MP में रोलिंग बजट का नया खेल! खर्च नहीं करने वाले अफसरों पर नजर
समझें क्या है पूरा मामला
पुराने बजट और खर्च का पूरा हिसाब जांचा जाएगा।
मांग और वास्तविक खर्च का आपस में मिलान होगा।
विभागों के लिए तीन साल का रोलिंग बजट बनेगा।
कम खर्च करने वाले अफसरों से जवाब मांगा जाएगा।
सभी प्रस्ताव 7 सितंबर तक भेजने जरूरी होंगे।
अब बजट नहीं, खर्च का हिसाब
मध्यप्रदेश में वित्त विभाग ने 2027-28 के रोलिंग बजट की तैयारी शुरू कर दी है। लेकिन इस बार असली फोकस नया बजट कितना होगा से ज्यादा इस बात पर है कि पिछला बजट कितना खर्च हुआ।
यानी विभागों से सिर्फ नई राशि की मांग नहीं पूछी जाएगी। पुराने बजट में मांगी गई रकम, वास्तविक खर्च और योजना के परिणाम का भी मिलान होगा। यहीं से उन विभागों और अफसरों की मुश्किल बढ़ सकती है, जो बजट तो मांगते रहे, लेकिन उपलब्ध राशि का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाए।
बजट मांगने से पहले देना होगा पुराना हिसाब
वित्त विभाग 2027-28 के साथ 2028-29 और 2029-30 का रोलिंग बजट तैयार करेगा। सभी विभागों को अपने प्रस्ताव 7 सितंबर तक भेजने हैं। लेकिन अब प्रस्ताव में सिर्फ रकम मांगना काफी नहीं होगा। विभागों को बताना होगा कि पिछली बार कितनी राशि मांगी गई, कितनी मिली और उसमें से कितना खर्च हुआ। अगर पैसा नहीं खर्च हुआ तो उसका कारण भी सामने रखना होगा।
बजट की कमी या सिस्टम की कमजोरी?
सरकार के सामने अक्सर बजट की कमी का मुद्दा आता है। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे मामले भी रहते हैं, जहां स्वीकृत राशि पूरी खर्च नहीं हो पाती। यहीं रोलिंग बजट की नई व्यवस्था सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है।
अगर पैसा उपलब्ध था और फिर भी खर्च नहीं हुआ, तो अगली बार उतनी ही राशि मांगने का आधार क्या होगा? और यदि ऐसा बार-बार हो रहा है तो जवाबदेही किसकी होगी योजना की, विभाग की या जिम्मेदार अफसर की?
समीक्षा के बाद भी पैसा क्यों बचा?
सरकार विभागों की समीक्षा बैठकें करती है। योजनाओं की प्रगति और बजट उपयोग की जानकारी भी ली जाती है। इसके बावजूद अगर पैसा समय पर खर्च नहीं होता तो सवाल उठना लाजिमी है।
क्या समीक्षा सिर्फ आंकड़े जुटाने तक सीमित रह गई?
क्या कम खर्च की वजह सामने आने के बाद जिम्मेदारी तय होती है? रोलिंग बजट में पुराने आंकड़ों के विश्लेषण से इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश होगी।
दो साल का डेटा बनेगा नई कसौटी
वित्त विभाग ने 2025-26 और 2026-27 का बजट जीरो बेस्ड बजट प्रणाली से तैयार किया था। अब इन दो वर्षों का डेटा उपलब्ध है। इसी के आधार पर देखा जाएगा कि योजनाओं के लिए अनुमानित जरूरत और वास्तविक खर्च में कितना अंतर रहा। इससे वित्त विभाग को यह तय करने में मदद मिलेगी कि अगली बार किस योजना को वास्तव में कितनी राशि चाहिए।
अब प्रस्ताव में रकम के साथ कारण भी
नए बजट प्रस्तावों में विभागों को राशि के साथ उसका उपयोग भी बताना होगा। योजना के लाभार्थी, पिछला खर्च, योजना से मिले परिणाम और भविष्य की जरूरत का विवरण देना होगा। बजट से जुड़ी जानकारी BEMS पोर्टल पर भी दर्ज करनी होगी। इससे सरकार के सामने बजट मांग और वास्तविक उपयोग की तस्वीर ज्यादा साफ होगी।
तीन साल आगे का भी देना होगा हिसाब
रोलिंग बजट 2026 का मतलब सिर्फ अगले वित्त वर्ष का अनुमान नहीं है। विभागों को 2027-28 के साथ अगले दो वित्त वर्षों की संभावित जरूरत भी बतानी होगी। बड़ी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के लिए इससे सरकार को पहले से वित्तीय तैयारी करने में मदद मिलेगी। लेकिन सवाल वही रहेगातीन साल का अनुमान कितना जमीन से जुड़ा होगा?
कार्रवाई हुई तो बदलेगा सिस्टम
नई व्यवस्था की असली परीक्षा आंकड़े जुटाने में नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने में होगी। यदि किसी विभाग ने बार-बार ज्यादा बजट मांगा और राशि खर्च नहीं कर पाया तो सिर्फ अगले साल बजट घटाना पर्याप्त नहीं होगा।
एमपी सरकार को यह भी देखना होगा कि पैसा क्यों नहीं खर्च हुआ प्रशासनिक देरी, टेंडर प्रक्रिया, कमजोर मॉनिटरिंग या अफसरों की निर्णय क्षमता? अगर इन कारणों पर जिम्मेदारी तय होती है तो रोलिंग बजट महज नई बजट प्रक्रिया नहीं रहेगा।
वरना खतरा वही है कि समीक्षा बैठकें होती रहेंगी, आंकड़े बनते रहेंगे और बजट कागज पर चलता रहेगा, लेकिन जमीन पर पैसा खर्च कराने की जवाबदेही फिर भी तय नहीं होगी।
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