प्रमोशन में आरक्षण: 90 दिन की सीमा पार, अब फैसले की आस में लाखों कर्मचारी; चीफ जस्टिस की बेंच पर टिकी निगाहें

Neel Tiwari | May 25, 2026, 22:26 IST
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मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण मामले में 17 फरवरी को सुनवाई पूरी हुई थी। सुप्रीम कोर्ट की 90 दिन की समयसीमा 18 मई को खत्म हो चुकी है लेकिन फैसला नहीं आया। जस्टिस विनय सराफ इंदौर ट्रांसफर हो चुके हैं। मेंशन भी संभव नहीं, लाखों कर्मचारी इंतजार में हैं।

News in Short

  • 17 फरवरी 2026 को प्रमोशन में आरक्षण मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया था।
  • सुप्रीम Court ने “हर्ड एंड रिजर्व” मामलों में 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाने का निर्देश दिया था।
  • इस मामले में 18 मई 2026 को 90 दिन की अवधि पूरी हो चुकी है।
  • डिविजनल बेंच के सदस्य जस्टिस विनय सराफ का ट्रांसफर इंदौर खंडपीठ में हो चुका है।
  • अधिवक्ताओं के अनुसार रिजर्व फैसले को लेकर अब “मेंशन” करना नियम अनुसार संभव नहीं है।

News in detail

फिर चर्चा में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

प्रमोशन में आरक्षण मामले में लंबे समय से फैसला लंबित रहने के बाद अब कानूनी और प्रशासनिक गलियारों में सुप्रीम कोर्ट का वह निर्देश फिर चर्चा का विषय बन गया है, जिसमें “हर्ड एंड रिजर्व” मामलों में 90 दिनों के भीतर निर्णय सुनाने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया था कि यदि किसी मामले में तय समयसीमा के भीतर फैसला नहीं आता है, तो ऐसे मामलों की जानकारी संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तक पहुंचाई जाएगी और इसकी जिम्मेदारी रजिस्ट्रार जनरल की होगी।



अब क्योंकि इस बहुचर्चित मामले में 90 दिनों से अधिक का समय बीत चुका है, इसलिए कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इस संवेदनशील मामले में फैसला कब सामने आएगा। खास बात यह है कि यह केवल एक कानूनी विवाद नहीं बल्कि लाखों कर्मचारियों के भविष्य और प्रमोशन से जुड़ा हुआ विषय बन चुका है।



17 फरवरी को सुनवाई पूरी, तभी से सुरक्षित है फैसला

मध्य प्रदेश के प्रमोशन में आरक्षण मामले की सुनवाई 17 फरवरी 2026 को पूरी हुई थी। इसके बाद चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।



यह मामला लंबे समय से प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक और प्रशासनिक सुनवाइयों में शामिल रहा है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव सरकारी विभागों में पदोन्नति प्रक्रिया पर पड़ रहा है। सुनवाई पूरी होने के बाद कर्मचारियों को उम्मीद थी कि जल्द ही फैसला सामने आएगा और वर्षों से अटकी प्रमोशन प्रक्रिया में स्पष्टता आ जाएगी। लेकिन समय बीतने के साथ अब इंतजार और लंबा होता जा रहा है, जिससे कर्मचारियों के बीच बेचैनी भी बढ़ती दिखाई दे रही है।



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18 मई को पूरी हो चुकी 90 दिन की सीमा, फिर भी जारी है इंतजार

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि 17 फरवरी 2026 से गणना की जाए तो इस मामले में 18 मई 2026 को 90 दिनों की समयसीमा पूरी हो चुकी है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि 90 दिन की यह सीमा “अधिकतम समय” के रूप में देखी जाती है। इसका उद्देश्य अदालतों को समयबद्ध तरीके से फैसले सुनाने के लिए प्रेरित करना है, न कि यह तय करना कि फैसला सिर्फ अंतिम दिन ही सुनाया जाए।



