ओमती पुलिस की दिखावटी FIR निरस्त, थाना प्रभारी और ASI को तलब कर दिए नए सिरे से केस दर्ज करने के आदेश

Neel Tiwari | Apr 26, 2026, 23:18 IST
Photograph: (THESOOTR)
JABALPUR. जबलपुर हाईकोर्ट ने ओमती थाने की ‘दिखावटी’ FIR को निरस्त करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने आदेश का सही पालन नहीं किया और जांच को कमजोर किया। अब नई FIR दर्ज कर निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए गए हैं।

News in Short

  • हाईकोर्ट ने ओमती थाने की FIR को बताया भ्रामक और अधूरी।
  • थाना प्रभारी और ASI को कोर्ट में किया गया तलब।
  • FIR में आरोपियों के गलत पते दर्ज पाए गए।
  • कोर्ट ने कहा - यह न्यायिक आदेश का मजाक है।
  • नई FIR दर्ज कर निष्पक्ष जांच के सख्त निर्देश।

News In Detail

जबलपुर हाईकोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें पहले तो हाईकोर्ट रजिस्ट्रार के नाम का फर्जी लिफाफा तैयार कर नोटिस की तामिली दिखाई गई।



जब इस मामले की जांच के बाद फर्जीवाडा पकड़ा गया और कोर्ट से पुलिस को मामला दर्ज करने के निर्देश दिए गए, तब पुलिस ने ही आरोपियों से साठ गांठ कर मामला कमजोर कर दिया।



अब हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया है कि पुलिस अगर कोर्ट के आदेश को सिर्फ कागजी खानापूर्ति समझेगी, तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। जस्टिस बीपी शर्मा की एकल पीठ ने ओमती थाने में दर्ज FIR को ‘दिखावटी’, ‘अपूर्ण’ और ‘न्यायिक प्रक्रिया का मखौल’ बताते हुए सीधे निरस्त कर दिया।



कोर्ट में तलब हुए पुलिस अधिकारी

इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने खुद थाना प्रभारी और FIR दर्ज करने वाले ASI भल्लू राम चौधरी को कोर्ट में पेश होने के लिए कहा। दोनों अधिकारियों की मौजूदगी में जब केस की परतें खुलीं, तो कोर्ट ने पाया कि मामला साधारण लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अनियमितताओं से जुड़ा है।



कोर्ट के फर्जी लिफाफे से हासिल किया आदेश

याचिकाकर्ता वीरेन्द्र पाण्डेय खुद कोर्ट में कर्मचारी हैं। दरअसल उनके वैवाहिक विवाद का मामला कोर्ट में चल रहा था। उनकी ओर से अधिवक्ता असीम त्रिवेदी ने कोर्ट को बताया कि उनकी पत्नी सहित ससुराल पक्ष ने इस मामले की सुनवाई के दौरान एक चालाकी भरी साजिश रची।



अधिवक्ता ने हाईकोर्ट रजिस्ट्रार के नाम से फर्जी लिफाफा तैयार कर यह दिखाया कि पांडे को नोटिस मिल चुका है। जबकि असलियत पांडे को नोटिस नहीं मिला और वह कोर्ट में हाजिर नहीं हुए। इसी फर्जीवाड़े के आधार पर केस में एकतरफा आदेश हासिल कर लिया गया।



फर्जीवाड़ा साबित, फिर भी पुलिस सुस्त

जब इस पूरे मामले की शिकायत की गई, तो जांच में साफ हो गया कि लिफाफा फर्जी था। जिला न्यायाधीश की रिपोर्ट में भी जालसाजी के संकेत मिले। इसके बाद याचिकाकर्ता को FIR दर्ज कराने की छूट दी गई, लेकिन जब उन्होंने थाने में शिकायत की तो पुलिस ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।



मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद भी टालमटोल

जब पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के पास जाना पड़ा। मजिस्ट्रेट ने धारा 156(3) के तहत साफ आदेश दिया कि FIR दर्ज की जाए। लेकिन यहां भी पुलिस ने तुरंत कार्रवाई नहीं की। याचिकाकर्ता ने जब कोर्ट में कंटेंप्ट याचिका दायर की तब पुलिस के द्वारा जल्दबाजी में FIR दर्ज की गई, जो बाद में विवादों में आ गई।



FIR में बड़ी गड़बड़ियां, गलत पते, गायब तथ्य

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि FIR में आरोपियों के पते ही गलत लिख दिए गए। नरसिंहपुर के रहने वालों का पता “नरसिंहपुर, ओमती, जबलपुर” लिखा गया, जो खुद में ही विरोधाभासी है। इससे साफ संकेत मिला कि या तो गंभीर लापरवाही हुई या फिर जानबूझकर ऐसा किया गया ताकि आरोपी आसानी से बच सकें।



कोर्ट के आदेश का मजाक उड़ा रही जबलपुर पुलिस

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह की FIR न्यायिक आदेश की भावना के खिलाफ है। कोर्ट के अनुसार, पुलिस का यह तरीका न सिर्फ आदेश के मकसद को खत्म करता है, बल्कि न्याय व्यवस्था की साख को भी नुकसान पहुंचाता है। FIR इतनी अधूरी और जल्दबाजी में तैयार की गई थी कि उसमें कोई साफ अपराध तक नजर नहीं आता। जिसका फायदा सीधे-सीधे आरोपियों को मिलेगा।



पिछली FIR निरस्त, नई FIR के आदेश

कोर्ट ने FIR को पूरी तरह निरस्त करते हुए थाना प्रभारी को निर्देश दिया कि वे नई FIR दर्ज करें। इस बार सभी तथ्यों, शिकायत और प्रारंभिक जांच के निष्कर्षों को सही तरीके से शामिल करना जरूरी होगा ताकि जांच मजबूत और निष्पक्ष हो सके।



हाई कोर्ट ने दी पुलिस को चेतावनी

हाईकोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस को अब पूरी सावधानी के साथ जांच करनी होगी। किसी भी तरह का बाहरी दबाव या पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही याचिकाकर्ता को यह भी छूट दी गई कि अगर आगे जांच में कोई गड़बड़ी होती है, तो वे दोबारा कानूनी कदम उठा सकते हैं।



लापरवाही या पुलिसिया सेटिंग

इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या फिर आरोपियों को बचाने के लिए कोई ‘सेटिंग’ की गई थी? जिस तरह से FIR में खामियां सामने आईं, उसने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।



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