NEWS STRIKE LIVE : Cockroach Janata Party Protest: क्या युवाओं का गुस्सा बदल देगा राजनीति?

Harish Divekar | Jul 23, 2026, 07:00 IST
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विपक्ष को 'कॉकरोच आंदोलन' के रूप में एक मजबूत सहारा मिला है, जिसने राहुल गांधी और ममता बनर्जी जैसे नेताओं को अचानक चर्चा में ला दिया। जंतर-मंतर पर युवाओं का जुटना चौंकाने वाला है, लेकिन इसका असली असर 2027 और 2029 के चुनावों में दिखेगा।

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कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन का असल लिटमस टेस्ट 2027 में होगा। ये आंदोलन विपक्ष के लिए नई बैसाखी नहीं बल्कि पूरी की पूरी व्हील चेयर भी बनकर आया है। वो भी बेहद मोडिफाइड व्हील चेयर, जिसे रफ्तार देने के लिए सीजेपी का एक्सीलिरेटर भी लगा है। पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी पूरी तरह गायब थे वो अचानक हेडलाइन्स में आ गए। पश्चिम बंगाल से ममता दीदी भी कॉकरोच पर प्यार जताने लगी। विपक्ष का ये रुख चौंकाने वाला नहीं है, पर कॉकरोच के नाम पर जंतर मंतर पर जमा हुई युवाओं की भीड़ चौंकाने वाली है। लेकिन क्या उसका असर 2029 तक नजर आएगा।



नमस्कार



कॉकरोच भी अजब कौम है। कभी कभी कॉकरोच भस्मासुर से भी ज्यादा खतरनाक लगते हैं। भस्मासुर को तो मारने की जुगत मिल गई थी, लेकिन कॉकरोच पर हिट और पेस्ट कंट्रोल का असर भी ज्यादा समय तक नहीं होता। एक खत्म हुआ तो दस नजर आने लगते हैं। कुछ यही हाल कॉकरोच जनता पार्टी का भी है।



सिर्फ मुझे ही नहीं पूरा देश दिल्ली के जंतर मंतर पर नजरें गढ़ाए बैठा है। कॉकरोच जनता पार्टी का ये दूसरा आंदोलन है। चंद रोज पहले कॉकरोच जनता पार्टी एक आंदोलन और कर चुकी है, लेकिन तब ये आंदोलन इतना कामयाब नहीं हुआ था। तब किसने ये सोचा था कि उसके कुछ ही दिन बाद सीजेपी इतनी भीड़ जुटा कर पूरी दिल्ली की सड़कों को पाट देगी। पीएम मोदी को देश का सबसे बड़ा इंफ्लूएंजर मानने वाली युवाओं की भीड़ में बीजेपी के लिए इतना आक्रोश अचानक कैसे आ गया। कैसे एक छोटे से सोशल मीडिया पोस्ट से बनी पार्टी इतना बड़ा रूप ले चुकी है कि देश का समूचा विपक्ष उसके सहारे सुर्खियां बटोरता नजर आ रहा है।



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एक पोस्ट जो आंदोलन में तब्दील हो गई

बमुश्किल ढाई माह ही हुए होंगे। जब सोशल मीडिया पर अचानक कॉकरोच जनता पार्टी वायरल हो गई। इस पार्टी के नाम से हैंडल्स क्रिएट करने वाले अभिजीत दीपके को क्या ये अंदाजा था कि उनका सिर्फ एक पोस्ट कभी किसी आंदोलन में तब्दील हो जाएगा। सोशल मीडिया पर उन्होंने इस नाम से पार्टी बनाई और युवा उस हैंडल पर ऐसे टूट पड़े जैसे खुले में रखे खाने पर कॉकरोच टूट पड़ते हैं। एक से दो, दो से सौ और सौ से हजारों तक ये गिनती कैसे पहुंची ये तजुर्बेकार शोधकर्ताओं के लिए रिसर्च का विषय हो सकता है।



अंदाजा लगाने में सरकार रही नाकाम

सत्ताधारी पार्टी लाख ये जताने की कोशिश करे कि ये आंदोलन एंटी नेशनल है या इस आंदोलन के पीछे बाहरी ताकतों का हाथ है। पर, सच्चाई तो ये है कि खुद बीजेपी सरकार में रहते हुए ये पता नहीं लगा पाई है कि कॉकरोच के नाम से बनी इस पार्टी को फंडिंग कहां से मिल रही है। एक छोटा सा सुराग भी हाथ लगता तो शायद अब तक बीजेपी का आईटी सेल पूरी टूलकिट का खुलासा कर चुका होता। लेकिन अब तक ऐसा हुआ नहीं है। फंडिंग का सुराग ढूंढ पाना तो दूर की बात, अब तक कोई इंटेलिजेंस नेटवर्क ये पता नहीं लगा सका कि इतने युवा एक साथ जमा कैसे हो गए। वैसे तो सीजेपी ये पहले से ऐलान कर चुकी थी कि वो 20 जुलाई से आंदोलन करेगी, लेकिन वो आंदोलन कितना बड़ा होगा इसका क्या कोई इंटेल सरकार को नहीं मिला।



