एमपी में गुरुवार से शनिवार रजिस्ट्री का आदेश, अब पटवारियों की पुरानी फाइलें क्यों खुलीं?
मध्य प्रदेश में गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री के लिए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने ये तीन दिन तय किए हैं। पंचायत स्तर पर शिविर और रोज 30 से 40 रजिस्ट्री का लक्ष्य भी बताया गया है। लेकिन पटवारियों की आपत्तियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। इसी गतिरोध के बीच अब जिलों से पटवारियों के पुराने प्रकरण, शिकायतें और जांच का ब्योरा मांगे जाने की खबर ने नया सवाल खड़ा कर दिया है। रजिस्ट्री का प्रशासनिक विवाद अब पुरानी फाइलों तक क्यों पहुंच रहा है?
तीन दिन का लक्ष्य, लेकिन मैदान में गतिरोध
स्वामित्व योजना (MP Swamitva Yojana ) के तहत ग्रामीण आबादी की संपत्तियों की नि:शुल्क रजिस्ट्री के लिए सरकार ने अभियान चलाया है। मुख्य सचिव ने पंचायत स्तर पर सरपंच, सचिव, पटवारी और रोजगार सहायक को मिलकर हर गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार शिविर लगाने तथा प्रतिदिन 30 से 40 रजिस्ट्री का लक्ष्य रखने को कहा था।
यहीं से प्रशासनिक लक्ष्य और कर्मचारियों की आपत्तियों के बीच टकराव सामने आया। पटवारियों ने योजना के तहत रजिस्ट्री दस्तावेज में उनकी भूमिका और उससे पैदा होने वाली कानूनी जवाबदेही पर सवाल उठाए। कुछ स्थानों पर संघ ने ज्ञापन देकर कहा कि आपत्ति ग्रामीणों को स्वामित्व अधिकार देने पर नहीं, बल्कि पटवारी को दस्तावेज का निष्पादक बनाए जाने पर है।
बातचीत हुई, समाधान फिर भी अधूरा
सरकार ने विवाद सुलझाने के प्रयास भी किए। रिपोर्टों के अनुसार पटवारियों को यह भरोसा देने की कोशिश हुई कि विवादित प्रकरणों में उनकी जिम्मेदारी सीमित रखी जाएगी और व्यवस्था में बदलाव किए जाएंगे। इसके बावजूद 24 सितंबर तक सरकार और पटवारी प्रतिनिधियों की बातचीत में पूर्ण सहमति नहीं बनने की खबर थी। इसके बाद मुख्य सचिव की ओर से कलेक्टरों को तय दिनों में रजिस्ट्री कराने और निर्देश नहीं मानने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश सामने आए।
पुराने मामलों की सूची क्यों?
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण नया घटनाक्रम पुराने मामलों का ब्योरा मांगा जाना है। 30 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक राजस्व विभाग ने जिलों से पटवारियों के खिलाफ लंबित शिकायतों और प्रकरणों की जानकारी मांगी है। इसमें भ्रष्टाचार संबंधी मामले, लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की जांच, आय से अधिक संपत्ति से जुड़ी शिकायतें तथा अभियोजन स्वीकृति के लंबित मामलों की जानकारी भी शामिल बताई गई है।
यहां कानूनी तौर पर एक फर्क महत्वपूर्ण है। शिकायत, जांच या लंबित प्रकरण अपने आप किसी कर्मचारी का दोष सिद्ध नहीं करते। अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच, विभागीय प्रक्रिया या न्यायिक निर्णय के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
क्या पुराने केस और मौजूदा विवाद आपस में जुड़े हैं?
यही इस कहानी का सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल है। पुराने मामलों की जानकारी उसी समय जुटाई जा रही है जब रजिस्ट्री के काम पर सरकार और पटवारी संघ आमने-सामने हैं। इस समयक्रम के कारण यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह सामान्य प्रशासनिक समीक्षा है या आदेश लागू कराने की व्यापक कार्रवाई का हिस्सा। लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे सीधे बदले की कार्रवाई या दबाव बनाने की रणनीति कहना उचित नहीं होगा। इसके लिए विभाग का स्पष्ट आदेश, उद्देश्य और कार्रवाई का आधार सामने आना जरूरी है।
योजना का उद्देश्य ग्रामीण हितग्राहियों को संपत्ति का अधिकार देना है। हालांकि इसके अमल में जिम्मेदारी और कानूनी जवाबदेही स्पष्ट नहीं हो पाई है। किसी कर्मचारी पर भ्रष्टाचार या गंभीर मामलों की कार्रवाई लंबित है तो उसका समयबद्ध निपटारा जरूरी है। केवल नए विवाद के समय पुराने मामलों को उठाने से निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। अब जिलों से मिली जानकारी के आधार पर सरकार की कार्रवाई पर नजर रहेगी। यह देखना होगा कि कार्रवाई नियमों के अनुसार होती है या नहीं। इससे तय होगा कि विवाद समाधान की दिशा में जाता है या टकराव बढ़ता है।