नक्शों में कैद सच, जमीन पर उलझी हकीकत; 70 साल से राजस्व और वन भूमि पर विवाद, हे सरकार! कब होगा समाधान?

Ravi Kant Dixit | Apr 12, 2026, 16:36 IST
mp revenue forest land orange area dispute task force report
मध्य प्रदेश में राजस्व और वन विभाग के बीच ऑरेंज एरिया (Orange Area) को लेकर 70 साल पुराना विवाद गहरा गया है। मुख्य सचिव की बैठक में उठा यह मुद्दा लाखों किसानों की जमीन और हक से जुड़ा है। द सूत्र पर पढ़िए यह खास रिपोर्ट...

BHOPAL. मध्यप्रदेश में जमीन का एक ऐसा विवाद है, जो फाइलों में जितना आसान दिखता है, जमीन पर उतना ही उलझा हुआ है। यह सरकारी रिकॉर्ड का मामला भर नहीं है, यह तो लाखों लोगों की जिंदगी, उनके घर, खेती और भविष्य से जुड़ा हुआ संकट है। राजस्व और वन विभाग के बीच जमीन की पहचान को लेकर जो पेंच सात दशक पहले फंसा था, वह आज भी नहीं सुलझ पाया है।



हाल ही में मुख्य सचिव अनुराग जैन की बैठक में यह मुद्दा फिर जोर से उठा। बैठक में वरिष्ठ अधिकारियों की बातों से साफ हो गया कि समस्या सिस्टम की गहराई तक फैली हुई है। एसीएस जीएडी संजय शुक्ला ने कहा कि राज्य में 52 हजार गांव हैं, लेकिन कहीं भी यह स्पष्ट नहीं है कि कौन सी जमीन वन विभाग की है और कौन सी राजस्व की। इस पर मुख्य सचिव ने डिजिटल समाधान की बात कही, लेकिन पंचायत विभाग की एसीएस दीपाली रस्तोगी ने जो कहा, उसने पूरे सिस्टम की सच्चाई सामने रख दी।



उन्होंने साफ कहा कि ग्राउंड रियलिटी बिल्कुल अलग है। आम आदमी के लिए रिकॉर्ड तक पहुंचना बेहद मुश्किल है। किसी भी गांव में जाएं, 6 से 8 मीटर तक का अंतर हर जगह है। यही वह बिंदु है, जहां से यह समझ आता है कि यह विवाद कागजों का नहीं, जमीन की वास्तविकता और प्रशासनिक विफलता का मिला-जुला परिणाम है। सवाल यही है कि जब सरकार, अधिकारी और तकनीक सभी हैं, तो आखिर यह विवाद सुलझ क्यों नहीं पा रहा?



पढ़िए द सूत्र की यह खास रिपोर्ट...

ऑरेंज एरिया विवाद को लेकर वन और राजस्व विभाग की पुरानी लड़ाई है। यह वर्ष 1950 से कानूनी उलझन का सबब बना हुआ है। इस जमीन पर वन और राजस्व विभाग आपस में लड़ रहे हैं। इसके कारण लाखों गरीब परिवारों के पास पक्के कागज नहीं हैं। दरअसल, 2019 में कमलनाथ सरकार के समय इस विवाद को सुलझाने के लिए टास्क फोर्स बनी थी।



तत्कालीन एसीएस फॉरेस्ट एपी श्रीवास्तव की अगुआई वाली इस टास्क फोर्स ने विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी। तब इसमें आईएएस दीपाली रस्तोगी भी थीं। तब उनके जिम्मे जनजातीय कल्याण विभाग था। वे पीएस थीं। लिहाजा, अब हाल ही में जब राजस्व और वन भूमि का मुद्दा उठा तो उनका दर्द छलक उठा।



2019 की टास्क फोर्स कमेटी की रिपोर्ट की बड़ी बातें

श्रीवास्तव टास्क फोर्स ने कानूनी मुद्दों की पहचान की है। ये बताते हैं कि पुरानी गलतियां आज कैसे चुभ रही हैं।



