MP कैंपस में फिर सियासी एंट्री, कांग्रेस ने बिछाया 13 जोन का जाल
ऐसे समझें पूरा मामला...
- कांग्रेस ने चुनाव से पहले 13 प्रभारी उतारे
- भोपाल की कमान प्रकाश चौकसे को मिली
- इंदौर में अमन बजाज संभालेंगे रणनीति
- NSUI प्रत्यक्ष चुनाव की मांग पर अड़ी
- सितंबर में चुनाव का प्रावधान किया गया
मध्यप्रदेश के कॉलेजों में करीब नौ साल बाद छात्रसंघ चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई तो कांग्रेस ने इसे सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि कैंपस में संगठन की वापसी का मौका मान लिया है।
पार्टी ने चुनाव की तारीख और प्रक्रिया पूरी तरह साफ होने से पहले ही प्रदेश को 13 हिस्सों में बांटकर अपने चेहरे मैदान में उतार दिए हैं। यानी चुनावी बिगुल बजने से पहले ही कांग्रेस ने कैंपस की जमीन नापनी शुरू कर दी है।
चुनाव से पहले ही कांग्रेस ने क्यों कसी कमर?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देश पर 13 क्षेत्र प्रभारी बनाए गए हैं। इनकी जिम्मेदारी सिर्फ चुनावी दिन तक सीमित नहीं होगी। प्रभारियों को छात्र संगठनों से संपर्क, स्थानीय कैंपस की स्थिति समझने और NSUI समर्थित उम्मीदवारों की तैयारी में भूमिका निभानी है।
इसका सीधा मतलब है कि कांग्रेस छात्रसंघ चुनाव को आने वाले समय की छात्र राजनीति के लिए संगठन खड़ा करने की पहली सीढ़ी की तरह देख रही है।
कौन-कहां संभालेगा मोर्चा?
- भोपाल में प्रकाश चौकसे, इंदौर में अमन बजाज और ग्वालियर में हेवरन कसाना को जिम्मेदारी दी गई है।
- रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, मऊगंज और मैहर की कमान मंजुल त्रिपाठी के पास रहेगी। सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, निवाड़ी और टीकमगढ़ में अक्षय दुबे प्रभारी होंगे।
- शहडोल, उमरिया और अनूपपुर में अजय यादव जिम्मेदारी संभालेंगे। जबलपुर संभाग के बड़े क्षेत्र में विजय रजक को लगाया गया है।
- नर्मदापुरम, हरदा और बैतूल में मयूर जायसवाल, जबकि भिंड, मुरैना और श्योपुर में सचिन द्विवेदी प्रभारी होंगे।
- रायसेन, राजगढ़, सीहोर और विदिशा की जिम्मेदारी अर्पित उपाध्याय को मिली है। शिवपुरी, गुना, अशोकनगर और दतिया में सौरभ यादव मोर्चा संभालेंगे।
- मालवा-निमाड़ के धार, झाबुआ, अलीराजपुर, खरगोन, बड़वानी, खंडवा और बुरहानपुर में दीपक डुंडीर प्रभारी होंगे। उज्जैन, देवास, आगर-मालवा, शाजापुर, रतलाम, मंदसौर और नीमच में डॉ. विजय बोडाना जिम्मेदारी संभालेंगे।
असली पेंच चुनाव की प्रणाली में है
सरकार के अकादमिक कैलेंडर में सितंबर 2026 में छात्रसंघ चुनाव कराने का प्रावधान है। लेकिन अभी यह तय नहीं है कि चुनाव सीधे विद्यार्थियों के वोट से होंगे या अप्रत्यक्ष तरीके से। यही मुद्दा आने वाले दिनों में कैंपस राजनीति का सबसे बड़ा टकराव बन सकता है।
कांग्रेस और NSUI प्रत्यक्ष चुनाव के पक्ष में हैं। NSUI का तर्क है कि जिस विद्यार्थी को अपना प्रतिनिधि चुनना है, उसे सीधे वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए। संगठन ने प्रत्यक्ष चुनाव नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी है।
हाईकोर्ट के आदेश ने खोला रास्ता
छात्रसंघ चुनाव की वापसी का रास्ता जबलपुर निवासी छात्र नेता अदनान अंसारी की जनहित याचिका के बाद खुला। याचिका में 2017 के बाद चुनाव नहीं होने और छात्रों से चुनाव शुल्क लिए जाने का मुद्दा उठाया गया था।
15 जुलाई 2026 की सुनवाई में हाईकोर्ट ने सरकार से 2026-27 का अकादमिक कैलेंडर पेश करने को कहा। इसके बाद 3 अगस्त को सरकार ने कैलेंडर पेश किया, जिसमें सितंबर में चुनाव का प्रावधान रखा गया।
इसके बाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में चुनाव कराने के निर्देश के साथ याचिका का निराकरण कर दिया।
लिंगदोह नियम तय करेंगे चुनाव का ढांचा
छात्रसंघ चुनाव में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई लिंगदोह समिति की सिफारिशें महत्वपूर्ण रहेंगी। इन नियमों में उम्मीदवार की उम्र, उपस्थिति, चुनाव खर्च, आपराधिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर प्रावधान हैं।
यही वजह है कि चुनाव की तारीख सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल चुनाव कैसे होगा? का है।
2003 से बंद था प्रत्यक्ष मॉडल
मध्यप्रदेश में 2003 में प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव बंद किए गए थे। बाद में कक्षा प्रतिनिधियों के जरिए अप्रत्यक्ष चुनाव की व्यवस्था अपनाई गई। 2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर एचएस सभरवाल की हत्या के बाद छात्रसंघ चुनाव पूरी तरह रोक दिए गए।
2017 में चुनाव दोबारा शुरू हुए, लेकिन व्यवस्था पूरी तरह प्रत्यक्ष नहीं थी। 2017 के बाद कोरोना समेत कई कारणों से चुनाव नहीं हो सके। अब करीब नौ साल बाद फिर चुनाव का रास्ता खुला है।
अब कैंपस में किसकी ताकत दिखेगी?
कांग्रेस की 13 क्षेत्र प्रभारियों की नियुक्ति से साफ है कि पार्टी चुनाव की घोषणा का इंतजार करने के बजाय कैंपस नेटवर्क पहले तैयार करना चाहती है।
अब मुकाबला केवल अध्यक्ष और सचिव की कुर्सी का नहीं होगा। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि करीब नौ साल बाद कॉलेज परिसरों में लौटने वाली छात्र राजनीति किस मॉडल में होती है और उसमें राजनीतिक दल कितनी जगह बना पाते हैं।
यही वजह है कि सितंबर का छात्रसंघ चुनाव सिर्फ कैंपस का चुनाव नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की नई छात्र राजनीति ( Student politics ) का पहला बड़ा टेस्ट माना जा रहा है।
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