चलिए मान लेते हैं कि कई युवा दिल्ली या आसपास के ही होंगे। पर आप ढेरों वायरल वीडियोज में देख सकते हैं कि बसों में सवार होकर बहुत से यंग बच्चे दिल्ली पहुंच रहे हैं। मध्यप्रदेश के भी बहुत से युवा इस आंदोलन का हिस्सा बने। जाहिर है उन्होंने दिल्ली पहुंचने के लिए कोई न कोई साधन तो चुना होगा। दिल्ली और भोपाल की दूरी भी कम नहीं है। यहां से बच्चे दिल्ली तक पहुंचे, खाने के लिए उनके पास आपको सिर्फ चना मुंगफली जैसी चीजें दिखेंगी। उनका ये हाल देखकर विदेशी फंडिंग या लंबी चौड़ी फंडिंग वाला मामला तो वैसे ही खारिज किया जा सकता है। सवाल ये है कि क्या सारी इंटेलिजेंस एजेंसी इसका अंदाजा लगाने में फेल हो गईं। या वो और सरकार दोनों ये सोचकर रिलेक्स थे कि पहले आंदोलन में ज्यादा लोग नहीं पहुंचे तो इस बार भी नहीं पहुंचेंगे. ये बात चौंकाने वाली है।



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पीएम मोदी के जबाव के इंतजार में युवा

इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात है सरकार की चुप्पी। मैं आपको यहां कुछ ट्वीट की डिटेल बताता हूं। 22 जुलाई सुबह 7 बजकर 15 मिनट। पीएम मोदी के ट्विटर से दिवंगत अजित पवार को उनके जन्मदिन पर याद किया। इससे चंद मिनट पहले 7 बजकर 12 मिनट पर देवेंद्र फडणवीस को जन्मदिन की शुभकामनाएं दी। 20 जुलाई को 07 बजकर 42 मिनट पर उन्होंने कहा ट्वीट किया कि आज हमारे युवा साथी धैर्य, आत्मविश्वास और अथक परिश्रम से ऐतिहासिक सफलता हासिल कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने एक ट्वीट भी इस आंदोलन में शामिल युवाओँ के लिए नहीं किया। इन्हीं युवाओं ने उन्हें यूथ आइकोन भी माना है। क्या रोज सुबह जब वो अपना ट्विटर या इंस्टाग्राम खंगालते होंगे, तब उनका दिल नहीं दुखता होगा कि आज भी उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। पीएम मोदी ने इस आंदोलन के बाद कहा है कि दोषियों पर सख्त एक्शन होना चाहिए। चाहते तो लिख भी सकते थे, यूथ आइकोन का खिताब और चमक उठता। सख्त एक्शन होना चाहिए कि जगह लिख सकते थे कि वो खुद एक्शन लेंगे। यूथ आइकोन बनाने वाले युवा उन्हें अपना सबसे बड़ा लीडर भी मान लेते, पर अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ।



सवाल ये है कि युवाओं के प्रति इतनी बेरूखी क्यों है। यही युवा आगे चल कर देश के वोटर बनेंगे। बहुत से तो शायद किसी चुनाव में अपना वोट कास्ट भी कर चुके होंगे। क्या चुनावी रणनीति तैयार करने में एक्सपर्ट बीजेपी ये भूल गई कि हर युवा के साथ उसका परिवार जुड़ा है। जब उस युवा का परिवार या माता पिता अपने बच्चे पर लाठियां बरसती देख रहे होंगे तब वो क्या सोच रहे होंगे। जो मां सोशल मीडिया पर एक्टिव है और रील खंगाल खंगाल कर सिर्फ इस आंदोलन को देख रही है, क्या उसकी नजर इन वीडियोज पर नहीं गई होगी। आपका बच्चा शायद इस आंदोलन में न हो, पर क्या लाठी खाते युवा, आंसू गैस का सामना करते युवा, पुलिस के डंडों से बचकर भागते युवाओं की तस्वीरें आपने नहीं देखी।



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बच्चों के बेहतर कल की बजाए लाठियां मिली

उन माता पिता पर क्या बीत रही होगी, जो राम के नाम पर वोट बीजेपी को देकर आए थे। क्या उनकी कल्पनाओं में ऐसा ही राम राज्य था, जिसमें उनके बच्चों के बेहतर कल की बजाए लाठियां लिखी हुई हों। इस आंदोलन को कभी नेपाल के जेन जी आंदोलन से कंपेयर किया गया तो कभी ये इल्जाम लगे कि इसे लेफ्ट ने हाईजैक कर लिया है। पर विपक्ष पर इल्जाम लगाने से क्या फायदा। अक्सर ऐसे आंदोलन विपक्ष के लिए बहती गंगा की तरह होते हैं, जिसमें डुबकी लगाने से वो भला क्यों चूकेगा।



