कुंवारों के लिए वरदान हैं इंदौर के पोटलीवाले गणेश, हर गुरुवार मिलती है बप्पा की हल्दी

Kaushiki | Sept 17, 2026, 14:32 IST
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इंदौर के पोटलीवाले गणेश मंदिर में शीघ्र विवाह के लिए हर गुरुवार सिद्ध हल्दी की गांठ दी जाती है। 300-400 साल पुरानी इस प्रतिमा का यह आशीर्वाद देश-विदेश तक मशहूर है।

Potliwale Ganesh Ji: जयपुर के प्रसिद्ध मोतीडूंगरी गणेश मंदिर में कुंवारों को मेहंदी बांटने की अनूठी परंपरा के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी इंदौर में भी एक ऐसा ही अनोखा और चमत्कारिक मंदिर स्थित है?



इंदौर के 'पोटलीवाले गणेश' मंदिर में शीघ्र विवाह की मनोकामना लेकर आने वाले युवक-युवतियों को हर गुरुवार प्रसाद के रूप में सिद्ध हल्दी की गांठ दी जाती है। एक हजार एक बार सहस्रार्चना से अभिमंत्रित इस हल्दी की ख्याति अब केवल इंदौर या भारत तक सीमित नहीं है।



बल्कि इंग्लैंड, अमेरिका और दुबई में बसे भारतीय भी बप्पा के इस आशीर्वाद को मंगवाते हैं। खजराना गणेश के बाद यह शहर का ऐसा दूसरा मंदिर है, जिसके गर्भगृह की छत पर पवित्र गणेश यंत्र भी स्थापित है। जानिए इन खास गणेश मंदिर के बारे में...



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हर गुरुवार मिलती है हल्दी

मंदिर में गुरुवार का दिन खास माना जाता है। विवाह की चाह रखने वाले युवक-युवतियां यहां आते हैं। वे भगवान गणेश की हल्दी की गांठ लेते हैं।



मान्यता है कि इससे विवाह के योग जल्दी बनते हैं। लगभग 300 से 400 साल पुरानी काले पत्थर की इस दुर्लभ चतुर्भुज प्रतिमा के हाथ में धन की पोटली है, जिसके कारण इन्हें यह खास नाम मिला है।



हर महीने चतुर्थी और खास अवसरों पर पूजा होती है। हल्दी की गांठ से गणेश जी की 1001 बार सहस्रार्चना की जाती है। इसके बाद यही हल्दी श्रद्धालुओं को दी जाती है।



यह पूरी प्रक्रिया मंदिर की खास परंपरा है। श्रद्धालु इस हल्दी को घर ले जाते हैं। वे इसे गणेश जी का आशीर्वाद मानते हैं। घर में स्थापित कर रोज पूजा करते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी जारी है।



विदेश तक पहुंची हल्दी

यह परंपरा अब सिर्फ इंदौर तक सीमित नहीं रही। देश के कई हिस्सों से लोग मंदिर से संपर्क करते हैं। विदेश में रहने वाले श्रद्धालु भी हल्दी मांगते हैं। यह मांग हर गुजरते साल के साथ बढ़ रही है।



कई परिवारों ने अपने रिश्तेदारों के जरिए यह हल्दी भेजी है। यह हल्दी इंग्लैंड, अमेरिका और दुबई तक पहुंच चुकी है। इस तरह मंदिर की परंपरा विदेशों में बसे परिवारों तक भी जुड़ गई है। दूर रहकर भी लोग अपनी आस्था से जुड़े रहते हैं।



पोटलीवाले नाम की कहानी

मध्यप्रदेश के गणेश मंदिर की पहचान सिर्फ हल्दी की परंपरा से नहीं है। यहां एक बहुत पुरानी प्रतिमा भी विराजित है। यह प्रतिमा करीब 300 से 400 साल पुरानी बताई जाती है।



यह चतुर्भुज गणेश प्रतिमा काले पत्थर से बनी है। भगवान गणेश की सूंड दाहिनी ओर है। वे रिद्धि-सिद्धि के साथ विराजमान हैं। एक हाथ में धन की पोटली है। इसी वजह से नाम पड़ा पोटलीवाले गणेश।



काले पत्थर पर केसरिया रंग

समय के साथ प्रतिमा को चोला चढ़ाने की परंपरा रही है। इस वजह से काला पत्थर अब केसरिया रंग में नजर आता है। यह बदलाव धीरे-धीरे कई सालों में हुआ है। श्रद्धालु इसे भी मंदिर की खासियत मानते हैं।



पंडित गणेश कुमार पौराणिक और मयंक पुराणिक इस परंपरा की जानकारी देते हैं। उनके मुताबिक मंदिर की छत पर गणेश यंत्र भी स्थापित है। यह मंदिर की एक बड़ी विशेषता मानी जाती है।



खजराना के बाद दूसरा मंदिर

उनके अनुसार खजराना गणेश मंदिर के बाद यह ऐसा दूसरा मंदिर है। यहां गर्भगृह के ऊपर गणेश यंत्र स्थापित है। श्रद्धालु इसे सकारात्मकता से जोड़कर देखते हैं।



प्राचीन प्रतिमा, गणेश यंत्र और हल्दी की परंपरा, तीनों खास हैं। इन्हीं की वजह से पोटलीवाले गणेश मंदिर की अलग पहचान बनी है। यह इंदौर की धार्मिक विरासत का अहम हिस्सा माना जाता है।



डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।



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