इसी वजह से कर्मचारियों के बीच अब यह उम्मीद लगातार व्यक्त की जा रही है कि मामले की गंभीरता और इसके व्यापक प्रभाव को देखते हुए अदालत जल्द निर्णय सुना सकती है। कर्मचारियों का कहना है कि वे न्यायिक प्रक्रिया का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन लंबे समय से प्रमोशन रुके होने के कारण अनिश्चितता लगातार बढ़ती जा रही है।



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जस्टिस विनय सराफ के ट्रांसफर के बाद बढ़ी चर्चाएं

इस पूरे घटनाक्रम के बीच डिविजनल बेंच के सदस्य जस्टिस विनय सराफ का ट्रांसफर हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठहो चुका है। इसके बाद कर्मचारियों और कानूनी हलकों में यह सवाल भी उठने लगा कि क्या इस ट्रांसफर का फैसले पर कोई प्रभाव पड़ेगा।


हालांकि कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनी जानकारों का कहना है कि इससे फैसले की वैधानिक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनका कहना है कि जिस बेंच ने सुनवाई पूरी की है, वही बेंच निर्णय देने के लिए सक्षम रहती है, भले ही किसी जज का स्थानांतरण बाद में हो गया हो।


फिर भी क्योंकि मामला पहले से ही काफी चर्चित और संवेदनशील है, इसलिए हर छोटी कानूनी और प्रशासनिक स्थिति पर कर्मचारियों की नजर बनी हुई है।



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“मेंशन” का रास्ता भी बंद, अधिवक्ताओं ने बताई स्थिति

इस मामले में अधिवक्ता अमोल श्रीवास्तव से बातचीत में यह बात सामने आई कि चूंकि अदालत इस मामले में आदेश सुरक्षित रख चुकी है, इसलिए नियमों के अनुसार अब इस मामले को लेकर “मेंशन” नहीं किया जा सकता।


आमतौर पर कई मामलों में जल्द सुनवाई या सूचीबद्ध कराने के लिए अधिवक्ता अदालत के समक्ष मेंशन करते हैं, लेकिन रिजर्व फैसलों में यह प्रक्रिया लागू नहीं मानी जाती।


इस स्थिति ने कर्मचारियों की चिंता और बढ़ा दी है, क्योंकि अब फैसले की तारीख को लेकर कोई स्पष्ट प्रक्रिया दिखाई नहीं दे रही। ऐसे में कर्मचारियों और संबंधित पक्षों की उम्मीदें पूरी तरह उसी डिविजनल बेंच पर टिकी हैं जिसने इस मामले की सुनवाई पूरी की थी।



प्रमोशन अटके, कर्मचारियों में बढ़ रही बेचैनी

प्रमोशन में आरक्षण का यह मामला केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर प्रदेश के लाखों शासकीय कर्मचारियों के करियर पर पड़ रहा है। सामान्य वर्ग और आरक्षित वर्ग, दोनों ही पक्षों के कर्मचारी लंबे समय से इस फैसले का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि पदोन्नति प्रक्रिया इस निर्णय से प्रभावित मानी जा रही है। कई विभागों में वरिष्ठता, पदस्थापना और प्रशासनिक निर्णय भी इस मामले के अंतिम परिणाम से जुड़े हुए बताए जा रहे हैं। ऐसे में हर गुजरते दिन के साथ कर्मचारियों की उत्सुकता और उम्मीद दोनों बढ़ती जा रही हैं।



अब सबकी निगाहें चीफ जस्टिस की बेंच पर

90 दिनों की समयसीमा पूरी होने के बाद अब प्रदेशभर में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की हो रही है कि फैसला आखिर कब आएगा।


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब इस मामले में निर्णय सुनाने का समय पूरी तरह उस बेंच के विवेक पर निर्भर करता है जिसने सुनवाई पूरी की थी।



फिलहाल प्रदेश के लाखों कर्मचारी इस उम्मीद के साथ इंतजार कर रहे हैं कि इस लंबे समय से लंबित और बेहद संवेदनशील मामले में जल्द फैसला सामने आएगा, ताकि वर्षों से बनी अनिश्चितता खत्म हो सके और प्रमोशन प्रक्रिया को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने आ पाए।



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