1. पट्टों का अधूरा सच

सरकार ने 1965 और 1975 में किसानों को पट्टे दिए थे। यह उम्मीद थी कि जमीन जल्द राजस्व विभाग की होगी, लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी न होने से मामला अटक गया। टास्क फोर्स ने इन पट्टों को अब वैध माना है। आज भी किसान खुद को अपनी जमीन पर असुरक्षित पाता है। उसे डर रहता है कि उसे बेदखल कर दिया जाएगा। एक पुरानी सरकारी गलती का फल वह आज भुगत रहा है। उसे हक देना अब सरकार की नैतिक जिम्मेदारी बन गई है।



2. आरक्षित वन की अधूरी प्रक्रिया

कई जगहों पर आरक्षित वन बनाने का काम अधूरा है। धारा 4 के तहत केवल सूचना ही जारी हो पाई है। अंतिम फैसला न होने से कानूनी स्थिति साफ नहीं है। इससे जंगल के प्रबंधन में भी काफी दिक्कत आती है। इसका असर सीधे तौर पर वनवासियों के अधिकारों पर पड़ता है। उन्हें नहीं पता कि वे कहां लकड़ी काट सकते हैं। अधिकारियों और जनता के बीच रोज झगड़े होते हैं। इस अधूरी प्रक्रिया को अब पूरा करना बहुत जरूरी है।



3. रिकॉर्ड में मेल न होना

वन और राजस्व विभाग के आंकड़े मेल नहीं खाते हैं। यह समस्या 1994 से अधिकारियों के सामने बनी हुई है। टास्क फोर्स ने पाया कि डेटा में बहुत कमी है। इसे सुधारने के लिए कई बार आदेश दिए गए हैं। इसका असर गांव के आम आदमी पर पड़ता है। किसान को नहीं पता कि उसकी जमीन किसकी है। वह दफ्तरों के चक्कर काटकर पूरी तरह थक जाता है। उसे अपनी ही जमीन पर हमेशा डर लगता रहता है।



4. गांवों की बदली हुई सीमाएं

1980 के बाद कई गांवों के नक्शे बदल दिए गए। नक्शों से जंगल के हिस्सों को पूरी तरह हटा दिया गया। इससे ग्राम सभाओं का प्राकृतिक संसाधनों पर हक छिन गया। निस्तार के अधिकार भी अब खतरे में पड़ गए हैं। ग्रामीण अब अपने ही जंगल से दूर हो गए हैं। वे लकड़ी या चारे के लिए परेशान होते हैं। बिना नक्शे के वे अपनी शक्ति का उपयोग नहीं कर पाते। पुरानी सीमाओं को बहाल करना अब बहुत जरूरी हो गया है।



5. रैयतवारी गांवों की उलझन

1958 का नियम केवल जमींदारी गांवों के लिए बना था, लेकिन इसे गलती से रैयतवारी गांवों पर भी लगाया गया। कानून की नजर में यह पूरी तरह से गलत कदम था। इसके कारण कई राजस्व जमीनें वन रिकॉर्ड में आ गईं। एक साधारण किसान को इस कानूनी फर्क का पता नहीं। वह बस यह जानता है कि उसकी जमीन फंस गई है। उसे अपनी पुश्तैनी जमीन के लिए कचहरी जाना पड़ता है। इस कानूनी गलती को सुधारना अब सरकार का फर्ज है।



6. गैर-वन भूमि का समावेश

सर्वे के दौरान बंजर और खाली जमीन भी जंगल दिखाई गई। ऐसी जमीनें जहां कभी पेड़ नहीं थे, वे भी फंस गईं। ये जमीनें वन विभाग के पास बिना मतलब पड़ी हैं। इन्हें वापस राजस्व विभाग को सौंपा जाना बहुत जरूरी है। जिस जमीन पर खेती हो सकती थी, वह खाली पड़ी है। किसान वहां हल चलाने से भी बहुत डरता है। उसे लगता है कि पुलिस उसे पकड़ ले जाएगी। बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का मौका हाथ से निकल रहा है।



