नया वन्यजीव प्रयोग: बाघों की मौत के बीच चीता मिशन, क्या तैयार है एमपी?

Ramanand Tiwari | Jun 21, 2026, 18:28 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. मध्यप्रदेश में बाघों की मौत बढ़ी, वहीं चीतों के बसाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इसमें सवाल उठता है कि क्या जंगल वास्तव में सुरक्षित हैं।

ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...



  • एमपी में करंट, जहर और संघर्ष से बाघों की मौत बढ़ी है।
  • रानी दुर्गावती रिजर्व में चीता बसाने की तैयारी तेज है।
  • 439 हेक्टेयर में विशेष चीता आवास विकसित किया जा रहा है।
  • 80% निर्माण कार्य पूरा, प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान जारी।
  • विशेषज्ञों ने सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी पर सवाल उठाए हैं।

मध्य प्रदेश एक तरफ खुद को देश का "टाइगर स्टेट" बताता है, दूसरी तरफ जंगलों से लगातार बाघों, तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की मौत की खबरें सामने आ रही हैं।



करंट, जहर, संक्रमण और आपसी संघर्ष जैसी वजहों से वन्यजीवों की मौत ने संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे समय में सरकार वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व को चीतों के नए ठिकाने के रूप में तैयार कर रही है।



सवाल यह नहीं है कि चीते आएंगे या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि जिन जंगलों में पहले से मौजूद वन्यजीवों की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है, वहां नए वन्यजीवों को बसाने की तैयारी कितनी मजबूत है।



एक तरफ मौत, दूसरी तरफ नई परियोजना

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में बाघों की मौत लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। कई मामलों में करंट, शिकार, बीमारी और क्षेत्रीय संघर्ष प्रमुख कारण रहे हैं।



कान्हा, बांधवगढ़ और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में सामने आए घटनाक्रमों ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को भी सवालों के घेरे में खड़ा किया। कई बार हाईकोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ा और जांच समितियां गठित करनी पड़ीं। ऐसे माहौल में रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व को देश का नया चीता लैंडस्केप बनाने की तैयारी चल रही है।



रानी दुर्गावती रिजर्व में 80 फीसदी तैयारी पूरी

वन विभाग के मुताबिक रिजर्व के 439 हेक्टेयर क्षेत्र में चीतों के लिए विशेष आवास विकसित किया जा रहा है। लगभग 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और महीने के अंत तक शेष कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।



चीतों की सुरक्षा के लिए क्वारंटीन बोमा और सॉफ्ट रिलीज बोमा तैयार किए गए हैं। यहां नए वातावरण में ढलने के बाद ही चीतों को खुले जंगल में छोड़ा जाएगा। जानकारी के अनुसार कूनो से कुछ चीतों को भविष्य में यहां स्थानांतरित किया जा सकता है।



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क्या पुराने सबक याद हैं?

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए बाड़े बनाना या चीतों को स्थानांतरित करना ही पर्याप्त नहीं होगा। सबसे बड़ी चुनौती जंगल के बाहर मौजूद खतरे हैं।



खेतों में बिछे करंट वाले तार, वन क्षेत्रों के आसपास बढ़ता मानवीय दबाव, संक्रमण फैलाने वाले आवारा पशु और कमजोर निगरानी व्यवस्था पहले से ही वन्यजीवों के लिए खतरा बने हुए हैं। यदि इन चुनौतियों का समाधान नहीं हुआ तो नई परियोजनाओं की सफलता भी प्रभावित हो सकती है।



देश का अनोखा रिजर्व बनने की तैयारी

रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व को देश के उन चुनिंदा संरक्षित क्षेत्रों में शामिल करने की तैयारी है जहां बाघ, तेंदुआ और चीता एक ही परिदृश्य में अलग-अलग क्षेत्रों में रह सकेंगे।



सागर, दमोह और नरसिंहपुर तक फैले इस रिजर्व में बड़े घास के मैदान मौजूद हैं। यहां चिंकारा, चीतल और सांभर जैसी शिकार प्रजातियां पर्याप्त संख्या में हैं, जो चीतों के लिए अनुकूल मानी जाती हैं।



विशेषज्ञों का मानना है कि तीनों बड़े शिकारी जीवों की शिकार शैली अलग होने के कारण इनके बीच सीधा संघर्ष अपेक्षाकृत कम हो सकता है।



मुख्य तथ्य...

  • मध्य प्रदेश में हाल के वर्षों में बाघों की मौत लगातार बढ़ी है।
  • मौतों के प्रमुख कारण करंट, बीमारी, जहर और आपसी संघर्ष रहे हैं।
  • रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व में चीतों के लिए 439 हेक्टेयर विशेष आवास तैयार किया जा रहा है।
  • परियोजना का लगभग 80 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है।
  • 50 वनकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है।
  • 40 गांवों में 4 हजार से अधिक लोगों को जागरूक किया गया है।
  • रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 2339 वर्ग किलोमीटर है।

सबसे बड़ा सवाल

मध्य प्रदेश ने बाघों की संख्या बढ़ाने में सफलता हासिल की है, लेकिन लगातार हो रही मौतों ने संरक्षण मॉडल की कमजोरियों को भी उजागर किया है।



अब रानी दुर्गावती में चीतों को बसाने की तैयारी हो रही है। ऐसे में असली परीक्षा बाड़े बनाने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की होगी कि वन विभाग पुराने सबक से सीखकर नई व्यवस्था को वास्तव में सुरक्षित बना पाया है या नहीं।



यदि जवाब "हां" है तो यह परियोजना वन्यजीव संरक्षण का नया मॉडल बन सकती है। यदि जवाब "नहीं" रहा तो सवाल फिर वही होगा—क्या जंगल में सिर्फ नए जानवर लाना काफी है, या पहले उनकी सुरक्षा की गारंटी जरूरी है?



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