एमपी में ट्रेनों से कछुओं की तस्करी, पुलिस ने 6 साल में 654 संरक्षित जानवर पकड़े

Pawan Modiya | Jun 29, 2026, 18:53 IST
एमपी रेलवे कछुआ तस्करी
मध्य प्रदेश पुलिस रेलवे लाइनों से हो रही कछुआ तस्करी पर पहली बड़ी कार्रवाई की तैयारी में है। छह साल में 654 संरक्षित जानवर ट्रेनों से पकड़े गए हैं। ये कछुए उत्तर भारत से साउथ-ईस्ट एशिया तक तस्करी होते हैं। पुलिस ने चार बड़े नेटवर्क की पहचान की है।

    समझें क्या है पूरा मामला

    • मध्य प्रदेश की रेलवे लाइनों से संरक्षित कछुओं की तस्करी हो रही है।
    • पुलिस ने छह साल का डेटा एनालिसिस किया है।
    • 654 जानवर ट्रेनों से जब्त किए गए हैं।
    • इनमें से ज्यादातर कछुए, बाकी गिद्ध हैं।
    • अब पुलिस पहली बड़ी कोऑर्डिनेटेड कार्रवाई की तैयारी कर रही है।

    मध्य प्रदेश पुलिस अब रेलवे के जरिए हो रही वाइल्डलाइफ तस्करी पर बड़ी कार्रवाई करने जा रही है। यह फैसला छह साल के सीजर डेटा की गहरी पड़ताल के बाद लिया गया है। इस पड़ताल में चार बड़े इंटरस्टेट नेटवर्क की पहचान हुई है।



    ये नेटवर्क उत्तर भारत की नदियों से संरक्षित कछुए उठाते हैं। फिर इन्हें ट्रेनों के जरिए साउथ-ईस्ट एशिया और मिडल ईस्ट के बाजारों तक भेजा जाता है।



    राज्य टाइगर स्ट्राइक फोर्स (STSF) और गवर्नमेंट रेलवे पुलिस ने 2020 से 2026 के बीच यात्री ट्रेनों से 654 संरक्षित जानवर बरामद किए हैं। इनमें 647 कछुए और सात गिद्ध शामिल हैं।



    तस्करी का रूट कैसे काम करता है

    इन कछुओं का सफर मध्य प्रदेश से बहुत दूर शुरू होता है। इंडियन सॉफ्टशेल कछुआ और इंडियन फ्लैपशेल कछुआ, दोनों वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के शेड्यूल वन में आते हैं। यह वही कैटेगरी है, जिसमें बाघ और हाथी भी आते हैं।



    ये कछुए गंगा बेसिन की नदियों में पाए जाते हैं। STSF अधिकारियों के मुताबिक शिकारी और मछुआरे इन्हें उत्तर प्रदेश में गंगा और इसकी सहायक नदियों से पकड़ते हैं। फिर इन्हें कलेक्टरों को बेचा जाता है। कलेक्टर तब तक जानवर इकट्ठा करते हैं जब तक बड़ा कंसाइनमेंट तैयार न हो जाए। मध्य प्रदेश में ये कछुए तब सामने आते हैं जब रैंडम चेकिंग के दौरान पकड़े जाते हैं।



    एक वरिष्ठ वाइल्डलाइफ अधिकारी ने बताया कि तस्करी के मामलों में सबसे ज्यादा फ्रेशवाटर कछुए ही मिलते हैं। ये जानवर उत्तर और पूर्वी भारत के नदी सिस्टम से उठाए जाते हैं और रेलवे नेटवर्क से आगे भेजे जाते हैं। उनके मुताबिक मध्य प्रदेश सिर्फ एक ट्रांजिट कॉरिडोर है, जहां से माल पश्चिम भारत की तरफ बढ़ता है।



    अलग-अलग प्रजाति, अलग बाजार

    हर प्रजाति का बाजार अलग है। जांच से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि इंडियन रूफ्ड टर्टल और स्टार टॉरटॉइज मुख्य रूप से पालतू जानवरों के अवैध कारोबार के लिए मांगे जाते हैं। इंदौर, देवास और उज्जैन से जुड़े नेटवर्क मिले हैं, जहां से माल गुजरात तक जाता है।



    सॉफ्टशेल और फ्लैपशेल कछुओं का रूट अलग है। इनकी मांग पूर्वी भारत में, खासकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल में रहती है। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ कछुए बांग्लादेश तक जाते हैं, जहां इन्हें पारंपरिक औषधीय इस्तेमाल के लिए माना जाता है।



    सबसे दुर्लभ प्रजातियों पर सबसे ज्यादा खतरा है। एक वरिष्ठ वन अधिकारी के मुताबिक बटागुर कछुआ गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजाति है। यह सिर्फ चंबल नदी जैसे कुछ सीमित इलाकों में बचा है। इसे साउथ-ईस्ट एशिया के एग्जॉटिक पेट मार्केट में तस्करी किया जाता है।



    रेलवे से तस्करी


    बढ़ता आकार, बढ़ता खतरा

    जब्ती के आंकड़े बताते हैं कि तस्करी का स्तर लगातार बढ़ रहा है। मार्च 2020 में सागर स्टेशन पर एक व्यक्ति को खाद की बोरी में सात कछुए लेकर पकड़ा गया था। सितंबर 2023 में इटारसी में लखनऊ-यशवंतपुर एक्सप्रेस से चार लोगों को 282 कछुओं के साथ पकड़ा गया।