7. क्षेत्रफल की गड़बड़ी

कागज पर दर्ज रकबा और जमीन पर मौजूद क्षेत्र अलग है। नापजोख में पुरानी गलतियों के कारण आज भी विवाद हैं। कागज कुछ कहता है और असलियत में कुछ और है। इसके लिए नए सिरे से वैज्ञानिक पैमाइश बहुत जरूरी है। जब किसान अपनी जमीन बेचने जाता है, तो समस्या आती है। पटवारी और रेंजर के बीच वह फुटबॉल बन जाता है। उसे अपनी ही जमीन की सही नाप नहीं मिलती। इस अंतर को मिटाना अब शांति के लिए जरूरी है।



8. 1976 के बाद के पट्टे

राजस्व अधिकारियों ने संरक्षित वनों पर कई पट्टे जारी किए। ऐसे पट्टा धारकों को अब वन अधिकार का लाभ चाहिए। उन्हें बिना वजह सजा देना न्याय के बिल्कुल खिलाफ होगा। टास्क फोर्स ने इस पर विचार करने को कहा है। कई पीढ़ियां इन जमीनों पर खेती कर बड़ी हुई हैं। उन्हें बेदखल करना एक मानवीय संकट खड़ा कर देगा। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना अब बहुत जरूरी है। उनके हक को कानूनी मान्यता देना ही एकमात्र रास्ता है।



9. निजी जमीन का फंसना

करीब 30 हजार हेक्टेयर निजी जमीन वन ब्लॉक्स में शामिल है। कानूनन निजी जमीन को सीधे जंगल घोषित नहीं कर सकते। ऐसी जमीनों पर मालिकों को उनके हक वापस मिलने चाहिए। यह मामला सालों से अदालतों में भी चल रहा है। जिसने जमीन खरीदी, उसे आज उपयोग का हक नहीं। उसके पास पक्के कागज हैं फिर भी वह लाचार है। सरकार को उसे या तो मुआवजा देना चाहिए या जमीन। किसी की निजी संपत्ति को ऐसे नहीं रखा जा सकता।



10. वर्किंग प्लान में निजी जमीन

वन विभाग ने अपनी कार्ययोजनाओं में निजी जमीनों को रखा। बिना किसी मुआवजे के ऐसा करना पूरी तरह असंवैधानिक है। इन जमीनों को सरकारी योजनाओं से बाहर करना बहुत जरूरी है। इससे निजी मालिकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। मालिक अपनी जमीन पर पेड़ भी नहीं काट सकता। उसे अपनी ही संपत्ति के लिए भीख मांगनी पड़ती है। विभाग को अपनी योजनाओं में सुधार करना ही होगा। इससे लोगों का सरकार पर भरोसा फिर से बढ़ेगा।



11. सीमाओं में अवैध बदलाव

कुछ अधिकारियों ने बिना अनुमति के जंगलों की सीमाएं बदलीं। यह काम बिना किसी कानूनी नोटिफिकेशन के किया गया था। यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन माना गया है। अब इन सीमाओं को फिर से कानूनी आधार चाहिए। एक मामूली कर्मचारी ने किसी का घर जंगल में डाल दिया। इसके कारण कई बस्तियां आज अवैध घोषित हो चुकी हैं। यह भ्रष्टाचार और लापरवाही का एक बड़ा नमूना है। इसे ठीक करना अब सरकार की बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।



12. 1996 का भ्रमित सर्कुलर

1996 में एक आदेश ने विवाद को और बढ़ा दिया था। इससे 32,557 हेक्टेयर राजस्व भूमि पर भ्रम पैदा हुआ। टास्क फोर्स ने इस आदेश की समीक्षा की सलाह दी है। इसके कारण विकास के कई जरूरी काम अटक गए हैं। गांवों में स्कूल और अस्पताल के लिए जमीन नहीं मिली। सड़क बनाने के लिए भी वन विभाग की अनुमति चाहिए। आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए सालों से तरस रही है। इस भ्रम को दूर करना अब विकास के लिए जरूरी है।



