बनने से पहले ही पानी में डूबा 34 करोड़ का सांदीपनि स्कूल, दतिया में इंजीनियरिंग पर सवाल!
34 करोड़ का स्कूल, पानी में
दतिया के बड़ौनी में सांदीपनि स्कूल का नया भवन बन रहा है। स्कूल (Sandipani School Baraoni) का निर्माण मध्य प्रदेश पुलिस हाउसिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन करा रहा है। सार्वजनिक टेंडर (सरकारी बोली) रिकॉर्ड में अनुमानित लागत करीब 34.29 करोड़ रुपए दर्ज है।
यानी यह कोई छोटा निर्माण नहीं है। इस परिसर में आने वाले सालों में बच्चे रोज पढ़ने आएंगे। इसलिए इमारत की गुणवत्ता के साथ जमीन और जल निकासी की उपयुक्तता भी उतनी ही जरूरी है।
इतना पानी आया कहां से?
स्थानीय स्तर पर बताया गया है कि साइट के पीछे रामसागर तालाब है। दोनों ओर नाले भी हैं। वहीं, यदि यही भौगोलिक स्थिति है, तो सवाल उठना लाजमी है। साइट चुनते समय कैचमेंट यानी पानी जमा होने वाले इलाके का आकलन हुआ था? जमीन की ऊंचाई-नीचाई और बरसाती पानी के बहाव का क्या आकलन था? बाढ़ के अधिकतम स्तर को क्या ध्यान में रखा गया?
सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि बारिश हुई और गड्ढे भर गए। करोड़ों की सार्वजनिक इमारत में यह भी बताना होगा कि भवन बनने के बाद पानी परिसर में न घुसे, इसके लिए क्या इंजीनियरिंग समाधान तय है।
जे.पी. पस्तोर का पक्ष क्या है?
पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन के तकनीकी पक्ष से जे.पी. पस्तोर ने बात की। उनका कहना है कि साइट चयन में कोई चूक नहीं हुई है। निर्माण के लिए खुदाई के दौरान बारिश हुई थी। इसी वजह से गड्ढों में पानी भर गया है।
उनके मुताबिक समस्या ऐसी नहीं है कि निर्माण प्रभावित हो। काम जल्द शुरू और तेज हो जाएगा।
यह पक्ष अहम है। पर इससे अगला सवाल भी खड़ा होता है। यदि साइट में कोई समस्या नहीं है, तो एजेंसी को यह बताने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। स्कूल बनने के बाद तालाब और नालों का बरसाती पानी निकलने का स्थायी रास्ता क्या होगा?
मामले पर विशेषज्ञ ने क्या कहा?
पीआईयू (Project Implementation Unit) के रिटायर्ड प्रोजेक्ट डायरेक्टर विजय सिंह वर्मा ने निर्माण साइट की तस्वीरें देखीं। उन्होंने कहा कि पहली नजर में लगता है कि साइट चयन में कहीं चूक हुई है।
विजय सिंह वर्मा के मुताबिक साइट नदी के किनारे है। इसलिए इस पहलू को तकनीकी रूप से गंभीरता से देखा जाना चाहिए था। उनका कहना है कि तस्वीरों से लगता है कि फाउंडेशन लेवल नदी के लेवल से नीचे रखा गया है। ऐसे में पानी भरने की समस्या का तकनीकी आकलन जरूरी है।
उन्होंने साफ किया कि यह राय सिर्फ तस्वीरें देखकर बनी है। अंतिम निष्कर्ष के लिए साइट की तकनीकी जांच जरूरी होगी।
पांच महीने में 2% काम?
मैदानी जानकारी के मुताबिक काम शुरू हुए करीब पांच महीने हो चुके हैं। निर्माण की प्रगति लगभग दो फीसदी बताई जा रही है। जबकि अपेक्षित प्रगति करीब 30 फीसदी होने का दावा है।
यह आंकड़ा अभी मैदानी जानकारी पर आधारित है। इसकी पुष्टि कॉर्पोरेशन के रिकॉर्ड से होनी चाहिए। यदि प्रगति सच में इतनी पीछे है, तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
कौन से दस्तावेज देंगे जवाब?
कॉर्पोरेशन चाहे तो विवाद आसानी से खत्म कर सकता है। इसके लिए पांच दस्तावेज सार्वजनिक किए जा सकते हैं। पहला, साइट सिलेक्शन रिपोर्ट। दूसरा, टोपोग्राफिकल या कंटूर सर्वे, यानी जमीन की ऊंचाई का नक्शा। तीसरा, जियोटेक्निकल रिपोर्ट, यानी मिट्टी की जांच। चौथा, स्टॉर्म-वॉटर ड्रेनेज प्लान, यानी बरसाती पानी निकासी की योजना। पांचवां, मंजूर प्लिंथ लेवल, यानी इमारत के फर्श की ऊंचाई।
इन कागजों से साफ हो जाएगा कि बरसात का जोखिम डिजाइन में पहले से शामिल था या निर्माण शुरू होने के बाद सामने आया है।
सरकार सांदीपनि विद्यालयों को बेहतर शैक्षणिक ढांचे के रूप में विकसित कर रही है। इसलिए बड़ौनी का सवाल राजनीति से ज्यादा इंजीनियरिंग की जवाबदेही का है। यदि जलभराव सिर्फ निर्माण के दौरान का है, तो तकनीकी रिपोर्ट इसे आसानी से साबित कर देगी।
आगे क्या होना चाहिए?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है। जहां आज पानी दिख रहा है, वहीं बनने वाला स्कूल क्या हर मानसून में बच्चों के लिए सुरक्षित रहेगा?
इसका जवाब कॉर्पोरेशन को तकनीकी तौर पर साबित करना होगा। साथ ही निर्माण की धीमी रफ्तार पर भी जवाब देना होगा। क्या कॉर्पोरेशन संबंधित इंजीनियरों और निर्माण एजेंसी से समय पर जवाब मांगेगा? या पानी उतरने के साथ सवाल भी उतर जाएंगे?
फिलहाल सबकी नजर कॉर्पोरेशन के अगले कदम पर रहेगी।