ओबीसी वर्ग के अधिवक्ता बोले- खत्म कर दें OBC आरक्षण, कोर्ट में हुई लंबी बहस
समझें क्या है पूरा मामला
- मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों की लगातार सुनवाई चल रही है।
- विवाद का केंद्र 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा और 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का लागू होना है।
- मंगलवार को ओबीसी पक्ष ने मेरिट, सरकारी जवाब और आरक्षण नीति पर विस्तार से दलील रखी।
- सुनवाई के दौरान सरकारी स्कूलों और सरकारी नौकरियों को लेकर अलग बहस भी हुई।
- अब इस मामले की अगली सुनवाई बुधवार 5 अगस्त को होगी और अंतिम बहस पूरी होने की उम्मीद है।
बहस के बीच अधिवक्ता का बड़ा बयान
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में मंगलवार 4 अगस्त को ओबीसी आरक्षण मामले की फिर सुनवाई हुई। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की बेंच के सामने ओबीसी वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान मेरिट, आरक्षण और सरकारी स्कूलों पर ऐसी चर्चा हुई जिसने पूरे कोर्ट रूम का ध्यान खींच लिया।
मेरिट पर सवाल से शुरू हुई पूरी चर्चा
ओबीसी पक्ष ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में ओबीसी अभ्यर्थी मेरिट सूची में आते हैं। ऐसे अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में गिन लिया जाता है। इससे उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाता। इसी दलील के दौरान जस्टिस जस्टिस विनय सराफ ने सवाल किया कि यदि ओबीसी अभ्यर्थी लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, तो क्या यह दलील उनके अपने मामले को कमजोर नहीं करती। उन्होंने कहा कि इससे यह संदेश भी निकलता है कि ओबीसी अभ्यर्थी अधिक प्रतिभाशाली हैं और उन्हें शायद आरक्षण की जरूरत ही नहीं है।
अधिवक्ता बोले, मैंने कई बार लिखा कि ओबीसी आरक्षण खत्म कर दें
जज के सवाल पर वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने कहा कि उन्होंने कई बार सरकार को पत्र लिखकर ओबीसी आरक्षण समाप्त करने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही उन्होंने अपना वैकल्पिक प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि यदि कोई छात्र बारहवीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ा है तो सरकारी नौकरी उसी को मिले। उनके अनुसार ऐसा होने पर आरक्षण को लेकर विवाद भी खत्म होगा और सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर भी अपने आप सुधरेगा। यह अदालत में अधिवक्ता की ओर से रखा गया व्यक्तिगत सुझाव था, न कि अदालत की कोई टिप्पणी या आदेश।
कोर्ट ने भी सरकारी स्कूलों की हालत पर चिंता जताई
अधिवक्ता के सुझाव पर अदालत ने भी सरकारी स्कूलों की स्थिति पर चर्चा की। जस्टिस आनंद पाठक ने कहा कि इस तरह के विचार पहले भी कई समाजवादी चिंतकों ने रखे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की गुणवत्ता चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि कई जगह केवल डिग्री मिल रही है, लेकिन पढ़ाई का स्तर संतोषजनक नहीं दिखता। यह चर्चा शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता के संदर्भ में हुई।
जस्टिस पाठक ने साझा किया अपना अनुभव
सुनवाई के दौरान जस्टिस आनंद पाठक ने ग्वालियर में अपने कार्यकाल का अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि उस समय "विद्या दान" नाम की एक पहल शुरू की गई थी। इस योजना में अधिकारी, शिक्षित नागरिक और समाज के कई लोग सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को पढ़ाते थे।
उन्होंने बताया कि उस समय इंदौर के कलेक्टर भी बच्चों को पढ़ाने पहुंचते थे। कई आईआईटी से पढ़े लोग और अन्य अधिकारी भी इस अभियान से जुड़े थे। उन्होंने कहा कि सभी लोग बच्चों के साथ समय बिताते थे और भोजन अवकाश में उनके साथ खाना भी खाते थे। इससे स्कूलों की कार्यप्रणाली पर समाज की नजर रहती थी और गुणवत्ता में सुधार दिखाई देने लगा था।
उन्होंने यह भी बताया कि उस समय जस्टिस शील नागू ने भी इस पहल में पढ़ाने की इच्छा जताई थी। बाद में कोरोना महामारी आने के कारण यह अभियान बंद हो गया। उनके अनुसार ऐसी पहल फिर शुरू हो तो सरकारी स्कूलों को लाभ मिल सकता है।
अधिवक्ता ने भी स्कूल सुधार की बात दोहराई
जस्टिस आनंद पाठक की बात से सहमति जताते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने कहा कि यदि सरकारी नौकरियों में सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों को प्राथमिकता मिलेगी तो अधिक लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजेंगे। इससे स्कूलों की व्यवस्था और गुणवत्ता दोनों बेहतर हो सकती हैं।
सरकार के जवाब पर भी उठे कई सवाल
इसके बाद बहस फिर मुख्य विवाद पर लौट आई। ओबीसी पक्ष ने अदालत को बताया कि मार्च 2020 में सरकार बदलने के बाद इस मामले में कोई नया जवाब दाखिल नहीं किया गया। अदालत को बताया गया कि आखिरी विस्तृत जवाब अक्टूबर 2019 में दाखिल हुआ था। वह करीब 555 पन्नों का था। उसके बाद कोई नया विस्तृत दस्तावेज अदालत के सामने नहीं आया।
2019 के बाद सरकार ने नहीं पेश किया कोई जवाब
ओबीसी पक्ष ने अदालत में कहा कि सरकार ने अब तक 27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में कोई नई ठोस अर्जी दाखिल नहीं की। उन्होंने कहा कि पिछले सात वर्षों में इस मामले में सरकार का रुख स्पष्ट नहीं रहा। इसका असर हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ा है। उनका कहना था कि लंबी देरी के कारण कई युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ।
सुप्रीम कोर्ट और छत्तीसगढ़ के आदेशों का हवाला
बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट और छत्तीसगढ़ से जुड़े आदेशों का भी उल्लेख किया गया। ओबीसी पक्ष ने कहा कि कई मामलों में यह व्यवस्था दी गई कि अंतिम निर्णय तक नियुक्तियां संबंधित आरक्षण व्यवस्था के अनुसार जारी रह सकती हैं। उनका दावा था कि राज्य सरकार ने इस दिशा में जरूरी कदम नहीं उठाए। उन्होंने यह भी कहा कि केवल कानूनी राय को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
आनुपातिकता और आबादी के आधार पर रखी गई अंतिम दलील
सुनवाई में ओबीसी पक्ष ने आनुपातिकता के सिद्धांत का हवाला दिया। उन्होंने अदालत के सामने ओबीसी आबादी और आरक्षण से जुड़े आंकड़ों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार को सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।
अब बुधवार को फिर होगी सुनवाई
सुनवाई के अंत में अदालत ने मामले को बुधवार 5 अगस्त के लिए सूचीबद्ध किया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जस्टिस आनंद पाठक की अन्य व्यस्तताओं के कारण गुरुवार से यह विशेष बेंच उपलब्ध नहीं रहेगी। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि बुधवार को इस चरण की अंतिम बहस पूरी हो सकती है।
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