MPPSC-ESB के रिजल्ट में ही लिखी थी यह शर्त, हाईकोर्ट फैसले के बाद भी नतीजे क्यों रुके?
सुलझने की जगह और उलझ गई स्थिति
बता दें कि एमपी में ओबीसी आरक्षण केस (OBC reservation case) पर फैसला 9 अक्टूबर को आया था। इसके बाद से स्थितियां सुलझने की जगह और उलझ गई हैं। सरकार फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई है। उधर अनारक्षित वर्ग की ओर से भी कैविएट लग गई है ताकि सरकार को सीधे स्टे न मिले।
वहीं फैसले के बाद अब उम्मीदवार बड़ा सवाल उठाने लगे हैं। वह यह है कि आयोग और ईएसबी दोनों के ही हर रिजल्ट को ओबीसी आरक्षण केस की मूल याचिका 5901/2019 के तहत मान्य किया गया है। फिर सवाल यही है कि जब याचिका का निराकरण हो गया तो फिर रिजल्ट में देरी क्यों?
आयोग ने रिजल्ट में क्या लिखा है
आयोग ने अपने घोषित हर रिजल्ट में लिखा है कि- यह रिजल्ट सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी/2023, एसएलपी 12398/23 और हाईकोर्ट में लंबित याचिका 5901/2019 व 5596/2024 व अन्य समान याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने ही हाईकोर्ट को किया था अधिकृत
यह सभी वही याचिकाएं हैं जो ओबीसी आरक्षण केस से जुड़ी हुई हैं। खुद हाईकोर्ट के 09 अक्टूबर को जारी 159 पेज के आदेश में इस पूरे केस की यात्रा का लेखा-जोखा है। इसमें लिखा है कि विविध कोर्ट से होते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। फिर वहां से हाईकोर्ट को इसमें अधिकृत किया गया।
हाईकोर्ट में 15 जून को स्पेशल बेंच बनी। इनके द्वारा 15 दिन तक लगातार 30 घंटे की सुनवाई हुई और अब यह फैसला दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि सुनवाई 5 अगस्त को पूरी हुई और फिर फैसला 9 अक्टूबर को जारी हुआ।
होना क्या चाहिए
हाईकोर्ट से केस सुप्रीम कोर्ट में गया और फिर वहां से हाईकोर्ट को ही अधिकृत किया गया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि आरक्षण की स्थिति स्थानीय आबादी और वहां के हालात पर निर्भर करती है। ऐसे में हाईकोर्ट बेहतर तरीके से तय कर सकता है कि आरक्षण किस तरह लागू होना चाहिए। अब जब इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया है, तो उम्मीदवारों की मांग है कि इसे लागू किया जाए।
लागू क्या-क्या होना है
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ये अहम बातें कहीं हैं...
1. ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी रहेगा और 27 फीसदी करने का साल 2019 का एक्ट गैर-संवैधानिक है।
2. पीएससी, ईएसबी या कोई भी चयन एजेंसी इसी आधार पर आगे प्रक्रिया करेगी और रिजल्ट जारी करेगी
3. 3- 8 मार्च 2019 और 29 सितंबर 2022 के बीच में यदि अतिरिक्त ओबीसी आरक्षण के आधार पर नियुक्ति हुई है तो वह मान्य रहेगी। इसे आगे तीन साल की नियुक्ति में समायोजन किया जाएगा।
4. होल्ड किए गए 13 फीसदी पद अनारक्षित कैटेगरी से तीन माह के भीतर भरे जाएंगे
यही मांग उम्मीदवार कर रहे हैं
अब इसे लागू करने की मांग उठ रही है। हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवार इसे लागू करने की मांग कर रहे हैं, जबकि ओबीसी वर्ग के उम्मीदवार 27 फीसदी आरक्षण को अपना हक बताते हुए इसके लिए लड़ाई लड़ने की बात कह रहे हैं।
इन सबके बीच रिजल्ट अटक गए हैं। इसकी वजह यह है कि फैसले में साफ लिखा है कि चयन एजेंसियों को 14 फीसदी ओबीसी आरक्षण के आधार पर रिजल्ट जारी करना होगा। यानी अब 87-13 फीसदी का फॉर्मूला लागू नहीं होगा।
ऐसे में अगर चयन एजेंसियां इसी पुराने फॉर्मूले के आधार पर रिजल्ट जारी करती हैं, तो इसे अदालत के आदेश की अवमानना माना जा सकता है।
ओबीसी वोट बैंक राजनीति पड़ रही भारी
मध्यप्रदेश में ओबीसी वर्ग की आबादी 52 फीसदी बताई जाती है। ऐसे में सरकार वोट बैंक की राजनीति के चलते इस फैसले को मानने को तैयार नहीं है। इसके चलते सरकार ने भी खुलकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी के पक्ष में ही अपनी लड़ाई रखी, लेकिन इसके बाद भी हार गई।
उधर लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज आयोजन के बाद वैसे ही 27 फीसदी पर ओबीसी का हक बताकर इस राजनीति को और तेज कर दिया। इसके बाद सरकार के आगे इसमें सुप्रीम कोर्ट तक लड़ने के सिवा कोई चारा नहीं बचा है।
पीएससी, ईएसबी को आदेश का इंतजार
पीएससी और ईएसबी दोनों ही एजेंसियां सरकार के आदेश के इंतजार में अटकी हैं। सरकार ने ही 29 सितंबर 2022 को 87-13 फीसदी का फार्मूला जारी कर रिजल्ट की प्रक्रिया तय की थी। ऐसे में सरकार ही आगे बताएगी कि रिजल्ट किस आधार पर जारी करना है। ऐसे में इन चयन एजेंसियों की पूरी प्रक्रिया ठप हो गई है।