भोपाल आएंगे पीएम: 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर किसानों को दे सकते हैं जैविक खेती का संदेश
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 जून को भोपाल आ रहे हैं।
- कार्यक्रम विश्व पर्यावरण दिवस से जुड़ा हुआ है।
- देश में यूरिया और DAP संकट गहराता दिख रहा है।
- सरकार जैविक खेती को बड़े विकल्प की तरह पेश कर रही।
- किसान बढ़ती लागत और खाद कमी से परेशान हैं।
पीएम मोदी का भोपाल दौरा क्यों खास माना जा रहा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 जून को भोपाल आएंगे। यह दिन विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। भाजपा इसे 12 साल पूरे होने से जोड़ रही है। अभियान का नाम “विश्वास, विकास और जन कल्याण” रखा गया। माना जा रहा है कि मोदी बड़ा कृषि संदेश देंगे। फोकस जैविक खेती और जैविक खाद पर रहेगा। सरकार खेती को नए मॉडल की तरफ ले जाना चाहती। इसके पीछे खाद संकट बड़ी वजह माना जा रहा।
भारत में खाद संकट कितना गंभीर हो चुका है?
भारत दुनिया का बड़ा फर्टिलाइजर उपभोक्ता देश है। लेकिन घरेलू उत्पादन जरूरत से काफी कम है। देश में यूरिया की मांग करीब 450 लाख टन बताई जाती। उत्पादन क्षमता करीब 350 लाख टन मानी जाती है। बाकी जरूरत आयात से पूरी करनी पड़ती है। DAP के मामले में स्थिति और ज्यादा कठिन है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। वैश्विक संकट का असर सीधे किसानों पर पड़ता है।
चीन के फैसले से भारत क्यों परेशान हुआ?
खाद संकट की बड़ी वजह चीन की नीति बताई जा रही। चीन कई बार निर्यात पर रोक लगा चुका है। जून 2023 में यूरिया निर्यात रोका गया था।
फिर अक्टूबर 2025 में नई पाबंदी लगा दी गई। इससे भारत की सप्लाई चेन प्रभावित हो गई। DAP की उपलब्धता तेजी से कम होने लगी। EV बैटरी उद्योग भी फॉस्फेट का बड़ा उपयोग कर रहा। इससे DAP बनाने वाली सामग्री महंगी हुई। लाल सागर संकट ने शिपिंग लागत भी बढ़ाई।आयात अब पहले से ज्यादा महंगा पड़ रहा।
किसान पर खाद संकट का क्या असर दिख रहा?
किसानों की सबसे बड़ी चिंता समय पर खाद मिलना है। DAP और यूरिया की किल्लत बढ़ती जा रही है। कई जगह लंबी लाइनें लग रही हैं। ब्लैक मार्केट की शिकायतें भी बढ़ी हैं। 266 रुपए की यूरिया थैली महंगी बिकने लगी। छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। समय पर खाद नहीं मिली तो बुआई प्रभावित होगी। इससे उत्पादन घटने का खतरा बढ़ेगा। गेहूं, धान और मक्का पर सबसे ज्यादा असर होगा। फसल कम हुई तो आमदनी भी घटेगी।
जैविक खेती पर सरकार इतना जोर क्यों दे रही?
सरकार अब जैविक खेती को बड़ा विकल्प मान रही। परंपरागत कृषि विकास योजना पर फोकस बढ़ाया गया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लाखों किसान इससे जुड़े हैं। करीब 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक खेती में शामिल बताया गया। सरकार रासायनिक खाद पर निर्भरता घटाना चाहती है। इससे आयात बोझ कम करने की कोशिश होगी। लेकिन चुनौती यह है कि बदलाव आसान नहीं होगा। किसान तुरंत पूरी तरह जैविक खेती नहीं अपना सकते।
दोराहे पर खड़ा है किसान
बाजार और आम लोगों पर क्या असर होगा?
अगर खाद संकट बढ़ा तो उत्पादन घट सकता है। इसका असर बाजार कीमतों पर दिखेगा। दाल, गेहूं और सब्जियां महंगी हो सकती हैं। महंगाई का असर शहरों तक पहुंचेगा। सरकारी राशन योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। खरीद और भंडारण पर दबाव बढ़ेगा।
क्या पीएम मोदी का संदेश बड़ा बदलाव ला पाएगा?
भोपाल दौरे को सरकार अहम संदेश की तरह देख रही। पर सवाल सिर्फ संदेश का नहीं है। किसानों को भरोसा और व्यवस्था दोनों चाहिए। खाद की उपलब्धता सबसे बड़ी जरूरत बनी हुई है। अगर तैयारी मजबूत नहीं हुई तो संकट बढ़ सकता है। अगले सीजन में हालात और कठिन होने की आशंका है।
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