एमपी के मंदिरों की खुली पोल: महाकाल में हिसाब नहीं, ओंकारेश्वर में कमाई पर पर्दा!
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश के मंदिरों में दान का हिसाब सामने आया है।
- ओंकारेश्वर ने पहली बार दान पेटी की राशि बताई।
- महाकाल में सोना-चांदी दान का ब्योरा अब भी छिपा है।
- बगलामुखी मंदिर में फर्जी समिति चंदा वसूल रही थी।
- देवास में मंदिर ट्रस्ट आय-खर्च दोनों का हिसाब रखता है।
अयोध्या में राम मंदिर चढ़ावा चोरी को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद मध्य प्रदेश के बड़े मंदिरों की दान व्यवस्था भी सवालों में आ गई है। एक मीडिया संस्थान की पड़ताल में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
ओंकारेश्वर का हिसाब अधूरा
ओंकारेश्वर मंदिर ट्रस्ट ने पहली बार दान पेटियों का आंकड़ा सार्वजनिक किया है। नौ जुलाई को बताया गया कि एक हफ्ते में 24 लाख 41 हजार रुपए दान मिला। यहां हर मंगलवार और शुक्रवार को दान पेटियां खोली जाती हैं। वहीं, ऑनलाइन दान, प्रसाद और लड्डू बिक्री का हिसाब अब भी सार्वजनिक नहीं है। शीघ्र दर्शन के लिए हर श्रद्धालु से 300 रुपए लिए जाते हैं। रोज छह हजार लोगों को यह सुविधा मिलती है। इस आय का भी कोई ब्योरा जनता के सामने नहीं आता।
मंदिर से जुड़े लोग लंबे समय से पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। आरोप है कि गिनती में बड़े नोट कम निकलते हैं। पहले भी दान पेटी से पैसे निकालने के वीडियो वायरल हुए थे। इसके बावजूद व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। जब सवाल पूछा गया तो सहायक प्रशासक उदय मंडलोई ने जवाब टाल दिया। उन्होंने सहायक कार्यपालन अधिकारी अशोक महाजन से बात करने को कहा। महाजन ने एसडीएम (Sub Divisional Magistrate) पंकज वर्मा से संपर्क की सलाह दी। वहीं, एसडीएम ने न फोन उठाया, न मैसेज का जवाब दिया।
महाकाल में गिनती की व्यवस्था
उज्जैन के महाकाल मंदिर में दान गिनती के लिए खास इंतजाम है। परिसर में एक पारदर्शी गिनती कक्ष बना है। यहां बैंक कर्मचारियों की मौजूदगी में दान पेटियां खोली जाती हैं। पूरे परिसर में सीसीटीवी (Closed Circuit Television) कैमरे लगे हैं और रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाती है।
गिनती कक्ष में जाने के सख्त नियम हैं। जेब वाले कपड़े पहनने पर रोक रहती है। कई बार कपड़ों की जेब सील भी कर दी जाती है। अधिकारियों की ड्यूटी बदल-बदल कर लगाई जाती है।
मंदिर में कुल 95 दान पेटियां हैं। वेबसाइट और 24 क्यूआर कोड (Quick Response Code) से भी दान लिया जाता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 145 करोड़ रुपए से ज्यादा की आय दर्ज हुई है। रसीद से मिली राशि रोज बैंक में जमा होती है।
सोना-चांदी पर चुप्पी क्यों?
सोने-चांदी के दान का आंकड़ा अब भी सार्वजनिक नहीं है। अधिकारी कहते हैं कि सुरक्षा कारणों से यह जानकारी नहीं दी जाती। दान में मिली ज्वेलरी अधिकृत ज्वेलर्स से तौली जाती है। इसे सीलबंद स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता है। इसे खोलने के लिए तीन अधिकारियों का मौजूद रहना जरूरी है।
महाकाल मंदिर के सहायक प्रशासक आशीष पहलवाड़िया का कहना है कि रोज दान की गिनती होती है। उनके मुताबिक पूरी प्रक्रिया तीन स्तर की सुरक्षा में होती है। वहीं, इस सफाई के बाद भी लोगों का भरोसा पूरी तरह नहीं बना है।
उज्जैन के महापौर मुकेश टटवाल ने भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि तीन साल पहले सोना-चांदी की फिजिकल जांच की बात हुई थी। वहीं, अब तक यह जांच नहीं हो पाई। मंदिर प्रशासन दान सुरक्षित होने का दावा तो करता है। लेकिन न वजन बताया जाता है, न बाजार भाव के हिसाब से कीमत। यही पारदर्शिता की कमी शक की सबसे बड़ी वजह है।
बगलामुखी में फर्जी वसूली
आगर मालवा के नलखेड़ा में मां बगलामुखी मंदिर है। यहां दान को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। कलेक्टर प्रीति यादव ने तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई है। इसमें जिला पंचायत सीईओ, कोषालय अधिकारी और नगर परिषद सीएमओ शामिल हैं।
सरकारी समिति के अलावा एक गैर-सरकारी संस्था भी दान ले रही थी। यह संस्था फर्जी तरीके से चढ़ावा और चंदा जमा कर रही थी। जांच टीम ने बैंक खाते और लॉकर की जांच की है। लॉकर में सोना-चांदी और नकदी भी मिली है।
अब यह देखा जा रहा है कि यह समिति किस अधिकार से दान ले रही थी। नकदी और सोने-चांदी का पूरा हिसाब भी खंगाला जा रहा है। इसमें किसी सरकारी अधिकारी की भूमिका थी या नहीं, यह भी जांचा जा रहा है।
देवास मॉडल से सीख
देवास की माता टेकरी पर दो प्रमुख मंदिर हैं। यहां तुलजा भवानी और चामुंडा माता की पूजा होती है। दोनों मंदिरों में कुल 11 दान पेटियां हैं। साल में करीब 10 बार पेटियां खोली जाती हैं।
पूरी प्रक्रिया की लाइव वीडियोग्राफी होती है। गिनती के समय पटवारी और राजस्व विभाग के अधिकारी मौजूद रहते हैं। परिसर में तीन कैमरों से चौबीस घंटे निगरानी होती है। हर साल करीब सवा करोड़ रुपए दान से मिलते हैं।
टेकरी प्रभारी और नायब तहसीलदार कपिल गुर्जर के मुताबिक निगरानी हमेशा सख्त रहती है। पिछले साल यहां 1.25 करोड़ रुपए की आय हुई थी। खर्च करीब एक करोड़ 45 लाख रुपए रहा। बीस लाख रुपए का उधार विलंबित खर्च में दिखाया गया है। इस साल इस कमी को पूरा करने की कोशिश होगी।
इन चार मंदिरों के उदाहरण से साफ है कि पारदर्शिता में बड़ा फर्क है। देवास मॉडल में आय और खर्च दोनों का हिसाब आसानी से मिल जाता है। वहीं, महाकाल और ओंकारेश्वर में सोना-चांदी और कई आय स्रोत अब भी छिपे रहते हैं। बगलामुखी का मामला दिखाता है कि निगरानी में जरा सी चूक कैसे बड़ा नुकसान कर सकती है। श्रद्धालुओं का भरोसा तभी मजबूत होगा जब हर मंदिर अपने दान का पूरा हिसाब खुलकर बताए।
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