    फरवरी 2026 में भोपाल के पास संत हिरदाराम नगर स्टेशन पर पटना-इंदौर एक्सप्रेस से आठ लोगों को 311 कछुओं के साथ पकड़ा गया। यह राज्य के रेलवे नेटवर्क पर अब तक की सबसे बड़ी वाइल्डलाइफ जब्ती है।



    एक वरिष्ठ वाइल्डलाइफ अधिकारी ने बताया कि इन जानवरों की पहचान तेज बदबू की वजह से हुई। उनके मुताबिक अब छोटे-छोटे बैच में तस्करी हो रही है, जो ज्यादातर पकड़ में नहीं आती।



    कानूनी प्रक्रिया में देरी

    2020 के सागर केस से एक और समस्या सामने आती है। मई 2020 में चार्जशीट दाखिल हुई थी, लेकिन केस अब भी मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेंडिंग है। 11 गवाहों में से 6 की गवाही अभी बाकी है। अगली सुनवाई 11 अगस्त 2026 को तय है।



    मध्य प्रदेश की भौगोलिक स्थिति इसे अहम ट्रांजिट कॉरिडोर बनाती है। रिकॉर्ड के मुताबिक तीन मुख्य रूट हैं, पटना-लखनऊ-इंदौर, कानपुर-भोपाल-मुंबई और लखनऊ-इटारसी-बेंगलुरु। उत्तर प्रदेश से मुंबई, इंदौर या बेंगलुरु जाने वाला कोई भी कंसाइनमेंट मध्य प्रदेश से होकर गुजरता है। आठ स्टेशन सबसे संवेदनशील माने गए हैं, संत हिरदाराम नगर, भोपाल, इटारसी, जबलपुर, खंडवा, कटनी, इंदौर और उज्जैन।



    अधिकारियों ने कहा कि तस्कर जानबूझकर पैसेंजर ट्रेनों को चुनते हैं। एक वाइल्डलाइफ एनफोर्समेंट अधिकारी के मुताबिक रेलवे नेटवर्क तस्करों को आम यात्रियों की तरह घुलमिल कर लंबी दूरी तक जिंदा जानवर ले जाने का मौका देता है। कई मामलों में जानवर लगेज या बोरियों में, यहां तक कि एसी कोच में भी मिले हैं। अब तक गिरफ्तार 24 लोगों में से 15 विक्रेता, सात यात्री और दो कोच अटेंडेंट की कैटेगरी में आते हैं।



    गिद्धों की तस्करी भी रेलवे से

    इसी रेलवे नेटवर्क से पक्षियों की तस्करी भी हुई है। 19 जनवरी 2022 को खंडवा स्टेशन पर सुल्तानपुर-लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस से सात मिस्री गिद्ध पकड़े गए थे। इस मामले में पांच लोग गिरफ्तार हुए। मिस्री गिद्ध संकटग्रस्त प्रजाति है और वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के शेड्यूल वन में सुरक्षित है।



    एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने बताया कि गिद्धों का कारोबार अलग नेटवर्क से चलता है। उनके मुताबिक यह कम मात्रा वाला लेकिन ज्यादा कीमत वाला सौदा है। कुछ पक्षी महाराष्ट्र और हैदराबाद की तरफ भेजे जाते हैं, जबकि कुछ इंटरनेशनल मार्केट के लिए भी जा सकते हैं।



    आगे की रणनीति क्या होगी

    ADG (Railways) यानी एडिशनल डायरेक्टर जनरल रेलवे राजा बाबू सिंह ने बताया कि सभी एजेंसियों के साथ मिलकर ट्रेनों और रूट की जांच बढ़ाई जा रही है। उनके मुताबिक यह डेटा बहुत गंभीर है और इस पर ठोस रणनीति बनाई जा रही है।



    एडिशनल प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (वाइल्डलाइफ) एल कृष्णमूर्ति ने बताया कि मध्य प्रदेश में पकड़े गए कछुए मुख्य रूप से एग्जॉटिक पेट के तौर पर तस्करी किए जाते हैं।



    रिकॉर्ड बताते हैं कि नेटवर्क पर 10 स्टेशनों पर बैगेज स्कैनर लगे हैं। फिर भी अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर काफी नहीं है। एक अधिकारी के मुताबिक स्निफर डॉग स्क्वॉड, ज्यादा बैगेज स्कैनर, मजबूत सीसीटीवी और फेशियल रिकग्निशन जैसे टूल जरूरी हैं। उनके मुताबिक डेटा शेयरिंग के जरिए रिपीट अपराधियों की पहचान करना रैंडम चेकिंग से ज्यादा असरदार होगा।



    चंबल इलाके के साथ उन्नाव, इटावा और कानपुर जैसे स्टेशनों पर भी निगरानी बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। छह साल के इस एनालिसिस ने पहली बार पुलिस को बार-बार दिखने वाले रूट, संवेदनशील स्टेशन और बार-बार पकड़े जाने वाले अपराधियों की पहचान करने में मदद दी है। इसी आधार पर अब कोऑर्डिनेटेड कार्रवाई की योजना बनाई जा रही है।



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