अपने हक का सवाल पूछ रहे युवा

पर हम आपसे कहते हैं कि आप पुलिस से घिरे राहुल गांधी को भूल जाइए। भूल जाइए कि प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव को भी डिटेन किया गया। भूल जाइए कि पक्ष हो या विपक्ष इन युवाओं के आंदोलन पर अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। पर इन युवाओं को तो याद रखिए, जो इस देश के नागरिक हैं और अपने हक का सवाल पूछ रहे हैं। आखिर सरकार की ऐसी भी क्या जिद है कि वो अपने मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर कोई बात ही नहीं करना चाहती है।



सरकार के नुमाइंदे, जेपी नड्डा जैसे नेता सीजेपी के लीडर्स से मिल रहे हैं लेकिन ऐसा कोई ठोस आश्वासन नहीं दे रहे कि किसी के घर की उम्मीद ये बच्चे तसल्ली से घर लौट सके। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार किसी आंदोलन के सामने झुकी नहीं है। इससे पहले किसान आंदोलन पर भी सरकार का यही रुख था, लेकिन जब बात नहीं बनी तो सरकार बैकफुट पर आई। तो जिस देश का नारा ही जय जवान जय किसान है, उस देश में किसान और जवान की सुनने में हर्ज क्या है। ये युवा वही जवान हैं जो आगे चलकर इस देश की साख को मजबूत करने वाले हैं। इन्हें नजरअंदाज करके सरकार क्या साबित करना चाहती है।



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युवाओं के सामने झुकने से डर रही सरकार!

क्या सरकार का इगो इतना बड़ा हो चुका है कि वो विपक्ष की तरह अब युवाओं के सामने झुकने से भी डर रही है। युवाओं के सामने आकर सरकार जवाब देने से क्यों डर रही है। क्या शुतुर्मुग की तरह रेत में सिर धंसा लेने से समस्या का समाधान हो सकता है। युवाओं का गुस्सा शांत हो सकता है, या फिर सरकार को भरोसा है कि युवाओं का ये आंदोलन वोट्स पर असर नहीं डाल सकता।



अक्सर कहते हैं आम लोगों की याददाश्त बहुत छोटी होती है, और, चुनाव में अभी ढाई साल का वक्त है, तब तक लोग शायद इस आंदोलन को भूल जाएंगे। लेकिन संसद का रास्ता साफ करने वाले यूपी चुनाव में ज्यादा समय नहीं है। यूपी के साथ साथ पंजाब में चुनाव हैं। ये आंदोलन रंग लाता है या नहीं, ये चुनाव इसका लिटमस टेस्ट होगा। इसमें अगर हारे तो बीजेपी को साख बचाना मुश्किल होगा। इसके कुछ ही समय बाद मप्र में पंचायत चुनाव हैं। यूपी की हार का असर एमपी पर पड़ेगा इसमें कोई शक नहीं है, तो क्या एक जिद पर अड़कर बीजेपी सीटें गंवाने के लिए तैयार है, या कि सरकार को ये यकीन है कि इस आंदोलन से कोई असर नहीं पड़ने वाला।



छात्र जब जब सड़क पर उतरे हैं सरकार मुश्किल में आई

सोच ऐसी है तो ये भी याद रखना चाहिए कि बिना चेहरे वाली हर भीड़, चेहरे वाली भीड़ से ज्यादा खतरनाक हो सकती है। इस भीड का कोई लीडर नहीं है। फिर भी सबका मकसद एक है, ऐसा कैसे हो सकता है। अगर सरकार को डील करनी हुई तो बात किससे होगी। किसे बार बार सीजेपी का चेहरा बनाकर बुलाया जाएगा और फिर आश्वासन के लिए भेजा जाएगा। हम इसे नेपाल के जेन जी आंदोलन की संज्ञा नहीं देंगे, लेकिन उससे पहले भी इतिहास में बहुत सारे छात्र आंदोलन दर्ज हैं। 1968 का फ्रांस का छात्र विद्रोह हो, 1979 में ईरान की सरकार उखाड़ फेंकने वाली इस्लामी क्रांति हो, 2014 में ताइवान में हुआ सनफ्लॉवर मूवमेंट हो या 2022 श्रीलंका में हुआ आंदोलन हो। छात्र जब जब सड़क पर उतरे हैं सरकार के लिए मुश्किल ही बने हैं। अब इस मुद्दे को कैसे कंनक्लूड किया जाए वो मेरी समझ से परे है, इसलिए एक कविता की चंद पंक्तियां पढ़ देता हूं...



साहबों को साहिब-ए-किरदार से हटना पड़ेगा,



एक न एक दिन आप को सरकार से हटना पड़ेगा।



सहते-सहते दर्द अब हद से गुजरता जा रहा है,



आदमी को बिस्तर-ए-बीमार से हटना पड़ेगा।



हम ने अब आंखें हटा ली हैं तेरी तस्वीर पर से,



अब तेरी तस्वीर को दीवार से हटना पड़ेगा.।



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