“जल्दी कोर्ट जाओ, नहीं तो शिक्षक फंसेंगे”—मंत्री की सलाह से भड़का TET विवाद, विभाग की चूक पर उठे सवाल
मध्य प्रदेश में TET परीक्षा को लेकर मचे बवाल के बीच स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह का बयान नई बहस छेड़ गया है। मंत्री ने शिक्षक संगठनों से साफ कहा—“जल्दी कोर्ट चले जाओ, नहीं तो ज्यादा शिक्षक लपेटे में आ जाएंगे।” यह बयान राहत कम और विभाग की जिम्मेदारी से बचने की कोशिश ज्यादा माना जा रहा है, क्योंकि पूरा विवाद खुद शिक्षा विभाग की देरी और लापरवाही से जुड़ा है।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद? यहां से पकड़िए पूरी कहानी
मामले की जड़ 1 सितंबर 2025 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश में है। कोर्ट ने साफ किया कि RTE Act 2009 के तहत कार्यरत शिक्षकों को 2 साल के भीतर TET पास करना अनिवार्य होगा।
लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस आदेश के करीब 5 महीने बाद 2 मार्च 2026 को लोक शिक्षण संचालनालय ने लेटर जारी कर शिक्षकों को परीक्षा देने के निर्देश दिए।
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यहीं से विवाद ने तूल पकड़ा
क्योंकि सवाल उठा कि इतने साल विभाग आखिर करता क्या रहा? विभाग का लेटर बना विवाद की असली चिंगारी। भोपाल स्थित लोक शिक्षण संचालनालय के पत्र में साफ कहा गया- सभी प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षकों को TET पास करना अनिवार्य। जुलाई-अगस्त 2026 में परीक्षा संभावित-2 साल में पास नहीं किया तो नौकरी खतरे में। 5 साल से ज्यादा सेवा बाकी होने पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति तक की नौबत। यानी सीधा सं देश-“पास करो या बाहर हो जाओ” यही आदेश अब शिक्षकों के गले की फांस बन गया है।
9 साल तक क्यों सोता रहा शिक्षा विभाग?
शिक्षक संगठनों का सबसे बड़ा सवाल यही है-2010 से लेकर 2019 तक विभाग ने कोई स्पष्ट निर्देश क्यों नहीं दिए? न कोई नोटिस, न कोई रिमाइंडर न TET अनिवार्यता की सख्ती दिखाई गई। अब अचानक नियम लागू कर देना- इसे शिक्षक “तुगलकी फरमान” बता रहे हैं।
शिक्षकों का दर्द: उम्र, बीमारी और अब परीक्षा का दबाव
संगठनों का कहना है कि- कई शिक्षक अब उम्रदराज हो चुके हैं कई बीमारियों से जूझ रहे हैं। कंप्यूटर आधारित परीक्षा देना आसान नहीं उनका सवाल साफ है- “अगर समय पर बताते, तो हम पहले ही परीक्षा दे देते”
मंत्री की भूमिका पर सवाल: सलाह या जिम्मेदारी से बचाव?
मंत्री उदय प्रताप सिंह से मुलाकात में शिक्षकों को सहानुभूति तो मिली, लेकिन समाधान नहीं। मंत्री का साफ कहना था- सुप्रीम कोर्ट का फैसला शिक्षकों के खिलाफ है इसलिए रिव्यू पिटीशन भी शिक्षक ही लगाएं। यहीं पर विवाद और गहरा गया। क्योंकि अब आरोप लग रहा है कि-सरकार अपनी गलती छुपाने के लिए मामला शिक्षकों पर डाल रही है। खुद अवमानना से बचने की कोशिश कर रही है।
राव उदय प्रताप सिंह भी घेरे में, अफसरों पर भी निशाना
इस पूरे मामले में सिर्फ विभाग ही नहीं, बल्कि मंत्री और अफसर भी सवालों के घेरे में हैं-समय पर नीति स्पष्ट क्यों नहीं की गई? 2018 के संवर्ग परिवर्तन में TET को नजरअंदाज क्यों किया गया? NCTE गाइडलाइन के बावजूद नियमित परीक्षा क्यों नहीं कराई गई? यह लापरवाही अब सीधे डेढ़ लाख शिक्षकों के भविष्य पर भारी पड़ रही है।
ट्राइबल संगठन का बयान: सरकार खुद लगाए रिव्यू
ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डीके सिंगौर ने कहा-सरकार खुद सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन लगाए या केंद्र से RTE Act में संशोधन करवाए। अध्यादेश के द्वारा अन्य राज्यों की तरह राहत का रास्ता निकाले। सिंगौर का साफ कहना है- “गलती विभाग की है, सजा शिक्षक क्यों भुगतें?”
अब क्या होगा आगे? संगठन खुद उतरेंगे मैदान में
यदि सरकार पीछे हटती है, तो शिक्षक संगठन खुद सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। मार्च के अंत तक रिव्यू पिटीशन की तैयारी, जनप्रतिनिधियों से समर्थन जुटाने की रणनीति,प्रदेशभर में आंदोलन की संभावना।
सबसे बड़ा संकट: पोस्टिंग और पात्रता का टकराव
मामले का एक और पेच भी है-कई शिक्षक हाईस्कूल में अटैच हैं, जबकि पद माध्यमिक का है ट्रांसफर होते ही उनकी पात्रता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। इस स्थिति में विभाग का “सबको परीक्षा दो” वाला फार्मूला और ज्यादा भ्रम पैदा कर रहा है।
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विभाग की चूक, शिक्षक संकट में
पूरे मामले का सार यही है—सुप्रीम कोर्ट का आदेश अपनी जगह है लेकिन विभाग की सालों की लापरवाही ने स्थिति बिगाड़ी,अब उसी गलती का बोझ शिक्षकों पर डाला जा रहा है।
मंत्री का “कोर्ट चले जाओ” वाला बयान इस बात का संकेत दे रहा है कि सरकार खुद बचाव की मुद्रा में है, समाधान की नहीं।
मुख्य बातें एक नजर में-
- 1.5 लाख शिक्षक TET विवाद में घिरे
- सुप्रीम कोर्ट ने 2 साल में TET पास करना अनिवार्य किया
- 5 महीने बाद विभाग ने आदेश जारी किया
- 9 साल की देरी पर उठे सवाल
- मंत्री ने शिक्षकों को ही कोर्ट जाने की सलाह दी
- संगठन रिव्यू पिटीशन की तैयारी में
- शिक्षकों का भविष्य अधर में
यह मामला अब सिर्फ परीक्षा का नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता और जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बन चुका है।