी का विवरण देना भी जरूरी है। निजी बसों की ऑनलाइन बुकिंग में एजेंटों के लाइसेंस और नियमों के पालन की जांच जरूरी है।
आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है असर
बस का किराया बढ़ने या अलग-अलग कीमतों पर टिकट मिलने का सीधा असर आम यात्रियों पर पड़ता है। खासकर उन लोगों पर जो हर महीने कई बार बस से सफर करते हैं। यात्रियों को यह जानने का पूरा हक है कि जिस बस में वे सफर कर रहे हैं, वह नियमों के मुताबिक चल रही है या नहीं। साथ ही किराये में पारदर्शिता भी जरूरी है।
अब बड़ा सवाल यह है कि मध्य प्रदेश में निजी बसों के किराये और परमिट की व्यवस्था पर परिवहन विभाग कितनी सख्ती से निगरानी कर रहा है?
FAQ:
- मध्य प्रदेश में निजी बसों का किराया कैसे निर्धारित होता है?
मध्य प्रदेश में निजी बसों का किराया विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है जैसे कि बस की श्रेणी (एसी या नॉन एसी), स्लीपर सीट, यात्रा का समय और सीटों की मांग। 5 अगस्त 2026 को सरकार द्वारा नई दरें निर्धारित की गई थीं, जिसके अनुसार सामान्य बस का अधिकतम किराया 1.25 रुपये प्रति यात्री प्रति किलोमीटर से बढ़ाकर 2 रुपये किया गया। - ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट और स्टेज कैरिज परमिट में क्या अंतर है?
ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट पर्यटकों को पूरे देश में यात्रा कराने के लिए दिया जाता है, जबकि स्टेज कैरिज परमिट नियमित रूट पर यात्रियों को अलग-अलग किराये पर यात्रा कराने के लिए होता है। दोनों परमिट के संचालन के नियम और उद्देश्य अलग-अलग हैं। - क्या बिना लाइसेंस के ट्रैवल एजेंट बस टिकट बेच सकते हैं?
नहीं, बिना वैध लाइसेंस के ट्रैवल एजेंट बस टिकट नहीं बेच सकते। मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 93 के तहत एजेंटों को लाइसेंस लेना अनिवार्य है, और नियमों का उल्लंघन करने पर उनके लाइसेंस को निलंबित या रद्द किया जा सकता है।