एमपी के इस गावं में 160 साल से विजयादशमी पर नहीं जलता रावण का पुतला, जानें अनूठी परंपरा

Kaushiki | Sept 29, 2026, 13:55 IST
इस गांव में दशहरे पर रावण की जगह कंस का वध होता है
मध्यप्रदेश का मुड़िया गांव अपनी 160 साल पुरानी परंपरा के लिए मशहूर है। यहां विजयादशमी पर रावण नहीं बल्कि कंस वध किया जाता है। प्राचीन महामारी से मुक्ति पाने के लिए शुरू हुआ अनोखा आयोजन आज भी गांव में लोक आस्था और भाईचारे के साथ धूमधाम से मनाया जाता है।

Mudiya Village Tradition: मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले का मुड़िया गांव अपनी 160 साल पुरानी अनोखी विजयादशमी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। इस गांव में रावण दहन की जगह कंस वध की अनूठी प्रथा निभाई जाती है।



लगभग 160 साल पहले गांव में फैली भीषण महामारी से मुक्ति और सुरक्षा पाने के लिए ग्रामीणों ने ईश्वर का आश्रय लेकर यह संकल्प लिया था।



माना जाता है कि कंस का वध करने की शुरुआत के बाद से गांव से आपदा पूरी तरह गायब हो गई। यह आयोजन गांव के भाईचारे, अटूट लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का एक अनोखा संगम है। इसे आज भी नई पीढ़ी पूरे उत्साह के साथ जीवंत रखे हुए है। आइए जानें अनूठी परंपरा...



महामारी से मुक्ति का इतिहास

ग्रामीणों के मुताबिक, इस परंपरा की शुरुआत मजबूरी में हुई थी। लगभग 160 साल पहले गांव में भीषण महामारी फैली थी। उस बीमारी की वजह से कई लोगों की जान चली गई थी। चारों तरफ डर का माहौल बन गया था। गांव के लोग बहुत परेशान थे।



तब गांव के लोगों ने ईश्वर की शरण ली। उन्होंने एक विशेष संकल्प लिया। उन्होंने बुराई के प्रतीक कंस के वध की शुरुआत की। मान्यता है कि इसके बाद गांव से बीमारी गायब हो गई। तब से गांव में कोई बड़ी आपदा नहीं आई। लोग इसे भगवान कृष्ण का चमत्कार मानते हैं।



पवित्र माटी से बनी प्रतिमा

कंस की प्रतिमा बनाने की प्रक्रिया बहुत खास होती है। इसके लिए बाजार से कोई सामग्री नहीं खरीदी जाती है। गांव वाले अपने खेतों और घरों से मिट्टी लाते हैं। इसी मिट्टी से गांव के बाहर विशाल प्रतिमा बनती है।



प्रतिमा के मुकुट पर कांस का सफेद फूल लगाया जाता है। यह फूल कंस के अधिकार और घमंड का प्रतीक है। मिट्टी एकत्र करने में पूरा गांव सहयोग करता है। इससे लोगों के बीच आपसी भाईचारा बढ़ता है।



कृष्ण और कंस की सेना का युद्ध

प्रतिमा बनने के बाद गांव वाले दो दलों में बंटते हैं। एक दल भगवान कृष्ण की सेना बनता है। दूसरा दल कंस की सेना का रूप लेता है। इसमें बच्चे और बड़े राक्षस का रूप धरते हैं।



दोनों दल मैदान में आमने-सामने आ जाते हैं। इसके बाद उनके बीच सांकेतिक युद्ध शुरू होता है। मैदान में मौजूद लोग जयकारे लगाने लगते हैं। यह युद्ध दो से तीन घंटे तक चलता है।



कंस वध और जीत की खुशी

युद्ध के अंत में कृष्ण रूपी बालक आगे बढ़ता है। वह कंस की प्रतिमा के पास पहुंचता है। वह मुकुट से कांस का सफेद फूल उखाड़ लेता है। इसी के साथ कंस का वध पूरा माना जाता है।



कंस का वध होते ही कृष्ण की सेना जीत जाती है। पूरा गांव खुशी से झूम उठता है। लोग ढोल-नगाड़ों पर नाचने लगते हैं। इस तरह बुराई पर अच्छाई की जीत मनाई जाती है।



लोक आस्था का अनूठा संगम

यह आयोजन सिर्फ एक नाटक या खेल नहीं है। यह ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा का हिस्सा है। लोगों का मानना है कि इससे गांव सुरक्षित रहता है। गांव में सुख और समृद्धि बनी रहती है।



नई पीढ़ी भी इस परंपरा को पूरे दिल से निभा रही है। युवा इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। आज 160 साल बाद भी यह परंपरा पूरी तरह जीवित है। यह गांव की सामूहिक ताकत को दर्शाती है।



  1. मुड़िया गांव की विजयादशमी परंपरा की शुरुआत कैसे हुई थी?
    मुड़िया गांव की विजयादशमी परंपरा लगभग 160 साल पहले एक भीषण महामारी से मुक्ति पाने के लिए शुरू हुई थी। तब गांव के लोगों ने बुराई के प्रतीक कंस के वध का संकल्प लिया, जिसके बाद से गांव में कोई बड़ी आपदा नहीं आई।
  2. मुड़िया गांव में कंस वध का आयोजन कैसे किया जाता है?
    मुड़िया गांव में कंस वध का आयोजन गांव के बाहर विशाल मिट्टी की प्रतिमा बनाकर किया जाता है, जिसके बाद ग्रामीण दो दलों में बंटकर सांकेतिक युद्ध करते हैं। इस युद्ध के अंत में कृष्ण रूपी व्यक्ति कंस की प्रतिमा के मुकुट से कांस का सफेद फूल निकालता है, जिससे कंस का वध साबित होता है।
  3. कंस वध परंपरा का सांस्कृतिक महत्व क्या है?
    कंस वध परंपरा मुड़िया गांव की सामूहिक श्रद्धा और भाईचारे का प्रतीक है। इससे न केवल गांव के लोगों की आस्था जुड़ी है, बल्कि यह गांव में सुख और समृद्धि बनाए रखने का एक अनोखा तरीका भी है, जिसे नई पीढ़ी भी उत्साह से निभाती है।
Tags:
  • रावण का पुतला
  • अनूठी परंपरा
  • मध्यप्रदेश
  • मुड़िया गांव
  • विजयादशमी
  • कंस वध की परंपरा
  • Mudiya Village Tradition
  • महामारी
  • नरसिंहपुर
  • सांस्कृतिक परंपरा