MP बिजली कंपनी में करंट चार्ज का खेल! पुराने विवाद के बाद भी नहीं बदली व्यवस्था, इंजीनियरों में घमासान
समझें क्या है पूरा मामला
- बिजली कंपनी में प्रमोशन प्रक्रिया पर विवाद बढ़ा।
- 57 अधिकारियों में 21 को ही प्रमोशन मिला।
- पांच साल चार्ज वाले अधिकारियों पर सवाल उठे।
- 38 खाली पदों पर पात्र इंजीनियर बाहर रहे।
- यूनियन ने करंट चार्ज व्यवस्था का विरोध किया।
मध्यप्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी की भर्राशाही को लेकर इंजीनियर लामबंद हैं। कर्मचारी और इंजीनियर संगठनों का आरोप है कि कंपनी अपने नुमाइंदों को भलाई कर रही है। जबकि बोर्ड से आए कर्मचारियों के लिए आरक्षित पदों की अनदेखी की जा रही है। प्रमोशन में 57 अधिकारियों में सिर्फ 21 को मौका मिलने और करंट चार्ज की व्यवस्था पर उठे सवालों ने कंपनी की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
प्रमोशन सिस्टम पर सीधे सवाल
मामला सिर्फ प्रमोशन का नहीं है। विवाद इस बात पर है कि कंपनी में जिम्मेदारी और पदोन्नति के लिए एक ही नियम सब पर लागू हो रहा है या नहीं।
संबंधित कर्मचारी संगठनों का दावा है कि कई अधिकारी पांच साल से ज्यादा समय तक करंट चार्ज में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे। अब प्रमोशन के वक्त अनुभव को ही बाधा बताया जा रहा है।
सवाल उठ रहा है कि जिस अनुभव के आधार पर वर्षों तक अधिकारियों से काम लिया गया, वही अनुभव पदोन्नति के समय अचानक कम कैसे पड़ गया?
2011 के आरक्षित पदों पर टकराव
विवाद की जड़ 2011 की व्यवस्था से जुड़ी बताई जा रही है। संगठनों का कहना है कि उस समय बोर्ड के लिए कुछ पद आरक्षित किए गए थे। अब आरोप है कि उन्हीं पदों पर कंपनी कैडर के अधिकारियों को आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
यूनियनों का दावा है कि 9 जून 2011 के गजट नोटिफिकेशन में पद और वेतन से जुड़ी व्यवस्था स्पष्ट की गई थी। इसी आधार पर संगठन अब पुराने नियमों को सामने रखकर जवाब मांग रहे हैं।
50 एई को डीजीएम का चार्ज देने पर सवाल
कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि पूर्व में मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी पहले करीब 50 एई को डीजीएम का करंट चार्ज दे चुकी है। अब इसी तरह की व्यवस्था दोबारा आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।
आरोप यह भी है कि पहले ऐसे अधिकारियों को करंट चार्ज दिया गया, जिनके पास संबंधित पद का नियमित वेतनमान नहीं था। यही बिंदु अब नियमों की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
38 पद खाली, फिर पात्रों को इंतजार क्यों?
संगठनों के मुताबिक करीब 38 पद खाली हैं। इसके बावजूद पात्र इंजीनियरों को जिम्मेदारी देने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। इसी के साथ 35 से 38 साल की सेवा पूरी कर चुके अधिकारियों को पदोन्नति का अवसर देने और आवश्यक शिथिलता पर भी मांग उठी है।
नियमों की हो रही अनदेखी
मध्यप्रदेश विद्युत कर्मचारी संघ फेडरेशन इंटक के रीजनल सेक्रेटरी गोपेन्द्र कुमार वाष्णेय ने कहा कि करंट चार्ज व्यवस्था में नियमों की अनदेखी हो रही है। उन्होंने कहा कि सीजीएम से एसडीओ तक करंट चार्ज का चलन जारी है। इस व्यवस्था पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। सभी अधिकारियों के लिए समान नियम होने चाहिए। बोर्ड के पद बोर्ड कर्मचारियों को मिलने चाहिए। कंपनी कैडर के पद कंपनी कर्मचारियों को दिए जाने चाहिए। कंपनी को अपने कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखना चाहिए।
पदोन्नति व्यवस्था का पालन होना चाहिए
मध्य प्रदेश यूनाइटेड फोरम ऑफ पावर एम्प्लॉयीज एंड इंजीनियर्स के अध्यक्ष रमेश सिंह कुशवाह ने कहा कि 2011 की पदोन्नति व्यवस्था का पालन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरक्षित पदों पर मंडल के कर्मचारियों को ही पदोन्नति मिलनी चाहिए। कंपनी पदाधिकारियों को इन पदों पर पदोन्नति देना उचित नहीं है।
आरक्षित पदों की व्यवस्था पर आपत्ति
मध्यप्रदेश विद्युत मंडल पत्रोपाधि अभियंता संघ के प्रभारी केके आर्य ने भी मामले में सवाल उठाए हैं। उन्होंने नियमों और आरक्षित पदों की व्यवस्था पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि बोर्ड कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
कंपनी पर दोहरे रवैये का आरोप
पूरे विवाद में सबसे बड़ा आरोप यही है कि कंपनी कैडर और बोर्ड कैडर के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग पैमाना अपनाया जा रहा है। अगर करंट चार्ज देना विभागीय जरूरत है तो उसके लिए स्पष्ट और समान नियम होने चाहिए। अगर प्रमोशन में अनुभव जरूरी है तो वही कसौटी करंट चार्ज देते समय भी लागू होनी चाहिए।
फिलहाल इंजीनियर संगठनों का आक्रोश बढ़ रहा है। वे प्रमोशन, करंट चार्ज और आरक्षित पदों की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
सीएमडी से जवाब लेने की कोशिश
इस पूरे मामले पर मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के सीएमडी ऋषि गर्ग का पक्ष जानने के लिए फोन लगाया गया।अधीनस्थ कर्मचारियों ने कहा कि साहब से बात करवाते हैं। इसके बाद सीएमडी को सीधे भी कॉल किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। कंपनी की ओर से इस आरोप पर कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि नियम समान होने के बाद भी करंट चार्ज और प्रमोशन में भेदभाव की शिकायतें क्यों आ रही हैं?
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