तलाक के लिए अब छह महीने का इंतजार जरूरी नहीं, इंदौर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश पलटा
जानिए क्या है पूरा मामला?
यह मामला आपसी सहमति से तलाक लेने वाले पति-पत्नी से जुड़ा है। पति ने फैमिली कोर्ट में छह महीने की प्रतीक्षा अवधि माफ करने की मांग की थी। वह चाहता था कि तलाक के लिए छह महीने इंतजार न करना पड़े।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने उसकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद पति ने इस फैसले को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (MP High Court) की इंदौर बेंच में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में हालात देखकर ही फैसला लेना चाहिए।
तलाक के लिए छह महीने का इंतजार कब माफ हो सकता है?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से तलाक के हर मामले में छह महीने इंतजार करना जरूरी नहीं है। अगर पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हैं और उनके दोबारा साथ आने की संभावना नहीं है, तो कोर्ट इस अवधि में छूट देने पर विचार कर सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि जोड़े को बिना इंतजार किए तलाक मिल जाएगा। कोर्ट प्रत्येक मामले की परिस्थितियों और कानूनी शर्तों के आधार पर फैसला करेगा।
फैमिली कोर्ट को पंद्रह दिन में फैसला लेने का निर्देश
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को पति की अर्जी पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए पंद्रह दिन का समय दिया गया है। अब फैमिली कोर्ट को मामले की परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखकर नया फैसला लेना होगा।
खास बात यह है कि हाईकोर्ट ने सीधे तलाक मंजूर नहीं किया है। उसने केवल छह महीने की प्रतीक्षा अवधि माफ करने वाली अर्जी पर नए सिरे से फैसला लेने को कहा है।
आपसी सहमति से तलाक में छह महीने का नियम क्या है?
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) ले सकते हैं। इस प्रक्रिया में सामान्य तौर पर पहली अर्जी के बाद छह महीने की प्रतीक्षा अवधि रखी गई है। इस समय का मकसद पति-पत्नी को अपने रिश्ते पर दोबारा सोचने का मौका देना है। अगर दोनों के बीच सुलह हो सकती है, तो वे तलाक का फैसला बदल सकते हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि कुछ परिस्थितियों में यह प्रतीक्षा अवधि माफ की जा सकती है। इसके लिए जरूरी कानूनी शर्तों को पूरा करना होता है। इंदौर हाईकोर्ट का यह आदेश भी इसी कानूनी व्यवस्था से जुड़ा है।
क्या अब तुरंत तलाक मिल जाएगा?
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि आपसी सहमति से तलाक लेने वाले जोड़ों को तुरंत तलाक मिल जाएगा। हर मामले में कोर्ट परिस्थितियों को अलग-अलग देखेगा। पति-पत्नी की सहमति और कानूनी शर्तों की जांच भी की जाएगी।
यदि कोर्ट को लगता है कि सुलह की संभावना नहीं बची है तो इंतज़ार का समय माफ करने पर विचार किया जा सकता है। वहीं अगर कोर्ट को सुलह की संभावना नजर आती है तो वह निर्धारित प्रक्रिया अपनाने के लिए कह सकता है।
हाईकोर्ट के फैसले का क्या असर होगा?
यह आदेश उन पति-पत्नी के लिए महत्वपूर्ण है, जो आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं। खासकर ऐसे मामलों में जहां दोनों लंबे समय से अलग रह रहे हैं और सुलह की उम्मीद नहीं बची है। ऐसे जोड़े कानूनी शर्तें पूरी होने पर छह महीने की प्रतीक्षा अवधि माफ करने की मांग कर सकते हैं। हालांकि, अंतिम फैसला कोर्ट ही करेगा।
फिलहाल इस मामले में फैमिली कोर्ट को पंद्रह दिन में नया फैसला लेना है। अब देखना होगा कि अदालत प्रतीक्षा अवधि माफ करने की मांग पर क्या निर्णय देती है।
FAQ:
- आपसी सहमति से तलाक लेने पर छह महीने की प्रतीक्षा अवधि कब माफ की जा सकती है?
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हैं और सुलह की संभावना नहीं है, तब छह महीने की प्रतीक्षा अवधि को माफ किया जा सकता है। - क्या इस फैसले से तुरंत तलाक मिल जाएगा?
नहीं, यह फैसला सीधे तौर पर तुरंत तलाक देने का आदेश नहीं है। प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर कोर्ट फैसला करेगी। - हाईकोर्ट के फैसले का क्या महत्व है?
यह आदेश उन पति-पत्नी के लिए महत्वपूर्ण है जो आपसी सहमति से तलाक लेना चाहते हैं, खासकर जब वे लंबे समय से अलग रह रहे हों और संभावित सुलह नहीं हो।