नर्सिंग सिस्टम फिर कटघरे में: कोर्स पूरा, अब कॉलेज बदलने का खेल, 925 छात्रों का भविष्य दांव पर
News In Short
- 925 नर्सिंग छात्रों को शिफ्ट किया जाएगा।
- छात्रों का भविष्य खतरे में, शिफ्टिंग में जल्दीबाजी।
- निरीक्षण पर सवाल, क्यों नहीं हुआ पहले कदम?
- एनएसयूआई ने शिक्षा माफिया का आरोप लगाया।
- सुधार के नाम पर पुरानी समस्याएं बनी हुई हैं।
News In Detail
मध्यप्रदेश में नर्सिंग शिक्षा एक बार फिर विवादों में है। जिन छात्रों का कोर्स लगभग पूरा हो चुका, अब उन्हें “अनसूटेबल” कॉलेज से “सूटेबल” कॉलेज में शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सवाल सीधा है जब पढ़ाई खत्म होने को है, तब यह बदलाव किसके हित में?
क्या है पूरा मामला: आंकड़ों में समझिए गड़बड़ी
मध्य प्रदेश नर्सिंग रजिस्ट्रेशन काउंसिल ने 2022-23 सत्र के छात्रों के ट्रांसफर का आदेश जारी किया है।
- बीएससी नर्सिंग: 24 कॉलेजों के 778 छात्र शिफ्ट।
- पोस्ट बीएससी: 2 कॉलेजों के 55 छात्र शिफ्ट।
- एमएससी नर्सिंग: 8 कॉलेजों के 92 छात्र शिफ्ट।
कुल 925 छात्रों को 1776 सीटों पर एडजस्ट किया जाएगा। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का एक साथ ट्रांसफर खुद सिस्टम की खामियों को उजागर करता है।
सबसे बड़ा सवाल: जब कोर्स खत्म, तब बदलाव क्यों?
बीएससी नर्सिंग 4 साल और पोस्ट बीएससी/एमएससी 2 साल का कोर्स होता है। 2022-23 सत्र के हिसाब से इन छात्रों की पढ़ाई लगभग पूरी हो चुकी है। ऐसे में अब कॉलेज बदलना क्या सिर्फ औपचारिकता है या किसी बड़े खेल की ओर इशारा?
शुरू से विवादों में रहा नर्सिंग सेक्टर
मध्यप्रदेश का नर्सिंग सेक्टर कोई नया विवाद नहीं झेल रहा। एग्जाम, रिजल्ट, मान्यता और निरीक्षण- हर स्तर पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। निरीक्षण और परीक्षण के नाम पर अक्सर सिर्फ “रस्म अदायगी” होती रही, और अब उसी का नतीजा सामने है।
निरीक्षण पर सवाल: पहले क्यों नहीं हुई कार्रवाई?
सबसे अहम सवाल यह है कि जिन नर्सिंग कॉलेज को अब “अनसूटेबल” बताया जा रहा है, वे इतने समय तक मान्यता के साथ कैसे चलते रहे?
क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों में होता रहा?
अगर समय पर सख्ती होती, तो आज छात्रों को इस अनिश्चितता से नहीं गुजरना पड़ता।
ट्रांसफर प्रक्रिया का शेड्यूल...
- 16 अप्रैल 2026: कॉलेजों की सूची जारी
- 17–20 अप्रैल: ऑनलाइन पंजीयन
- 17–21 अप्रैल: चॉइस फिलिंग
- 23 अप्रैल: प्रोविजनल अलॉटमेंट
- 25 अप्रैल-4 मई: दस्तावेज सत्यापन
इतनी जल्दबाजी में पूरी प्रक्रिया सवालों को और गहरा करती है।
NSUI का आरोप: शिक्षा माफिया को फायदा?
एनएसयूआई प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जो काम समय पर होना चाहिए था, उसे अब देर से किया जा रहा है, जिससे छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह फैसला कहीं न कहीं शिक्षा माफियाओं को लाभ पहुंचाने के इरादे से लिया गया प्रतीत होता है।
एक्सक्लूसिव: छात्रों का दर्द
जब पूरा कोर्स अनसूटेबल कॉलेज में पढ़ाया गया, तब काउंसिल क्या कर रही थी? अब आखिरी समय में ट्रांसफर कर छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। अगर पारदर्शिता नहीं रखी गई तो प्रदेशभर में आंदोलन किया जाएगा।
बड़ा मुद्दा: सुधार या सिर्फ दिखावा?
नर्सिंग सिस्टम में सुधार की बात हर बार होती है, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदलते। हर बार नई प्रक्रिया, नए आदेश, लेकिन पुरानी समस्याएं जस की तस रहती हैं। अब यह मामला सिर्फ ट्रांसफर का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता का बन गया है।
जवाबदेही तय होगी या फिर वही कहानी?
925 छात्रों का भविष्य दांव पर है, लेकिन जिम्मेदारी तय करने की कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं है। अगर इस बार भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लेना चाहिए कि नर्सिंग सिस्टम में “सुधार” सिर्फ कागजों तक सीमित है।
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