नीमच नपा में करोड़ों की धांधली के छह साल बाद फिर समिति को जमीन दिलाने की कोशिश

Sanjay Sharma | May 28, 2026, 23:40 IST
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नीमच नपा में फिर जमीन घोटाले की तैयारी है। BJP-कांग्रेस पार्षद समिति को जमीन दिलाना चाहते हैं। 2019 में 200 करोड़ का नुकसान हुआ था। 2020 से 2025 तक 5 ऐसे मामले रद्द हो चुके हैं।

News in Short

  • नीमच नपा में बीजेपी-कांग्रेस पार्षद मिलकर समिति को जमीन देने का प्रस्ताव ला रहे हैं
  • 2019 में 200 की जगह 500 फर्जी प्लॉट बांटे गए। नपा को 200 करोड़ का नुकसान हुआ
  • तत्कालीन अध्यक्ष राकेश पप्पू जैन ने सितम्बर 2019 में ऐसा ही प्रस्ताव किया था खारिज
  • 2021 से 2025 के बीच कोर्ट और सरकार द्वारा मंदसौर, रतलाम, उज्जैन में रद्द किए गए प्रस्ताव
  • बिना नीलामी और शासन की मंजूरी के जमीन का आवंटन नहीं कर सकते निकाय।

News in Detail

नीमच नपा में फिर समिति को जमीन देने का खेल शुरू है। इस बार BJP-कांग्रेस पार्षद साथ हैं। 2019 में इसी खेल में नपा को 200 करोड़ की चपत लगी थी। तब अध्यक्ष राकेश पप्पू जैन ने प्रस्ताव रद्द कर दिया था। अब फिर जनप्रतिनिधि यानी पार्षद समिति को जमीन आवंटित कराने का प्रस्ताव पारित कराने का दबाव बना रहे हैं। हांलाकि अभी यह मामला परिषद की बैठक में नहीं पहुंचा है। वहीं नगर पालिका अध्यक्ष स्वाति गौरव चोपड़ा भी पार्षदों की लामबंदी को लेकर दबाव में नजर आ रही हैं।



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नीमच – 2021: नगरपालिका कर्मचारियों की समिति के नाम पर 80 प्लॉट मांगे गए। जांच में पता चला कि 60% सदस्य फर्जी थे। कलेक्टर ने आवंटन रोक दिया। EOW ने जांच की।



मंदसौर – 2022: मंदसौर नपा में ‘पत्रकार गृह निर्माण समिति’ को 1.5 हेक्टेयर जमीन कौड़ियों के दाम दी गई। RTI से खुलासा हुआ कि 40 में से 28 सदस्य पत्रकार ही नहीं थे। 2024 में हाईकोर्ट ने आवंटन रद्द कर नीलामी के आदेश दिए।



रतलाम – 2023: नगर निगम पार्षदों की समिति को जमीन दिलाने 12 पार्षदों ने जन कल्याण समिति बनाई। 2 करोड़ की जमीन 20 लाख में लेने का प्रस्ताव लेकर आए। हांलाकि आयुक्त ने म.प्र. नगरपालिक निगम के एक्ट का हवाला देकर प्रस्ताव खारिज किया।



नीमच – 2024: नीमच में ही एक धार्मिक समिति को मंदिर विस्तार के नाम पर 5000 वर्गफीट व्यावसायिक जमीन देने का प्रस्ताव आया। जांच में निकला कि समिति का रजिस्ट्रेशन ही 2024 का था। CM हेल्पलाइन पर शिकायत के बाद यह प्रस्ताव वापस हुआ।



उज्जैन – 2025: उज्जैन नगर निगम में स्मार्ट सिटी की खाली जमीन को सांस्कृतिक समिति के नाम पर लेने का प्रयास हुआ। 7 पार्षदों ने हस्ताक्षर किए। संभागायुक्त ने 2019 के नीमच वाले आदेश का हवाला देकर फाइल बंद कर दी।



इंदौर – 2020: इंदौर नगर निगम ने कर्मचारी सहकारी बैंक समिति को AB रोड पर 10,000 वर्गफीट व्यावसायिक जमीन 1 रु वर्गफीट सालाना पर दे दी। शिकायत पर लोकायुक्त ने जांच की तो पाया समिति के 90% सदस्य बैंक के कर्मचारी ही नहीं थे। जिसके बाद FIR दर्ज की गई और निगम आयुक्त को आवंटन रद्द करना पड़ा।



भोपाल – 2021: भोपाल नगर निगम ने एक निजी स्कूल संचालित करने वाली समिति को अरेरा कॉलोनी में खेल मैदान की 2 एकड़ जमीन 30 साल की लीज पर दी। सूचना के अधिकार से खुलासा हुआ कि समिति ने वहां कमर्शियल बिल्डिंग बना ली। 2023 में मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर लीज रद्द की गई। वहीं निगम ने बिल्डिंग सील कर 1.5 करोड़ जुर्माना लगाया।



ग्वालियर – 2022: ग्वालियर नगर निगम ने संस्कृति कला समिति को फूलबाग के पास 5000 वर्गफीट जमीन दी गई। EOW ने शिकायत पर जांच की तो पता चला कि वहां पर समिति के अध्यक्ष का होटल चल रहा था। यह समिति आवंटन से केवल 15 दिन पहले ही पंजीकृत हुई थी। ईओडब्ल्यू द्वारा केस दर्ज करने के बाद निगम वापस लेने की कार्रवाई शुरू कर दी गई।



जबलपुर – 2023: जबलपुर नगर निगम ने गौ सेवा समिति को 3 एकड़ जमीन गौशाला के नाम पर दी। कलेक्टर की जांच में इस गौशाला के पास एक भी गाय नहीं मिली। वहीं समिति द्वारा यहां प्लॉट बेचने की तैयारी थी। जिसके बाद कलेक्टर ने आवंटन निरस्त कर समिति सचिव पर केस दर्ज कराया।



सरकारी जमीन आवंटन कराने के इन सभी मामलों में एक जैसा तरीका अपनाया गया। पहले समिति रजिस्टर कराई गई और फिर निकायों से जमीन आवंटित कराते हुए उसका व्यावसायिक उपयोग शुरू कर दिया गया। कुछ जगह पर सरकारी जमीन पर प्लॉट बेंच दिए गए। इन सभी मामलों में गड़बड़ी के खुलासे के बाद जिला प्रशासन को आवंटन रद्द करना पड़ा है।



कानून साफ है, नीयत में खोट

म.प्र. नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 109 और अचल संपत्ति अंतरण नियम 1996 का नियम 3 आवंटन के मामले में स्पष्ट है। इसके अनुसार निकाय सीधे तौर पर प्रस्ताव लाकर जमीन का आवंटन नहीं कर सकते। इसके लिए प्रक्रिया अपनाते हुए नीलामी या बंद लिफाफे के जरिए प्रस्ताव आमंत्रित किए जा सकते हैं। जमीन के मूल्य के आधार पर सरकार से अनुमति लेने भी जरूरी है। इसके बाद भी जनप्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए निकायों पर दबाव बना रहे हैं।



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