13. नक्शों के पैमाने में अंतर

राजस्व और वन विभाग के नक्शे अलग-अलग पैमाने पर हैं। राजस्व नक्शा 16 इंच और वन नक्शा 4 इंच का है। इससे जमीनों का सही मिलान करना बहुत मुश्किल है। अब सभी नक्शों को डिजिटल तकनीक से जोड़ना होगा। जब तक पैमाने एक नहीं होंगे, विवाद बना रहेगा। तकनीक की मदद से ही इस अंतर को मिटाया जाएगा। इससे आने वाली पीढ़ी को कोई नया विवाद नहीं मिलेगा। यह पारदर्शी प्रशासन की ओर एक बड़ा कदम होगा।



ऑरेंज रंग और जमीन का पेंच

साल 1963 में वन विभाग ने जमीनों को नापा। इस दौरान जमीनों को दो हिस्सों में बांटा गया। जो जमीन वन के काम की थी, उसे रखा गया। जो जमीन खेती के लायक थी, उसे छोड़ दिया गया। नक्शे पर छोड़ी गई जमीन को नारंगी रंग दिया गया। यही जमीनें आज ऑरेंज एरिया के नाम से जानी जाती हैं। इन्हें वापस राजस्व विभाग को सौंपा जाना था।



अनुमान है कि 15 हजार वर्ग मील जमीन ऐसी थी, लेकिन इसके लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। वन कानून में तब जमीन लौटाने का नियम नहीं था। इस बाधा को दूर करने के लिए संशोधन किया गया। नई धारा 34(ए) जोड़कर जमीन मुक्त करने का रास्ता खुला। साल 1969 से 1974 के बीच कुछ काम हुआ, लेकिन यह प्रक्रिया कभी भी पूरी नहीं हो सकी। 1980 के कानून ने इस पर रोक लगा दी।



अचानक क्यों उठा ये मामला

सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों, लोक सेवा गारंटी एक्ट, 2026-27 के लक्ष्य पर 8 अप्रैल को मंत्रालय में हो रही मुख्य सचिव डॉ. अनुराग जैन की बैठक में राजस्व और वन भूमि की बात उठी थी। जीएडी के एसीएस संजय शुक्ला ने कहा था कि मध्यप्रदेश में कोई भी ऐसा गांव नहीं है, जहां राजस्व और वन भूमि को लेकर विवाद न हो। इस पर स्वास्थ्य विभाग के एसीएस (पूर्व एसीएस वन विभाग) अशोक बर्णवाल ने कहा था कि वन विभाग में रहते उन्होंने खुद मैप बनाए। एक हजार गांव बता सकता हूं, जहां जमीन को लेकर कोई विवाद नहीं है।



पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की एसीएस दीपाली रस्तोगी ने भी इस मसले को आगे बढ़ाते हुए कहा था कि मैप कितने भी बन जाएं, इससे कुछ नहीं होता। मौके पर फर्क मिलता है। जब तक फेंसिंग नहीं होगी, सीमांकन के समय जमीन पर 8-10 मीटर का अंतर मिलेगा। औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन (इंडस्ट्री) के प्रमुख सचिव राघवेंद्र सिंह ने भी कहा था कि पीथमपुर इंडस्ट्रियल एरिया है। वहां एक भी पेड़ नहीं है, लेकिन वन विभाग उसे अपनी जमीन बताता है।



टास्क फोर्स ने सरकार को दे दी थी रिपोर्ट

2019 में इस विवाद को सुलझाने के लिए बनी टास्क फोर्स की अगुआई तत्कालीन एसीएस फॉरेस्ट एपी श्रीवास्तव ने की थी। द सूत्र ने जब उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि उस वक्त टीम ने पूरी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी, इसके बाद राजस्व और वन भूमि के मामले में क्या हुआ, उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।



द सूत्र ने तब टास्क फोर्स में शामिल अन्य शीर्ष अधिकारियों से भी बात की। इसमें निष्कर्ष यही निकला कि यह लंबी लड़ाई है। इसे खत्म करने के लिए विभागों में आपसी सामंजस्य बहुत जरूरी है।



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