स्वामित्व योजना में पंजीयन पर असमंजस, पटवारी नहीं लौटे काम पर, योजना में है बड़ा पेंच
केंद्र और राज्य की महत्वाकांक्षी स्वामित्व योजना को लेकर पेंच उलझ गया है। पटवारियों ने इस योजना का काम करने से इंकार कर दिया है। ऐसे में सवाल है कि 17 सितंबर से इसमें पंजीयन का काम कैसे होगा। इसका कारण है कि इसमें पहला चरण पटवारी ही है और मप्र शासन की ओर से विक्रेता व निष्पादक की भूमिका में हैं। यानी उसके बिना रजिस्ट्री होगी ही नहीं।
पटवारी का योजना को लेकर आपत्ति
पटवारी संघ ने इस योजना को लेकर कई आपत्तियां दर्ज कराई है। इंदौर पटवारी जिला अध्यक्ष मनोज परिहार ने इन आपत्तियों की जानकारी दी।
1- पहली आपत्ति इसमें पटवारी को शासकीय जमीन का विक्रेता बताया गया है और वह निष्पादक है। यानी वह ग्रामीण कब्जाधारक को वह जमीन बेच रहा है, इसी आधार पर उसे रजिस्ट्री हो रही है। पटवारी मुख्य निष्पादक है। पटवारियों की मुख्य मांग यही है कि उन्हें निष्पादक की भूमिका से हटाया जाए। कल को कोर्ट में कोई भी केस हुआ तो उन्हें खड़ा होना होगा।
2- दूसरी आपत्ति है कि पंजीयन दस्तावेज में लिखा जा रहा है कि विक्रेता यानी पटवारी द्वारा कब्जा सौंपा जा रहा है। यह लाइन गलत है क्योंकि कब्जाधारक को वह सालों से हैं और इसी आधार पर ही उसे अधिकार अभिलेख दिया गया है और पंजीयन हो रहा है।
3- पटवारी को विक्रेता बताने पर भी आपत्ति है। इसमें कब्जाधारी ग्रामीण भूधारक और क्रेता है और इसमें पटवारी को विक्रेता बताया गया है। इसमें वह विक्रेता कैसे हो सकता है यह आपत्ति है।
4- पटवारी की आपत्ति है कि केवाईसी के दौरान उसका व्यक्तिगत डेटा सभी के पास जा रहा है। कई लोग जमीन बेच चुके हैं, जिससे आगे कानूनी विवाद की स्थिति बन सकती है।
पटवारियों ने यह भी आपत्ति ली है कि कई इसमें कब्जाधारी ऐसे हैं तो अपनी जमीन बेच चुके हैं। ऐसे में यदि इसकी जांच होकर ऐसे कब्जाधारी को अलग नहीं किया और उनके पूर्व कब्जे के आधार पर रजिस्ट्री की तो नया विवाद होगा। इसमें कब्जाधारक से जमीन ले चुका व्यक्ति केस लगाएगा। पहले इसकी जांच होना चाहिए।
पटवारी क्यों अहम है
इसमें एमपी ई सेवा पोर्टल पर कब्जाधारी ग्रामीण को अपना पंजीयन कराना है और दस्तावेज अपलोड करना है। फिर पटवारी ही इसकी जांच करेगा और वह इस डीड का निष्पादन करेगा कि जमीन बेची जा रही है। फिर इसके बाद नायब तहसीलदार, तहसीलदार ई संपदा सर्वर पर रजिस्ट्री करेंगे।
मप्र में 50 लाख का होना है पंजीयन
इस योजना के तहत सालों से ग्रामीण आबादी एरिया में सरकारी जमीन पर काबिज लोगों को जमीन की रजिस्ट्री मिलेगी। इसके तहत मप्र में 50 लाख का लक्ष्य है। इंदौर में करीब दो लाख है।
हालांकि यह बात भी उठ रही है कि इन्हें अधिकार अभिलेख मिल चुके हैं और राजस्व रिकार्ड में पहले ही इनके नाम चढ़ चुके हैं। ऐसे में रजिस्ट्री की जरूरत नहीं होती है। राजस्व नियम से पहले रजिस्ट्री होती है और फिर राजस्व रिकार्ड में नाम आता है।
लेकिन यहां तो पहले ही शासन अधिकार अभिलेख देते हुए राजस्व नाम चढ़ा चुका है। इस आधार पर भी बैंक से लोन मिलता है और यह संपत्ति का वैध दस्तावेज है।
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